जसनगर गाँव के प्राचीन मंदिर 

जसनगर गाँव के प्राचीन मंदिर 

शौर्य, त्याग और बलिदान की गाथाओं से गूंजने वाला मारवाड़, शिल्प तथा स्थापत्य कला की विपुलता और विविधता से भी सम्पन्न प्रदेश माना जाता है। यह क्षेत्र प्राचीन काल से धर्म, संस्कृति, आध्यात्म और कला का प्रमुख केन्द्र रहा है। यहां कई राजवंशों ने अपनी कीर्ति को अक्षुण्ण बनाए रखने तथा संत महात्माओं की प्रेरणाओं से अनेक कलात्मक धरोहरों बनवाईं । आज आपको एक ऐसी ही धरोहर से रूबरू करवाते हैं जो उस गाँव की पहचान बन गई है।

‘जस मिलियो जसवंत ने, पंडित सर रसलीन,
तासे बणग्यों जसनगर, पहले था केकीन,,”

जी हाँ… यह वही जसनगर गाँव है जो शिल्प, स्थापत्य-सौंदर्य और पुरातात्विक सम्पदा के साथ-साथ हिन्दू ,जैन और अन्य धर्मो के मिलन का केंद्र रहा है। यह गाँव राजस्थान के मध्य में नागौर, पाली ज़िला सीमा तथा मारवाड़ की गंगा कही जाने वाली लूनी नदी के किनारे पर बसा है। इस गाँव को पहले केकीन या केकिन्द के नाम से भी जाना जाता था। लोक कथाओं में इसे राजा गंधर्व सेन की राजधानी होने का गौरव भी प्राप्त है। यह गाँव 458 राष्ट्रीय राजमार्ग पर तहसील रियां बड़ी से 25 कि.मी. दूरी पर स्थित है। संस्कृत लेखों में इसे किष्किंधा भी बतलाया गया है। इस गाँव में प्राचीन शीतला माता मंदिर के अलावा कई अन्य धार्मिक और पर्यटक स्थल मौजूद हैं। मगर इस गाँव की विशेष पहचान कालिया मंदिर और धोलिया मंदिर के कारण बनी हुई है।

शिव मंदिर

जसनगर का कालिया मंदिर | लेखक

गाँव के मध्य में यह प्राचीन मंदिर पुरातत्त्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा संरक्षित स्थल घोषित है। कला के जानकार विजय वर्मा बताते हैं कि उत्तर भारत के मंदिर स्थापत्य के अध्ययन के लिए इस मंदिर का विशेष महत्त्व है। भारत में मंदिरों का निर्माण पाँचवीं सदी से शुरू हुआ था। मगर सातवीं सदी तक का काल मंदिर निर्माण का प्रारंभिक और प्रायोगिक काल कहा जा सकता है। इसके बाद के लगभग तीन सौ वर्षों को विकास और क्षेत्रीय शैलियों के सामने आने का काल कहा जा सकता है। लगभग दसवीं सदी आते आते मंदिर निर्माण की तकनीक और कला ने अपनी पूर्णता को प्राप्त कर लया था । इसके बाद कई जगहों पर बड़े-बड़े मंदिरों का निर्माण कार्य शुरू हुआ था। इस शिव मंदिर के बारे में डा. गोपीनाथ शर्मा, डा. सुखवीर सिंह गहलोत, डा. जयसिंह नीरज, डा. भगवती लाल शर्मा, डा. नीलिमा वशिष्ठ, डा. मोहनलाल गुप्ता, डा. चन्द्रमणीसिंह, डा.पेमाराम, किशनलाल मारू सहित कई इतिहासकारों और शोधकर्ताओं ने लिखा है।

शिलालेख

मंदिर के खम्भों पर कई लेख उकेरे गए हैं। एक लेख के अनुसार विक्रम संवत 1176 (लगभग सन 1119) के प्रथम खण्ड में वैशाख पूर्णिमा गुरुवार, चन्द्रग्रहण के दिन राणा महिपाल तथा किष्किंधा के चाहमान रूद्र द्वारा गुणेश्वर मंदिर के भेंट किए जाने का उल्लेख है। दूसरा लेख किष्किंधा के महामण्डलीक श्री राणक पीपलराज के समय संवत 1178 (लगभग सन 1121), चैत्र बदी एकम् का है। इनके अलावा संवत 1200 चैत्र वदी 14, सोमवार को चोपदेव द्वारा दी गई भेंट का उल्लेख है। वहीं संवत 1202 (लगभग सन 1145), चैत्र सुदी 14, गुरुवार को राणी सांवलदेवी और राणा साहणपाल द्वारा भेंटों का उल्लेख है। संवत 1224 (लगभग सन 1167) के लेख में महामण्डलेश्वर श्री जसधरपाल तथा अन्य महाजनों द्वारा गुणेश्वर महादेव मंदिर के दान दिए जाने की सूचनाए मिलती हैं।

मंदिर के प्रवेश द्वार के पास गोवर्धन स्तम्भ | लेखक

अन्य लेख 15वीं से 17वीं सदी के मध्य के भी उकेरे गए हैं। जिनमें मंदिर के जीर्णोद्वार की जानकारी भी अंकित है। यह मंदिर कब और किसने बनवाया इसकी जानकारी वाले लेख मुग़ल आक्रमण के दौरान नष्ट हो गए थे। मगर यहाँ के विभिन्न लेखों से स्पष्ट होता है कि यह मंदिर पहले गुणेश्वर,और बाद में नीलकण्ठ महादेव के नाम से जाना जाता है। वर्तमान में इसे सभी कालिया मंदिर के नाम से जानते हैं।

स्थापत्य कला

मारवाड़ के प्रतिहार वंश के शासकों द्वारा 9वीं और 10वीं सदी के दौरान निर्मित यह मंदिर वास्तुशिल्प की दृष्टि से इस क्षेत्र का महत्त्वपूर्ण स्मारक है। नागर शैली में बना यह मंदिर समकालीन मंदिर वास्तुशिल्प से युक्त गर्भगृह, अन्तराल, निज मण्डप, सभा मण्डप एवं शिखर आदि सम्पूर्ण अवयवों से युक्त है।

गर्भगृह में योनीपट्ट सहित शिवलिंग | लेखक

गर्भगृह में योनीपट्ट सहित शिवलिंग स्थापित है। सामने त्रिमूर्ति ब्रह्म और सुरसुंदरी की खंडित मूर्तिया रखी हुई हैं। गर्भगृह का प्रवेश-द्वार छः शाखाओं से निर्मित है। जिनमें लतापत्र, पुरूष, मातृका, व्याल, बिजोरा और पुष्पलता शाखा से अलंकृत है। मुख्य-द्वार के दाईं ओर मकरवाहिनी गंगा और बाईं ओर कच्छपवाहिनी यमुना सहित दोनों ओर शिव प्रतिहारों का सुंदर अंकन किया हुआ है। द्वार के मध्य ताक़ में शिव सहित अनेक देव प्रतिमाएं बनी हुई हैं। इस मंदिर की अन्तराल छत के मध्य में पूर्ण खिला कमल तथा दोनों ओर अर्द्ध खिले कमलों का अंकन है। यहाँ स्तम्भ द्वादश (बारह का सूचक) कोंणीय ओर लगभग दस फ़ुट ऊँचे हैं, जिन पर सुंदर बेल-बूटे आदि का अंकित हैं।

सभा या निजमण्डप | लेखक

इस मंदिर का निज-मण्डप चैबीस स्तम्भों पर टिका है। इन पर कीर्ति मुख घटपल्लव, ज़ंजीर युक्त घंटियां, पुष्पलता आदि बने हुए हैं। मंदिर गर्भगृह का ब्रह्म जंघा भाग पर तीन प्रधान ताक़ों सहित 38 प्रतिमाएं अंकित की गई हैं, जिनमें दक्षिण क्रम से खंडित प्रतिमाओं की स्थिति निम्न प्रकार है। दिगपाल इन्द्र (चर्तुरबाहु), अग्नि और गणेश, सुरसुंदरी, ब्रह्मणी, यम, मातृका, नैऋत, नटराज शिव, शुक्रप्रिया, वैष्णवी, यमी, इन्द्राणी, वरूण, वायु, चामुण्डा, हंस, दुर्गा, नृत्यांगना, कुबेर एवं ईशान का क्रमबद्ध अंकन किया हुआ है।

मंदिर का शिखर | लेखक

इस मंदिर का शिखर नागर शैली में बना हुआ है। इस मंदिर को भी मुग़ल हमलावरों के कारण काफ़ी नुक़सान हुआ है। लगभग सभी मूर्तियां खंडित की गईं थीं। चैहान और राठौड़ काल में जीर्णोद्वार के समय कुछ अन्य निर्माण किया गया था।

मंदिर में मौजूद कुछ खंडित मूर्तियां | लेखक

इस मंदिर के सभा मण्डप में सम्पूर्ण रामायण और महाभारत की मूर्तियां उकेरी गई हैं, जिसमें राम,सीता,लक्ष्मण और हनुमान जी में वार्तालाप के अलावा यशोदा मैया के गोद में श्री कृष्ण, पूतनावध, माखन चोरी, गजासुर, शकटासुर का वध, बांसुरी वादन, मथुरा में मल्लयुद्ध सहित अन्य प्रसंग सुंदर तरीके से उत्कीर्ण किए हुए हैं।

शिखर के नीचे का भाग | लेखक

जैन मंदिर

इस मंदिर को धोलिया मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर के सभा मण्डप के कुछ स्तम्भ 13वीं सदी के प्रतीत होते हैं। वहीं तीर्थंकर की चरण चौकी पर संवत 1230 आषाढ़ सुदि 9 का उल्लेख है जिसमें आनन्दसुरी की आज्ञा से विधि के मंदिर में मूल नायक की मूर्ति स्थापित किए जाने का उल्लेख है।

धोलिया मंदिर | लेखक

इस मंदिर में एक लेख संवत् 1665 का है जिसमें मारवाड़ के राठौड़ शासकों की वंशावली दी हुई है। लेख में राव मालदेव के प्रपौत्र, उदयसिंह के पौत्र और सूरसिंह के पुत्र गजसिंह के काल का उल्लेख है। लेख के अनुसार उस समय राज्य में चोरी-डकैती का भय नहीं था और न लोग आखेट करते थे। ‘‘नायत्रक्तिाहरणं न चोरी और मद्यपान पर पाबंदी थी । उस समय यहां विजय कुशल, सहज सागर, विनय जय सागर आदि जैन विद्वान रहते थे। तीर्थ-यात्री नापा ओसवाल द्वारा इस मंदिर का मण्डप बनवाए जाने का भी उल्लेख किया हुआ है।

इस मंदिर में पाश्र्वनाथ, चन्द्रप्रभु भगवान सहित अन्य कई मूर्तिया स्थापित की हुई हैं। इस मंदिर में काँच की मीनाकारी का कार्य कुशल कारीगरों द्वारा कड़ी मेहनत एवं लगन से किया गया है। इस मंदिर के निर्माण के बारे में दंतकथा के अनुसार यती महात्माओं द्वारा इसे अपने तपोबल से उड़ाकर लाया गया था। यह अपने आप में एक आश्चर्यजनक बात है। इस प्रकार यह स्मारक हमारे सुनहरे इतिहास की गवाही देते हैं।

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