बंगाल के 4 भूले हुए शहर

बंगाल के 4 भूले हुए शहर

आज जब हम आधुनिक बंगाल की बात करते हैं तो सबसे पहले कोलकाता का नाम हमारे ज़हन में आता है लेकिन क्या आपको पता है कोलकाता से पहले बंगाल में और भी महत्वपूर्ण शहर रहे जिनका बंगाल के समृद्ध इतिहास में ख़ासा योगदान रहा?

आज हम आपको बंगाल के चार खोये हुए शहरों के दिलचस्प इतिहास के बारे में बताते हैं।

1- राजमहल

राजमहल, झारखंड राज्य के पूर्वी क्षेत्र के साहेबगंज ज़िले में स्थित है जो कोलकाता से 388 और पटना से 348 किमी की दूरी पर है। आज भले ही इसकी पहचान पुराने स्मारकों के एक उजड़े शहर के रूप में बनकर रह गयी है, पर एक समय ऐसा भी था जब इसे बंगाल (जिसमें बिहार व ओड़िशा के प्रांत शामिल थे) की राजधानी बनने का गौरव प्राप्त हुआ था। राजमहल मुग़ल बादशाहों, शाहज़ादों और उनके सिपहसालारों व बंगाल के नवाबों की पसंदीदा जगह रही है जहां उन्होंने शानदार महल, मस्जिदें, बारादरी तथा हम्माम आदि की तामीर करवाये और आकर्षक फ़व्वारों सहित ख़ुबसूरत बाग़-बग़ीचे तैयार करवाये और सिक्के ढ़ालने के टकसाल भी बनवाये जिसकी चर्चा ऐतिहासिक पुस्तकों और विदेशी यात्रियों के विवरणों में दर्ज है।

यह ऐतिहासिक शहर,गंगा के किनारे राजमहल पर्वत-श्रृंखला की गोद में स्थित है जिसके कारण इसे ‘दामन-ए-कोह’ की की संज्ञा भी दी गई है। गंगा नदी के किनारे होने के कारण जहां यह व्यापारिक और सामरिक दृष्टि से मुफ़ीद था, वहीं दूसरी ओर 660 से 980 फ़ीट की औसत ऊंचाई वाली उत्तर से दक्षिण की ओर 26 हज़ार वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैली राजमहल पर्वत माला अपनी दुर्भेद्यता के कारण इसे विशेष सुरक्षा प्रदान करती थी।

राजमहल के निकट स्थित उधवानाला जहां मीर कासिम व ब्रिटिश फौज के बीच हुआ था निर्णायक युद्ध | विलियम होजेज की पेंटिंग

अपने शानदार इतिहास के साथ भूवैज्ञानिक ( जियोलॉजिकल) कारणों से भी राजमहल की राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय ख्याति रही है। भू-वैज्ञानिकों के अनुसार इस पर्वत-श्रृंखला का निर्माण जूरासिक-युग में 6.2 करोड़ से लेकर 14.5 करोड़ वर्ष के बीच ज्वालामुखी विस्फोट से हुआ था जिसके आग़ोश में बहुतायत से विरल ‘प्लांट फ़ासिल’ पाये गये हैं जिसके कई अनूठे नमूने लखनऊ के ‘बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ़ पेलियोबाटनी ‘ में संग्रहित हैं। प्लांट फ़ासिल के इन अनूठे नमूनों के कारण ही भारत सरकार के भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग (जियोलॉजिकल सर्वे आफ़ इंडिया-जी.एस.आई.) ने यहां ‘जियो-टूरिज़्म ‘ की अपार संभावनाएं देखते हुए इस पर्वतमाला को ‘नेशनल जियोलॉजिकल मोन्यूमेंट्स’ के रूप में घोषित किया है।

राजमहल के इतिहास पर नज़र डालें तो ‘अकबरनामा’ हमें बताता है कि इसकी बुनियाद बंगाल के सूबेदार राजा मानसिंह ने रखी थी । उस समय इसका नाम ‘अकबरनगर’ पड़ा। इसे बंगाल की नयी राजधानी बनाया गया क्योंकि यह बंगाल की तत्कालीन राजधानी गौड़ की तुलना में नदियों के रास्ते किये जानेवाले हमलों से ज़्यादा सुरक्षित थी। इतिहासकार सर जदुनाथ सरकार ‘द् हिस्ट्री ऑफ़ बंगाल-मुस्लिम-काल’ में बताते हैं कि 7 नवम्बर, सन 1594 को राजा मानसिंह ने राजमहल में बंगाल की नयी राजधानी की बुनियाद अपने आक़ा के नाम पर रखी जो कि नदी के रास्ते आक्रमण से बहुत महफ़ूज़ था। देखते ही देखते यह एक पसंदीदा शहर के रूप मे विकसित होता गया क्योंकि यहां का माहौल, गौड़ और ढ़ाका के बनिस्बत ज़्यादा स्वास्थ्यप्रद था तथा यह बिहार के नज़दीक भी था। राजमहल का सामरिक महत्व शेरशाह के समय में भी था क्योंकि बिहार होकर गौड़ जानेवाली सेना का पुराना रास्ता इसी तरफ़ से होकर गुज़रता था।और पढ़ें

2 – चिनसुराह

हुगली नगर निगम क्षेत्र में, चिनसुराह आज एक छोटी सी जगह है लेकिन किसी ज़माने में ये भारत में व्यापार का एक बड़ा केंद्र हुआ करता था और यह डच लोगों (नीदरलैंड/हालैंड के नागरिक) के घर के रूप में जाना जाता था। इसके अलावा इस जगह की एक और ख़ासियत है और वो ये है कि इसी जगह हमारा राष्ट्रगीत वंदे मातरम लिखा गया था ।

17वीं और 19वीं शताब्दी में चिनसुराह बंगाल में डच लोगों का एक समृद्ध व्यापारिक केंद्र था । ये डच ही नहीं बल्कि अंग्रेज़ों, अर्मेनिया के नागरिकों, बंगालियों का भी घर होता था। चिनसुरा के अलावा यूरोपियन नागरिकों ने हुगली के किनारे चंदननगर और बांदेल भी बसाया था |

एक अमीर बाबू का चर्च और निवास। | चिनसुराह

विश्व के साथ व्यापार करने के लिए सन 1602 डच ईस्ट इंडिया कंपनी ( वी.ओ.सी.) बनाई गई थी। इसके कुछ साल बाद डच भारत आ गए थे और सन 1606 में उन्होंने पेटापोली में अपना पहला कारख़ाना लगाया । सन 1615 और सन 1635 के बीच मुग़ल बादशाह शाहजहां ने डच व्यापारियों के लिये, व्यापार से संबंधित कई फ़रमान जारी किए । डच व्यापारियों ने सन 1653 तक चिनसुराह में पांव जमा लिए थे। वैसे चिनसुराह पुर्तगालियों ने बनाया था । सन 1655 में डच ईस्ट इंडिया कंपनी के भीतर बंगाल निदेशालय की स्थापना हुई जहां से डच व्यापारी मसालों, शक्कर, रेशम, अफ़ीम, कपड़े और शोरा का व्यापार करने लगे।

अंग्रेज सैनिकों के लिए बने बैरक | ब्रिटिश लाइब्रेरी

चिनसुराह डच ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए महत्वपूर्ण व्यापार केंद्र था क्योंकि ये नीदरलैंड की राजधानी एमस्टरडम और उनकी पूर्वी व्यापारिक राजधानी बैटाविया (मौजूदा समय में जकार्ता) के बीच था।और पढ़ें

3- मुर्शिदाबाद

कभी सबसे अमीर मुगल प्रांत की राजधानी के साथ-साथ नवाबों की राजधानी मुर्शिदाबाद आज भी अपनी महिमा से अतीत है। यहीं पर भारत के इतिहास का एक पन्ना रचा गया जब अंग्रेज़ों ने, एक षडयंत्र के द्वारा बंगाल मे अपनी सत्ता जमाई और फिर धीरे धीरे पूरे भारत पर कब्ज़ा किया और जानने के लिए यह वीडियो ज़रूर देखें

4- बर्धमान

बर्धमान पश्चिमी बंगाल राज्य के मध्य में बसा वह शहर है जहां मुग़लों से लेकर ब्रिटिश युग तक एक ताक़तवर ज़मींदारी हुआ करती थी जो लाहौर के पंजाबी खतरी थे।और जानने के लिए यह वीडियो ज़रूर देखें

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