भारत के 3 भूवैज्ञानिक चमत्कार

भारत के 3 भूवैज्ञानिक चमत्कार

भारत में सालों से  प्राचीन संस्कृतियां, धर्म और सभ्यताएं चली आ रही  हैं, जिसमें एक महत्वपूर्ण भूगर्भीय अतीत भी  शामिल है। आज भारत में हम जो प्राकृतिक चमत्कार देखते हैं, उनमें से कई लाखों वर्षों से चले आ रहे भौगोलिक परिवर्तनों के परिणाम हैं । उनमें से कुछ पृथ्वी के प्रारंभिक चरणों के हैं  । आइए हम आपको इनमें से तीन भूगर्भीय ख़ज़ानों के बारे मैं बताते हैं ।

1-  विवेकानंद रॉक ( विवेकानंद स्मारक शिला)

आज विश्वास करना मुश्किल है की कभी भारत, अफ़्रिका , दक्षिण अमेरिका, मेडागास्कर, ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका सभी, एक साथ एक महाद्वीप का हिस्सा थे। यह महाद्वीप गोंडवानालैंड कहा जाने लगा । दिलचस्प बात यह है कि गोंडवानालैंड नाम, भूविज्ञानी एडुअर्ड सूस द्वारा मध्य भारत के गोंडवाना क्षेत्र के नाम पर रखा गया था, जो दुनिया के सबसे पुराने ज्ञात क्षेत्रों में से एक है।

गोंडवाना के नाम से जाना जाने वाले महाद्वीप को बाद के प्रीकैम्ब्रियन काल से पूरी तरह से जोड़ा गया था, जो करीब ६००,०००,००० साल पहले की घटना है। गोंडवाना का टूटना विभिन्न चरणों में हुआ और यह एक बार की घटना नहीं थी ।

क़रीब 50 करोड़ साल पहले यूरेशिया से हुई टक्कर ने हिमालय को जन्म दिया था

टूटने की इस घटना की शुरुआत जुरासिक काल में शुरू हो गई थी , लगभग 180 मिलियन साल पहले , जब पृथ्वी पर होमिनिड्स मौजूद हुआ करते थे। गोंडवाना (अफ़्रिक़ा और दक्षिण अमेरिका) का आधे-पूर्वी (मेडागास्कर, भारत, ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका) से अलग हो गया था।

विवेकानंद रॉक मेमोरियल | विकिमीडिया कॉमन्स

दक्षिण अटलांटिक महासागर, लगभग १४०,०००,००० साल पहले खुल गया था क्योंकि उस वक़्त अफ्रीक़ा दक्षिण अमेरिका से अलग हो गया था । क़रीब उसी समय भारत, जो तब भी मेडागास्कर से जुड़ा हुआ था, अंटार्कटिका और ऑस्ट्रेलिया से अलग होकर, मध्य-हिंद महासागर की शुरुआत कर रहा था ।

११८,०००,००० साल पहले क्रेटेशियस काल के दौरान भारत मेडागास्कर से दूर हो गया और ऑस्ट्रेलिया धीरे-धीरे अंटार्कटिका से दूर हो गया था और एक विशाल जिगसा पज़ल के टुकड़ों की तरह टूटकर, बिखर कर फिर जूड़कर अनेक महाद्वीपों में विभाजित हो गया था और ऐसी दुनिया में तबदील हो गया था , जैसी दुनिया आज हम देखते हैं।

लगभग १२०,०००,००० साल पहले, जब भारत ने अपने भूभाग को तोड़ दिया तो वह धीरे धीरे उत्तर की ओर बहने लगा । लगभग ८०,०००,००० साल पहले, इस महाद्वीपीय बहाव की गति अचानक बढ़ गई और यह प्रति वर्ष लगभग 15 सेंटीमीटर उत्तर की तरफ़ दौड़ने लगा । भारतीय भूभाग अंततः लगभग ५०,०००,००० साल पहले यूरेशिया से टकरा गया, जो तहदार पहाड़ों यानी हिमालय को जन्म दे रहा था ।

महाद्वीपीय बहाव के इतिहास में भारतीय उपमहाद्वीप की कहानी बेहद दिलचस्प रही है। महासागरों के पार इसकी शानदार यात्रा ने भूमि का द्रव्यमान और उस पर जीवन को आकार दिया है । विवेकानंद रॉक,  चरनोकाइट रॉक का एक विशाल ब्लॉक है , जो पानी की सतह से व्हेल मछली के कूबड़( उठी हुई पीठ जैसी दिखती हैं ।

विवेकानंद रॉक मेमोरियल तमिलनाडु के कन्याकुमारी में स्थित है। यहां से निकटतम रेलवे स्टेशन कन्याकुमारी रेलवे जंक्शन है जो 2 किमी की दूरी पर है। यहां से सबसे क़रीब एयरपोर्ट है त्रिवेंद्रम इंटरनेशनल एयरपोर्ट (केरल) जो क़रीब 92 किलोमीटर दूर है।

2 – लोनार झील, महाराष्ट्र

लोनार झील अपने शानदार नीले पानी के साथ एक ऐसी जगह है जहाँ भूविज्ञान, खगोल विज्ञान और इतिहास एक साथ मिलते हैं। प्लेइस्टोसिन युग या हिमयुग के दौरान, जिस स्थान पर आज झील है, वहां 2 मिलियन टन वज़न का एक बड़ा उल्कापिंड 90,000 किमी / घंटा की अनुमानित गति से पृथ्वी से टकराया । हाइपर-वेग प्रभाव ने बेसाल्टिक चट्टान में बड़े पैमाने पर गड्ढ़ा पैदा किया जो 1.8 किमी चौड़ा और 137 मीटर गहरा है।

भूगर्भशास्त्री डॉ। पी. डी. सबले कहते हैं कि “यह उल्कापिंड के प्रभाव से बेसाल्टिक चट्टान में बनी विश्व की एकमात्र झील है। आर्गन-आर्गन डेटिंग इस तथ्य की ओर इशारा करता है कि क्रेटर झील 570,000 वर्ष पुरानी है। ”

लोनार क्रेटर झील के महत्वपूर्ण होने का एक और कारण यह है कि यह एक ही समय में क्षारीय और खारा है। झील का खारापन 1958 में 300 पीपीटी से घटकर आज 100 पीपीटी हो गया है। इस बीच झील के पानी का पीएच 10.5 है, इस प्रकार झील के पानी को अत्यधिक क्षारीय बना देता है।

लोनार गड्ढा झील का उपग्रह दृश्य | विकिमीडिया कॉमन्स

मिट्टी, पानी और आर्द्रता के स्थानीय रूपांतर के कारण, इस झील ऐसे वनस्पति और जीव हैं जो दुनिया में शायद ही पाए जाते हों। पानी में पाए जाने वाले दुर्लभ सूक्ष्म जीवों की वजह से झील का रंग विशिष्ट रूप से धुंधला है। यह भी ध्यान रखना दिलचस्प है कि कम्पास क्रेटर के कुछ हिस्सों में काम करने में विफल रहता है।( क्या मतलब हुआ)

झील के भीतर कई हिंदू मंदिरों के अवशेष भी हैं। लेकिन केवल एक मंदिर, जो एक स्थानीय देवी कमलाजा देवी का है, जहां आज भी पूजा होती है। मुग़ल बादशाह अकबर के दरबारी इतिहासकार अबू फ़ज़ल की लिखी किताब आईन-ए-अकबरी में लिका गया है कि लोनार झील के खारे पानी का उपयोग साबुन और कांच बनाने के लिए किया जाता था, इस प्रकार यह पर्याप्त राजस्व देता था।

लोनार क्रेटर झील महाराष्ट्र के बुलढाणा ज़िले में है। निकटतम रेलवे स्टेशन जालना है, जो झील से लगभग 80 किलोमीटर दूर है। निकटतम हवाई अड्डा औरंगाबाद हवाई अड्डा है, जो 135 किलोमीटर दूर है।

3- भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी, अंडमान सागर

यह आश्चर्यजनक है कि दुनिया का 7 वां सबसे बड़ा देश, भारत, एक मात्र देश है जो सक्रिय ज्वालामुखी का घर है। यह ज्वालामुखी, बंगाल की खाड़ी के पास, अंडमान सागर में स्थित बेरेन द्वीप में है, जो पोर्ट ब्लेयर से लगभग 138 किमी दूर स्थित है।

3.2 वर्ग मील के आसपास का यह छोटा द्वीप ज्वालामुखी पर्वतमाला की श्रृंखला में केवल एक द्वीप है, उनमें से अधिकांश पानी के नीचे भारतीय और बर्मी टेक्टोनिक प्लेटों के किनारे पर स्थित हैं।

मूल रूप से बेरेन द्वीप भी पानी के नीचे का एक ज्वालामुखी था, लेकिन लाखों वर्षों से लगातार विस्फोट से मैग्मा ने इसे पानी के बाहर ला दिया। आज इसकी उच्चतम ऊंचाई समुद्र तल से 354 मीटर है। आर्गन-आर्गन डेटिंग के आधार पर, जो ज्वालामुखीय चट्टानों की तारीखों को खोजने का एक तरीका है, अब यह स्थापित किया गया है कि ज्वालामुखी का सबसे पुराना लावा प्रवाह 1.6 मिलियन वर्ष पुराना था। ज्वालामुखी का सबसे पुराना हिस्सा समुद्र तल से 2250 मीटर नीचे समुद्र तल पर स्थित है। यह अब समुद्र तल से 350 मीटर ऊपर है, आप कल्पना कर सकते हैं कि यह कितना ऊंचा हो गया है। कैल्डेरा या वह स्थान जहाँ से ज्वालामुखी फटता है, का व्यास 2 किलोमीटर है और एक तरफ समुद्र में खुलता है।

बंजर द्वीप | विकिमीडिया कॉमन्स

बेरेन द्वीप में सक्रिय विस्फोट का पहला ज्ञात रिकॉर्ड सन 1787 में दर्ज किया गया था, जब एक ब्रिटिश नाविक लेफ्टिनेंट आर.एच. कोलेब्रुक, पेनाग के रास्ते में, जहाज ‘ट्रेल स्नो’ पर सवार था, तब उसने द्वीप के ऊपर गड्ढा से धुआं उठता देखा था।

ज्वालामुखी विस्फोट सन 1803 में दर्ज किया गया था और फिर अगले 188 वर्षों तक कोई गतिविधि नहीं हुई थी और ज्वालामुखी को निष्क्रिय माना गया था। लेकिन यह सन 1991, सन 2003 और सन 2005 में फिर से प्रस्फुटित हुआ। हाल ही में, 23 जनवरी 2017 को, राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान, गोवा से डॉ. अभय मुधोलकर के नेतृत्व में वैज्ञानिकों का एक दल, जो अंडमान और निकोबार क्षेत्र का सर्वेक्षण कर रहे थे, उन्होंने द्वीप पर एक विस्फोट दर्ज किया।

ज्वालामुखी द्वीप पर आबादी नहीं है और द्वीप का उत्तरी हिस्सा, जैसा कि नाम से पता चलता है, बंजर और वहां पेड़-पौधे नहीं हैं। द्वीप पर पाए जाने वाले सबसे दिलचस्प जानवरों में से एक है जंगली बकरी । यह द्वीप पर सबसे बड़ा जानवर है और इसको चारों ओर चरते हुए देखा जा सकता है। दिलचस्प है कि ये बकरियां द्वीप पर मीठे पानी की कमी की वजह से खारा पानी पीती हैं, जिससे वे वास्तव में आश्चर्य की बात हैं। बकरियों की एक छोटी आबादी के साथ, चमगादड़ जैसे अन्य छोटे परिंदे, उड़ने वाली लोमड़ी और कुछ कृंतक प्रजातियां जो उजाड़ बंजर द्वीप पर रहती हैं।

बेरेन द्वीप सार्वजनिक रूप से उपयोग क् लिए प्रतिबंधित है। यह भारतीय नौसेना और तटरक्षक बल द्वारा संरक्षित एक क्षेत्र है क्योंकि यह द्वीप रणनीतिक जगह पर स्थित है।

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