ज्वालापुरम- राख में दबी  कहानियां

ज्वालापुरम- राख में दबी कहानियां

आंध्र प्रदेश के कुरनूल ज़िले के ज्वालापुरम गांव में कुछ ऐसे बहुमूल्य साक्ष्य दबे हुए हैं जिनसे भारत में आरंभिक मानव जीवन के बारे में जानकारी मिलती है।

मानववैज्ञानिकों की, हमारी मानव जाति ( होमो सेपियन) के उद्गम को लेकर आज भी अलग अलग राय है। सवाल ये होता रहा है कि होमो सेपियनों ने भारत कब आना शुरु किया था और क्या वे अफ़्रीका से एक साथ यहां आ गए थे? 1990 के दशक से इस सवाल पर विचार मंथन होता रहा है। एक मत ये था कि आधुनिक समय के सभी मानवों की उत्पत्ति पूर्व अफ़्रीका की रिफ़्ट वैली (दरार घाटी) से हुई थी और उन्होंने एक लाख और साठ हज़ार साल के दौरान दो खेपों में अफ़्रीका छोड़ा था। इस मत( आउट आफ़ अफ़्रीक़ा) को वैज्ञानिक एलन विल्सन (कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय) और रेबेका कान (हवाई विश्वविद्यालय) के इस बारे में किये गये शोध से बल मिलता है। इनका मानना था कि आधुनिक मानव, उन मानव जातियों के एक समूह के वंशज हैं जो दूसरी लहर में अफ़्रीक़ा से निकले और लम्बा रास्ता तय करके ज्ञात महाद्वीपों के समुद्र तट पर आकर बस गए थे। इस मत पर आधारित विश्वास के अनुसार पहले मानवों, 50 हज़ार पहले भारत आए होंगे।

ज्वालापुरम में खुदाई | विकिपीडिया कॉमन्स

सन 2007 में प्रसिद्ध भारतीय पुरातत्वविद रवि कोरीसेट्टर ने आंध्रप्रदेश के ज्वालापुरम में खुदाई करवाई थी। वह अंतरराष्ट्रीय और स्थीनाय पुरातत्विदों के एक दल के साथ काम कर रहे थे जिसमें ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में ह्यूमन इवोल्यूशन के प्रोफ़ेसर माइकल पेटरैगलिया भी शामिल थे। खुदाई में उन्हें जो मिला वो हमारे क्रमागत विकास अथवा उद्भव को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण साक्षों में से एक था। खुदाई में राख के बड़े ढेर मिले। कुछ ढेर तो दो मीटर की गहराई के नीचे मिले थे। यह राख के ढेर, प्राचीन काल में, माउंट टोबा में फटे ज्वालामुखी का नतीजा थे।

क़रीब 74 हज़ार साल पहले माउंट टोबा (आधुनिक समय में सुमात्रा द्वीप, इंडोनेशिया) में ज़बरदस्त ज्लामुखी फटा था जिसका इस क्षेत्र में विनाशकारी असर हुआ था। ये ज्वालामुखी पिछले बीस लाख सालों में सबसे ज़बरदस्त ज्वालामुखी था। इसके पहले तीन और ज्वालामुखी फटे थे। ये ज्व्वालामुखी अब तक फटे ज्वालामुखियों से सौ गुना भयानक था। ये ज्वालामुखी इतना ज़बरदस्त था कि लावा क़रीब दस सालों तक सुलगता रहा और इसे ठंडा होने में दस हज़ार साल लग गए थे।

माउंट टोबा पर ज्वालामुखी विस्फोट ने एक अवसाद पैदा किया जहां आज टोबा झील खड़ी है | विकिपीडिया कॉमन्स

ज्वालामुखी फटने के समय माउंट टोबा से निकली राख तेज़ हवा की वजह से भारतीय उपमहाद्वीप के एक बड़े हिस्से में बिखर गई। राख बिखरकर पूर्व में दक्षिण चीन सागर और पश्चिम में अरब महासागर में गिर गई। वैज्ञानिकों का मानना है कि ज्वालामुखी के मलबे की वजह से सूरज की रौशनी ढक गई होगी और आसमान काला हो गया होगा। इसकी वजह से दस साल तक बारिश नहीं हुई होगी। इस अवधि को वैज्ञानिक “ज्वालामुखी जाड़ा” कहते हैं।

टोबा माउंट के ज्वालामुखी का असर ज्वालापुर (मौजूदा समय के आंध्र प्रदेश) पर भी पड़ा था। खुदाई से पता चला है कि उस समय भारतीय उपमहाद्वीप का एक बड़ा हिस्सा एक से तीन मीटर राख के ढेर में दब गया था।

लेकिन राख का मिलना और इसकी समयावधि ही बड़ी खोज नहीं थी। राख के ढेर के ऊपर प्राचीन मानव निर्मित पत्थरों के औज़ार भी मिले थे। आश्चर्य की बात ये है कि 74 हज़ार साल पुरानी राख की परत के नीचे पत्थरों के इस तरह के और भी सैंकड़ों औज़ार मिले। इसका मतलब हुआ कि ज्वालामुखी फटने के पहले से ही भारत में मानव जीवन था। पुरातत्वविदों द्वारा की गई खुदाई के अनुसार यहां मिली प्राचीन कला कृतियां उन कला कृतियों से बहुत मिलती-जुलती थीं जो इस समायवधि में दक्षिणी अफ़्रीका में मिली थी जहां मानव जातियां ही औज़ार बनाती थीं।

माइकल पेट्राग्लिया ने विज्ञान की अंतरराष्ट्रीय पत्रिका नैचर में प्रकाशित अपने लेख में लिखा- ‘वे आरंभिक मानव जातियों के बजाय आधुनिक मानव थे – और ये कि वे भारतीय उपमहाद्वीप में रहते थे। पत्थरों के उपकरण या औज़ार एक लाख साल पहले अफ़्रीकी मध्य-पाषाण काल के समय के औज़ारों से मिलते जुलते हैं, जब आधुनिक मानव रहते होंगे।’

इस बात को समझा जा सकता है कि सन 2007 में जब ये मत सामने आया तो इतिहासकारों के बीच खलबली मच गई और इस पर गरमा-गरम बहस छिड़ गई। क्योंकि इससे पहले तक यह माना जाता था कि मानव अफ़्रीका से, इससे बहुत बाद में भारत आए थे।

प्रारंभिक मानव जाति का चित्रण | विकिपीडिया कॉमन्स

खुदाई में और भी बहुत कुछ मिला जिससे पता चलता है कि बहुत पहले से इस क्षेत्र में मानव की मौजूदगी थी।

इस दौरान की गई कई अन्य खुदाईयों में भी इसी तरह की बातों का पता चला है जिससे पहले के विश्वासों पर सवालिया निशान लगता है। हाल ही में जून सन 2017 में मोरक्को में जबल इरहद ( जबल पर्वत) की गुफा में आधुनिक मानव या मानव जाति के एक व्यक्ति की खोपड़ी मिली जो तीन लाख साल पुरानी है। अगर ये सच है तो मानव जाति हमारी कल्पना से बहुत पहले अस्तित्व में रही होगी।

ज्वालापुरम में पुरातत्विद आज भी ये सोचकर दंग हैं कि कैसे इंडोनेशिया में फटे ज्वालामुखी का प्रभाव भारतीय प्रायद्वीप के मध्य रहने वालों पर पड़ा और कैसे ये समय के साथ जम गया जिसने हमारे अतीत पंरं से धुंध हटा दी ।

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