बिन आलू…सब कुछ सूना

बिन आलू…सब कुछ सूना

आप भारतीय उप-महाद्वीप में कहीं भी चले जाएं, आपको हर घर में आलू मिलेगा, बस जैन समुदाय को छोड़कर । अलु (बंगाली और पंजाबी), आलू (हिंदी), बटाटा (मराठी), पपेटा/पपेटो/बटाका (गुजराती), अलुगड्डे (कन्नड), बंगालाडुंपा (तेलुगु), उरुलाईकिल्लांगु (तमिल) और उरुलक्कीलन (मलयालम) भारतीय भोजन का एक अभिन्न हिस्सा है।

कैरोलस क्लुसियस के “पापास पेरुआनोरम” (पेरू के आलू), रियोरियम प्लांटरम हिस्टोरिया, 1601

आप भारत के ज़्यादातर हिस्सों की कल्पना आलू के आधारित व्यंजन के बिना कर ही नहीं सकते: उत्तर भारत में सुबह की शुरुआत ही नाश्ते में आलू के पराठों के साथ होती है। कश्मीर से कन्याकुमारी और असम से गुजरात तक आलू दम/अलूर दोम/दम आलू लोगों का ख़ास भोजन है। बटाटावड़ा के बिना मुंबई और मसाला डोसा के बिना दक्षिण भारत की कल्पना नहीं की जा सकती। जिस तरह पूड़ी-भाजी मध्य भारत का मुख्य भोजन है वैसे ही बंगाल, उड़ीसा और असम का मुख्य भोजन शादा आलू और लुछी है। जैसे केरल की रेशमी खिचड़ी ((The silken Stew) बिना आलू के अधूरी है वैसे ही मद्रास का उरुलाईकिल्लांगु (आलू) बोंडा भी बिना आलू के अधूरा है। लेकिन अगर आप आलू के इतिहास पर नज़र डालें तो आपको हैरानी होगी कि आलू भारतीय क़ंद का मूल हिस्सा नहीं है!

अलु पराठा

भोजन पर कॉलम लिखने वाले पत्रकार वीर सांघवी ने आलू को भारतीय सब्ज़ियों का राजा बताया है हालंकि ये विदेश से आया है। आलू हमें कोलंबियन विनिमय में मिला था। क्रिस्टोफ़र कोलंबस अमेरिका की खोज के बाद वापसी के समय कई तरह के स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ लाया था। आलू के अलावा स्पेन और पुर्तगाल के नाविक हमारे देश में मिर्च और अमरुद तथा चीकू जैसे फल भी लाए थे। कहा जाता है कि स्पेन के नाविक सबसे पहले यूरोप में आलू लाए थे जिन्हें सन 1536 में इसके बारे में पता चला था। भारत में आलू पुर्तगालियों के आने के बाद आया।

आलू एंडीज़ क़ंद है और ये दक्षिण अफ़्रीक़ा के एंडीज़ पर्वतों पर उगाया और खाया जाता था। इसे क़ंद इसलिये कहते हैं क्योंकि ये मूलत: जड़ ही है। आलू सोलैनेसी पौधों में आता है और इसका वनस्पातिक नाम सोलानम ट्यूबरसम है। जंगली आलू आज भी अमेरिकी महाद्वीपों में पाये जाते हैं। आलू की खेती सबसे पहले इंका के वंशजों ने 7हजार या 10 हज़ार साल पहले पेरु और बोलीविया में की थी। आलू की खेती किसी भी ज़मीन पर, किसी भी मौसम में हो सकती है। आलू की खेती के लिये पानी की बहुत ज़्यादा ज़रूरत होती है। इंका शासक का मुख्य भोजन आलू होता था और इसी से वे समय का पता करते थे, यानी जितना समय आलू के बनने में लगता उसी से वे गुज़रते हुये समय का अंदाज़ा लगाते थे। इंग्लैंड में पहली बार आलू सर वॉल्टर रैलीग सन 1598 में लेकर आये थे। अमेरिका में आलू का आगमन सन 1621 में हुआ था और फ़्रांस की क्रांति के बाद थॉमस जेफ़रसन फ़्रांस से फ़्रैंच फ़्राइज़ लाए थे।

फ़्रांस में आलू को ‘एप्पल ऑफ़ द अर्थ’ यानी पृथ्वी का सेब कहते हैं। य़ूरोप में, वहां के सर्द मौसम की वजह से आलू की खेती आसानी से होती है। और इसीलिये आलू ने बहुत कम समय में ही गेंहूं और जौ को टक्कर देनी शुरु कर दी थी। 19वीं शताब्दी में जब आयरलैंड में भोजन की गंभीर समस्या पैदा हो गई थी, तब आलू ही काम आया था। वक़्ती तौर पर आलू ने भूख की समस्या तो ख़त्म कर दी थी लेकिन दीर्घावधि में इसके विनाशकारी परिणाम भी निकले। सन 1840 के दशक में आयरलैंड में महामारी फैली, जिसे पोटेटो ब्लाइट कहा जाता है। इस महामारी में दस लाख से ज़्यादा लोग मारे गए और लाखों लोग दूसरे देश ख़ासकर अमेरिका चले गए। संकट की इस घड़ी में कई देशों ने आयरलैंड की हर तरह से मदद की। कलकत्ता स्थित अंग्रेज़ सेना में आयरिश सैनिकों ने सबसे पहले दान किया था। उनके अलावा कई भारतीय परोपकारियों, शहज़ादों और आम लोगों ने भी दिल खोलकर दान किया। राहत पर क़रीब सवा लाख मिलियन पौंड ख़र्च किये गये थे। अधिकतर राशि औपनिवेशिक देशों से ही आई थी।

केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला - आलू के अनेक प्रकार की खेती

जर्मनी के ज़्यादातर खानों में आलू होता है । जर्मनी में भोजन में आलू को कार्बोहाइड्रेट का मुख्य स्रोत माना जाता है। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बैवेरिया में बंकरों में रह रहे परिवार आलू खाकर ही ज़िंदा रहे थे। पिछले सत्तर सालों से पूरी दुनिया में आलू की खेती होती आ रही है । इनमें लगने वाले कीड़ों पर कड़ी नज़र रखी जाती है। आलू हर तरह के मौसम में पैदा किया जा सकता है और इसका सबूत ये है कि सन 1995 में अंतरिक्ष में आलू उगाए जा चुके हैं। सन 2015 में रिडली स्कॉट की हिट मूवी द् मार्टियन में मार्क वैटनी ने ज़िंदा रहने के लिये इसी तरह अंतरिक्ष में आलू उगाये थे। वैटनी की भूमिका मैट डैमोन ने निभाई थी।

जर्मन आलू की सलाद

भारत में आलू एक महत्वपूर्ण फ़सल है। भारत में लोगों ने हमेशा क़ंद-मूल का सेवन किया है। भारत में मीठे आलू यानी रतालू को बहुत पसंद किया गया और आलू भारत में भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। भारत में आलू ने 17वीं शताब्दी में अपनी जड़ें बनाई थीं और इसका श्रेय सर वॉल्टर रैलीग के बाद अंग्रेज़ों को जाता है, जिन्होंने इसे बेहद पसंद किया। भारत में भोजन के इतिहासकारों का मानना है कि भारत में आलू की लोकप्रियता और खेती का सहरा अंग्रेज़ों के सिर बंधता हैं।

भारत में बड़े पैमाने पर आलू की खेती होती है और शिमला में केंद्रीय आलू शोध संस्थान (Central Potato Research Institute) है जो इसकी फ़सल पर लगातार नज़र रखता है। संस्थान के शोध के अनुसार भारत में खाद्य उत्पादन में आलू का बहुत बड़ा योगदान है और ये भूख मिटाने का सबसे बड़ा ज़रिया भी रहा है। संस्थान का मानना है कि अगर आलू का भंडारण सही तरीक़े से किया जाय तो भारत से भुखमरी ख़त्म की जा सकती है। आलू से इथनोल का उत्पादन भी किया जा सकता है। इथनोल से वोदका शराब भी बनती है।इसका इस्तेमाल हाईब्रिड ईंधन बनाने में भी हो सकता है जिससे हमारी तेल-आयात पर निर्भरता कम हो सकती है।. इससे बनने वाले इथेनोल से वाहन चलाना भी संभव है लेकिन इसके लिये वाहन में थोड़ा बहुत बदलाव करना पड़ेगा।.ये पशु-चारे का भी बहुत अच्छा विकल्प है। आलू का इस्तेमाल गोंद और चिकने पदार्थ बनाने में भी किया जाता है। इसके अलावा इससे हल्के क़िस्म का प्लास्टिक भी बनाया जाता है जिसका प्रयोग ऐसी प्लेटें बनाने में किया जाता है जो सिर्फ़ एक बार इस्तेमाल की जाती हैं।

आलू के चिप्स

अब ज़रा आलू पर आलोचनात्मक दृष्टि भी डाली जाए। ज़्यादातर लोगों को लगता है कि आलू बेकार की सब्ज़ी है, इसमें सिर्फ स्टार्च होता है और इसे खाने से मोटापा बढ़ता है। लेकिन यह सोच ग़लत है। आलू में उन तमाम पोषक तत्वों की भरमार होती है जो हमारे ज़िदा रहने के लिये ज़ररी हैं। लेकिन ज़ायादातर पोषक तत्व या तो आलू के अंदर होते हैं या फिर इसके छिलके में और इसे छीलने से पोषक तत्व के गुण समाप्त हो जाती है। भारतीय और चीनियों का आलू के साथ तीन सौ साल पुराना नाता है और विश्व में आलू उत्पादन में तैंतीस प्रतिशत से ज़्यादा योगदान इन दोनों देश का होता है। ऐसा नहीं है कि आलू खाने से मोटापा बढ़ता है, दरअसल आलू को तल कर या इस पर मक्खन और चीज़ लगाकर खाने से मोटापा बढ़ता है। आलू में फ़ॉसफ़ोरस, कैल्शियम, मैग्निशियम, ज़िंक, फ़ाइबर, विटामिन सी, विटामिन बी6 होता है और कॉलेस्टेरोल तो बिल्कुल नहीं होता। आलू में एक कैमिकल होता है जिसे कोलीन कहते हैं। इससे मांसपेशियों की गतिविधियों में मदद मिलती है, इससे दिल ख़ुश रहता है और पढ़ने-लिखने तथा चीज़ों को याद रखने में भी मदद मिलती है। इसमें कुछ प्रोटीन भी होता है। सौ ग्राम आलू में दो ग्राम प्रोटीन होता है। आलू कब्ज़ होने से भी बचाता है जिसकी जानकारी इंका शासकों को थी।

मँगशोर चोप - बंगाली आलू क्रोकेट, मटन मिंस से भरा | रीया दलाल 

गेहूं, मक्का और चावल के बाद आलू ऐसी चीज़ है जो सबसे ज़्यादा खाई जाती है। एक अरब लोग, एक दिन में ,कम से कम एक आलू खाते हैं। हर साल तीस करोड़ मिट्रिक टन से ज़्यादा आलू की खेती होती है। आलू की चार हज़ार से ज़्यादा क़िस्में होती हैं और ये काले, लाल, नारंगी के अलावा भूरे रंग के भी म होते हैं। आलू की कई क़िस्मों की वजह ये है कि इसे कहीं भी उगाया जा सकता है। आप एक छोटे से आलू से आलू की फ़सल तैयार कर सकते हैं। आलू की एक और विशेषता ये है कि इसमें कीड़े नहीं लगते।

आलू दरअसल हमारे परिवार का एक सद्सय बन चुका है। न सिर्फ परिवार बल्कि राजनीति में भी नारे के रुप में ये अमर हो चुका है जैसे ‘जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहेगा बिहार में लालू।’ इसका प्रयोग अंग्रेज़ी मुहावरों में भी होता है जैसे ‘कोउच पोटेटा’ और ‘ड्रॉप्ड लाइक ए हॉट पोटेटो।’

तो अगली बार आप जब भी वड़ापाओ, समोसा या फिर आलू बोंडा खाएं तो आलू को सम्मान देना न भूलें।

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