क्या कहती हैं गिरनार अभिलेखों में लिखी कहानियां

क्या कहती हैं गिरनार अभिलेखों में लिखी कहानियां

गिरनार पर्वत अथवा माउंट गिरनार गुजरात में पर्वत की सबसे ऊंची चोटी है। ये बौद्ध, हिंदुओं और जैनियों का पवित्र स्थान है। पर्वत की चोटी पर कई मंदिर हैं, जिनके दर्शन के लिये सैकड़ों श्रद्धालु यहां आते हैं। लेकिन यहां आने वाले लोगों को ये नहीं पता, कि पर्वत की तलहटी में कई राजवंशों के कई अभिलेख हैं। इन्हें “गिरनार अभिलेख” कहा जाता है। इनसे प्राचीन भारतीय इतिहास के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिलती हैं।

ये अभिलेख क़रीब दस फुट ऊंची चट्टान पर उकेरे गए हैं। इनका संबंध प्राचीन भारत के तीन शक्तिशाली राजाओं से है। इस पर महान मौर्य शासक अशोक का ऐलान और धर्मोपदेश, जलाशय की मरम्मत करने का क्षत्रप (शक) शासक रुद्रमन का आदेश और गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त का ब्रह्मी लिपि में संस्कृत भाषा में अभिलेख उकेरा गया है। ये सभी अभिलेख एक ही चट्टान पर अंकित हैं।

चट्टान पर अंकित अभिलेख | गुजरात टूरिज्म

गिरनार पर्वत प्राचीन समय से ही पवित्र स्थान रहे हैं। पर्वत की पांच चोटियों पर जैन और हिंदू मंदिरों के समूह तथा कई बौद्ध गुफाएं हैं। माना जाता है, कि ये 22वें जैन तीर्थंकर नेमीनाथ की निर्वाण भूमि थी। नेमीनाथ को समर्पित 11वीं सदी का एक मंदिर, इस पर्वत के मुख्य आकर्षणों में से एक है। अन्य महत्वपूर्ण मंदिर हैं- 19वीं सदी का तीर्थंकर मल्लीनाथ, अंबा माता मंदिर और गोरखनाथ मंदिर।

गिरनार के जैन मंदिर | विकिमीडिआ कॉमन्स

गिरनार की तलहटी में जूनागढ़ शहर है, जिसका इतिहास क़रीब 2,300 साल पुराना है। ये मौर्य राजवंश का प्रांतीय सत्ता केंद्र हुआ करता था। मौर्य भारत में सबसे शक्तिशाली राजवंशों में एक था, जिसने 321-185ई.पू. में शासन किया था। गिरनार अभिलेख से क़रीब दो कि.मी. के फ़ासले पर 2,300 साल पुराना उपरकोट क़िला है, जिसका निर्माण अशोक के दादा चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में हुआ था। चंद्रगुप्त मौर्य ने ही मौर्य राजवंश की स्थापना की थी। चंद्रगुप्त मौर्य ने 321-297 ई.पू. के दौरान शासन किया था। गिरनार अभिलेखों के अनुसार इस क्षेत्र पर बाद में पश्चिमी क्षत्रपों और गुप्ताओं का शासन हो गया था। सन 475 और सन 767 के दौरान यहां मैत्रक राजवंश का शासन हो गया और फिर 9वीं से लेकर 15वीं सदी तक यहां चुडासमा राजवंश राज करने लगा। इनके बाद 16वीं सदी में यहां मुग़ल साम्राज्य क़ायम हो गया।

इन अभिलेखों में सबसे पुराना उकेरा गया अभिलेख अशोक का फ़रमान (गिरनार रॉक ईडिक्ट) है। अशोक मौर्य राजवंश का तीसरा और सबसे शक्तिशाली राजा था, जिसने 273-236 ई.पू. के दौरान राज किया था। अशोक के शासनकाल में हुई प्रमुख घटनाओं में भीषण कलिंग युद्ध भी था। इस युद्ध में हुए नरसंहार के बाद अशोक को इतनी ग्लानि हुई, कि उसने बौद्ध धर्म अपना लिया था। धम्म (धर्म) की अपनी समझ के आधार पर अशोक ने अपने पूरे साम्राज्य में अभिलेख तैयार करवाये थे। मौजूदा समय के तमिलनाडु और केरल जैसे दक्षिणी क्षेत्रों के सिवाय लगभग पूरे भारतीय उप-महाद्वीप में अशोक का साम्राज्य फैला हुआ था। अशोक के अभिलेख, जिन्हें फ़रमान कहा जाता है, से ही हमें अशोक के बारे में प्रमाणिक जानकारियां मिलती हैं।

अशोक का एक चित्रण

ये फ़रमान सार्वजनिक स्थानों, व्यापार मार्गों और धार्मिक महत्व के स्थानों पर लगाये गये थे, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग इन्हें पढ़ सकें। ये शिला फ़रमान अशोक के संरक्षण में बौद्ध धर्म के प्रसार के बारे में जानकारी के वास्तविक स्रोत हैं।

अशोक के फ़रमानों को उनकी विषय वस्तु और जिन सतह पर वे उकेरे गए हैं, उनके आधार पर वर्गीकृत किया है। ये वर्ग हैं चट्टानों पर उकेरे गए सामान्य फ़रमान, चट्टानें पर उकेरे गए 14 प्रमुख फ़रमान, स्तंभों पर सात उकेरे गए फ़रमान, स्तंभों पर उकेरे गए सामान्य फ़रमान और गुफाओं में उकेरे गए अभिलेख। छोटी चट्टानों और छोटे स्तंभों पर उकेरे गए फ़रमान धर्म संबंधी हैं, जबकि बड़ी चट्टानों और स्तंभों पर उकेरे गए फ़रमान राजनीति तथा नैतिकता से संबंधित हैं। 14 प्रमुख फ़रमानों में अधिकतर धर्मोपदेश और अशोक के उत्तराधिकारियों तथा अधिकारियों के लिये घोषणाएं हैं। इनमें निर्देश दिया गया था, कि साम्राज्य को कैसे चलाया जाए। ये फ़रमान 257-256 ई.पू. में जारी किये गये थे।

अशोक के शिला फ़रमान | विकिमीडिआ कॉमन्स

गिरनार में ये फ़रमान चट्टान की पूर्वोत्तर दिशा में दो पंक्तियों में उकेरे गए हैं, जिनके बीच एक रेखा खिंची हुई है। इन फ़रमानों से अशोक और उसके शासन के बारे बहुत-सी जानकारियां मिलती हैं। अशोक पशु बलि के ख़िलाफ़ था और उसके शासनकाल में लोगों और पशुओं के लिये आश्रय, जल और इलाज की व्यवस्था थी। उसने धम्म (धर्म) की स्थापना और इसके प्रसार के लिये धम्म-महामात्रों (धर्म-महामात्रों) की नियुक्ति की थी। इसके अलावा उसने धम्म-यात्राएं शुरु की थीं और धार्मिक सहिष्णुता पर ज़ोर दिया था। फ़रमान XIII (13) में लिखा है, कि कैसे कलिंग युद्ध ने उसे ग्लानि से भर दिया था और कैसे उसके जीवन में बदलाव आया और वह धम्म (धर्म) के रास्ते पर चल निकला।

मौर्य राजवंश के पतन के बाद इस क्षेत्र पर पश्चिमी क्षत्रपों का शासन हो गया, जो मूलत: मध्य एशिया के शक (स्किथियंस) थे। रुद्रदमन का गिरनार अभिलेख ब्रह्मी लिपि में संस्कृत भाषा में उकेरा गया पहला विस्तृत अभिलेख है। रुद्रदमन प्रथम पश्चिमी क्षत्रपों की कार्दमक शाखा का शासक था, जिसने सातवाहनों को हराया था। उसे महा-क्षत्रप का ख़िताब मिला था।

रुद्रदमन का चांदी का सिक्का | विकिमीडिआ कॉमन्स

रुद्रदमन का गिरनार अभिलेख बहुत दिलचस्प है, क्योंकि इससे हमें प्राचीन भारत में जल-प्रबंधन के बारे में जानकारी मिलती है। प्राचीन समय में सरकार के महत्वपूर्ण कामों में एक काम झीलों, जलाशयों और तालाबों का निर्माण तथा इनका रखरखाव करना था।

रुद्रदमन का अभिलेख | विकिमीडिआ कॉमन्स

हालांकि तीन शासकों का अपने आप में कोई संबंध नहीं था और ये अलग-अलग युग में हुए थे, लेकिन इनमें एक समानता थी, कि इन्होंने सुदर्शन झील के रखरखाव को जारी रखा। प्राचीन समय में झील सिंचाई का एक स्रोत हुआ करती थीं। सुदर्शन झील गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में पानी की महत्वपूर्ण हौजों में एक थी। जूनागढ़ अभिलेख के अनुसार रुद्रदमन प्रथम ने सौराष्ट्र में इस जलाशय की मरम्मत करवाई थी।

सुदर्शन झील का निर्माण चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में उसके प्रांतीय गवर्नर वैष्य पुष्यगुप्त की देखरेख में हुआ था। चंद्रगुप्त मौर्य के पोते अशोक के शानकाल में क्षेत्र के उसके गवर्नर यवन तुषास्प ने इस जलाशय को और बेहतर कर दिया था। लेकिन क़रीब सन 150 में रुद्रदमन के शासनकाल के दौरान एक भयंकर तूफ़ान आया, जिसमें पेड़ उखड़ गये और पर्वतों की चोटियां, द्वार तथा आश्रय क्षतिग्रस्त हो गये। तूफ़ान में जलाशय भी नष्ट हो गया था। लोग बदहाल हो गये थे और झील को इतना नुकसान हुआ था, कि रुद्रदमन के मंत्रियों को लगा, कि इसकी मरम्मत असंभव है। लेकिन इससे रुद्रदमन विचलित नहीं हुआ और उसने जलाशय की मरम्मत का आदेश दे दिया। सबसे प्रशंसनीय बात ये है, कि रुद्रदमन ने बहुत कम समय में जलाशय फिर बनवाया और उसने इस काम के लिये न तो जनता पर कर लगाये और न ही लोगों से मजबूरन श्रम करवाया। मरम्मत के बाद ये जलाशय चारों तरफ़ से तीन गुना अधिक मज़बूत हो गया था। ये काम सौराष्ट्र के प्रंतीय गवर्नर सुविश्ख की देखरेख में हुआ था।

बांध की मरम्मत के अलावा अभिलेख में रुद्रदमन प्रथम की प्रशस्ति भी है। अभिलेख में रुद्रदमन के साम्राज्य का उल्लेख है, जिसमें मालवा, गुजरात, सिंध और पश्चिमी महाराष्ट्र के हिस्से भी थे। अभिलेख में रुद्रदमन प्रथम के व्यक्तित्व का विस्तार से वर्णन है। इसके अनुसार रुद्रदमन प्रथम उदार राजा था जिसकी प्रजा उससे प्रेम करती थी। कहा जाता है, कि वह पढ़ा लिखा था और उसने काव्यों की रचना की थी। युद्ध के अलावा वह लोगों की हत्या करने में विश्वास नहीं करता था। वह लोगों को उपहार भी देता था।

अभिलेख में जूनागढ़ और गिरनार के प्राचीन नामों का भी उल्लेख मिलता है। जूनागढ़ शहर का प्राचीन नाम गिरिनगर और माउंट गिरनार का प्राचीन नाम उरजयत था। रुद्रदमन के जूनागढ़ अभिलेख से पता चलता है, कि प्राचीन भारत में घटनाओं का रिकॉर्ड रखने की परंपरा थी। रुद्रदमन ने अपने समय के पहले जलाशय के लिये किये गये काम का उल्लेख किया है।

पश्चिमी क्षत्रपों के पतन के बाद इस क्षेत्र पर गुप्त शासकों का राज हो गया। चट्टान पर उकेरा गया तीसरा अभिलेख कुमारगुप्त प्रथम के पुत्र राजा स्कंदगुप्त का है। स्कंदगुप्त ने सन 455 से लेकर सन 467 तक शासन किया था। संस्कृत भाषा में लिखा अभिलेख दो हिस्सों में बंटा हुआ है, पहला हिस्सा सुदर्शन झील की मरम्मत से संबंधित है और दूसरा हिस्से में दो मंदिरों के निर्माण का ज़िक्र है। कहा जाता है, कि स्कंदगुप्त ने गुप्त साम्राज्य बहाल किया था। अभिलेख की शुरुआत में लिखा हुआ है, कि कैसे स्कंदगुप्त ने अपने दुश्मनों को हराया। माना जाता है, कि ये दुश्मन हूण के अलावा कोई और नहीं थे।

स्कन्दगुप्त का सोने का सिक्का | विकिमीडिआ कॉमन्स

ये दोनों काम स्कंदगुप्त के शासनकाल में परदत्त के पुत्र चक्रपालिता की देखरेख में हुए थे, जो सौराष्ट्र का गवर्नर था। लगभग सन 455-456 में भीषण वर्षा की वजह से सुदर्शन झील के तट फिर टूट गये। चक्रपालिता ने सन 456-457 के क़रीब दो महीने के भीतर तटों की मरम्मत करवा दी थी। बाद में स्कंदगुप्त के शासनकाल के दौरान चक्रपालिता ने गिरनार पर्वत पर विष्णु के समर्पित एक मंदिर बनाया, जिसका नाम चक्रभृत (चक्र धारण करने वाला) था। इसके अलावा उसने शहर की तरफ़ एक और मंदिर बनवाया। स्कंदगुप्त अंतिम सफल गुप्त राजा था, जिसके बाद गुप्त राजवंश का पतन होने लगा।

स्कन्दगुप्त का अभिलेख | विकिमीडिआ कॉमन्स

गिरनार अभिलेखों की खोज सबसे पहले अंग्रेज़ सैनिक अधिकारी और विद्वान जेम्स टॉड ने सन 1822 में की थी। अभिलेखों का अनुवाद प्राच्यविद् और विद्वान जेम्स प्रिंसेप ने सन 1837 में किया था। बाद में पुरातत्वविद डॉ. जेम्स बर्गीस और भगवानलाल इंद्रजी, भारतीय इतिहास के फ्रांसिसी ज्ञाता एमिल सेनर और जर्मन ज्ञाता लॉरेंज़ फ़्रांज़ कीहॉर्न जैसे विद्वानों ने गिरनार अभिलेखों पर काम किया। इससे प्राचीन भारतीय राजवंशों के समझने में मदद मिली, जो तब भुलाई जा चुकी थीं।

गिरनार अभिलेख आज भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में हैं।

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