कन्नौज के  इत्र की ख़ुशबू

कन्नौज के इत्र की ख़ुशबू

इतर (इत्र) का नाम सुनते ही ज़हन में मध्ययुगीन बाज़ारों, पतोन्नमुख राजाओं और रानियों का ख़्याल आता है और एक ख़ुशबू का भी एहसास होता है। लेकिन क्या आपको पता है कि भारत में परफ़्यूम बनाने की विश्व में सबसे पुरानी प्रणालियों में से एक है। सदियों पुरानी ये परंपरा आज भी उत्तर प्रदेश के शहर कन्नौज में ज़िंदा है।

इतर शब्द फ़ारसी/अरबी शब्द इत्र से आया है जिसका शाब्दिक अर्थ परफ़्यूम यानी ख़ुशबू होता है।

इतर शब्द फ़ारसी/अरबी शब्द इत्र से आया है जिसका शाब्दिक अर्थ परफ़्यूम यानी ख़ुशबू होता है। हालंकि इत्र को अमूमन पश्चिम एशिया से जोड़कर देखा जाता है लेकिन हम भूल जाते हैं कि भारत सदियों तक इत्र बनाने का केंद्र रह चुका है। इतिहासकार डॉ. परशुराम के. गोडे ने भारत में परफ़्यूम के इतिहास पर काफ़ी गहन शोध किया है। उन्होंने 1961 में ‘स्टडीज़ इन इंडियन कल्चरल हिस्ट्री’ नामक किताब में इत्र के बारे में विस्तार से लिखा है।

सुश्रुता संहिता, चरक संहिता, कामसूत्र, अर्थशास्त्र और मनसोल्लास जैसे प्राचीन भारतीय ग्रंथों में परफ़्यूम का उल्लेख मिलता है, डॉ. गोडे का कहना है कि परफ़्यूम बनाने की कला और विज्ञान का विस्तार में उल्लेख गंगाधर के गंधसार और गंधवाद में मिलता है। ये ग्रंथ 13वीं और 17वीं शताब्दी के हैं। डॉ. गोडे का मानना है कि ये दोनों ग्रंथ संभवत: छठी और 11वीं शताब्दी में लिखे ग्रंथों पर आधारित हैं।

दि्ली और बंगाल तथा गुजरात सल्तनत के शासनकाल के दौरान सुगंधशाला होती थी लेकिन मुग़ल काल में इनका और विस्तार हो गया। ऐसी कई कथाएं हैं जिससे पता चलता है कि मुग़लों के साथ इत्र बनाने की कला भारत में आई थी। कुछ किवदंतियों के अनुसार भारत में इत्र प्रथम मुग़ल बादशाह बाबर लाये थे और कुछ किवदंतियों में इसका श्रेय जहाँगीर और उनकी पत्नी नूरजहां को दिया जाता है। इन दोनों ने भले ही इत्र की ईजाद न की हो लेकिन उनके ज़माने में ये फलाफूला ज़रुर। मुग़ल काल में कन्नौज, जौनपुर और ग़ाज़ीपुर में इत्र बनाने का कारोबार बहुत फलाफूला और कन्नौज में आज भी इत्र बनाया जाता है।

टिपू सुल्तान का इत्र दान | ब्रिटिश म्यूजियम 

कन्नौज प्राचीन भारत के महत्वपूर्ण शहरों में से एक हुआ करता था। कन्नौज 8वीं और 10वीं शताब्दी में पाल, राष्ट्रकूट और गुर्जर-प्रतिहार के बीच संघर्ष का केंद्र था। दिल्ली सल्तनत के फैलाव के बाद एक राजनीति केंद्र के रुप में कन्नौज का महत्व समाप्त हो गया लेकिन मुग़ल और अंग्रेज़ों के शासनकाल में बतौर व्यापारिक केंद्र इसका महत्व बना रहा। समय के साथ कन्नौज इत्र की वजह से प्रसिद्ध हो गया जो आज भी यहां बनाया जाता है।

कन्नौज में पारंपरिक रुप से दो तरह के इत्र बनाये जाते हैं- फूलों पर आधारित और जड़ी बूटियो पर आधारित। फूलों से बनने वाले इत्र में गुलाब, चमेली, ख़स, ऊध और रात की रानी का इस्तेमाल होता है जबकि जड़ी-बूटी से बनने वाले इत्र में दालचीनी, कर्पूर(काफ़ूर), अदरक, चंदन और केसर का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा कई तरह के पौधों, जीव और खनिजों का भी इस्तेमाल कस्तूरी तथा अन्य ख़ुशबू बनाने के लिए किया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि परफ़्यूम बनाने के आधुनिक तौर तरीक़ों के साथ ही , पारंपरिक प्रणाली अभी भी यहां प्रचलित हैं।

कन्नौज में फूलों और अन्य चीज़ों से सुंगंध निकालने के लिए पारंपरिक देग़-भपका तरीक़ा अपनाया जाता है। इस तरीक़े में जिस फूल या चीज़ से ख़ुशबू निकालनी होती है, उसे पानी से भरे कांसे के बड़े बर्तन में फैलाकर भाप दी जाती है और फिर इसे लकड़ी या कोयले की आग में ऱखकर इसका रस निकाला जाता है। इस प्रक्रिया से बनने वाली भाप को बांस के पाइप के ज़रिये चंदन के तेल के ऊपर छोड़ा जाता है जिससे तेल सुगंधित हो जाता है। चंदन के तेल को परफ्यूम के आधार के रुप में प्रयोग किया जाता है। इसके बाद इस रस को ऊंट की खाल से बनी बोतलों में रखा जाता है, इससे’ सारा अधिक पानी सूख जाता है |

नाना फड़नवीस, सांगली संग्रहालय

इस तरह की ख़ुशबुएं आग और पानी की कारीगरी के खेल है इसमें साम्रग्री का संतुलन और समय के प्रबंधन का बड़ा रोल होता है। पर्यावरण की दृष्टि से भी ये प्रक्रिया बहुत लाभदायक है क्योंकि इस प्रक्रिया के बाद बचने वाले सामान अगरबत्ती या फिर हल्के क़िस्म के इत्र बनाने के काम आते हैं। ये उन चंद तकनीकों में से है जिसमें ख़ुशबू बनाने के लिए अल्कोहल का प्रयोग नही होता।

कन्नौज के इत्र बनाने वालों ने एक नायाब तरीका ईजाद किया है जिसके तहत बारिश में पैदा होने वाली ख़ुशबू को संजोकर रखा जाता है। मॉनसून की पहली बारिश की पहली बूंद से ज़मीन से उठने वाली ख़ुशबू क्या होती है ये हम सब जानते हैं। हमें सोचेंगे की बारिश की पहली बूंद से ज़मीन से निकलने वाली सोंधी सुंगंध की कैसे नक़ल की जा सकती है? लेकिन कन्नौज के इत्रवालों ने ये कर दिखाया है। वे इसे ‘गीली मिट्टी’ या ‘मॉनसून’ कहते हैं। इस ख़ुशबू को बनाने के लिए मिट्टी के टूटे बर्तनो को आसवन प्रक्रिया से गुज़ारा जाता है।

नाना फड़नवीस, सांगली संग्रहालय

कन्नौज को प्रतिष्ठित भौगोलिक संकेत टैग भी मिला है जो जीआई (GI) टैग अकहलाया जाता है | यह पहचान उस वस्तु अथवा उत्पाद को दिया जाता है जो कि विशिष्ट क्षेत्र का प्रतिनिधत्व करती है, अथवा किसी विशिष्ट स्थान पर ही पायी जाती है। GI टैग कृषि उत्पादों, प्राकृतिक वस्तुओं तथा निर्मित वस्तुओं उनकी विशिष्ट गुणवत्ता के लिए दिया जाता है। कन्नौज में फ़्रेगरेंस एंड फ़्लेवर डेवलपमेंट सेंटर (एफ़एफ़डीसी) है जो भारत सरकार ने स्वदेशी उद्योग को बढ़ावा देने के लिए 1991 में बनाया था।

हालंकि इस इंडस्ट्री को बचाने के लिए कई क़दम अठाए जा रहे हैं लेकिन कन्नौज की इत्र इंजस्ट्री की स्थिति अच्छी नहीं है और इत्र बनाने की कई सदियों पुरानी यूनिटें बंद हो रही हैं। इसकी एक वजह तो ये है कि चंदन की लकड़ी जैसा कच्चा माल आसानी से नहीं मिलता और दूसरी वजह है बाज़ार में उपलब्ध अल्कोहल से बनने वाले सस्ते परफ़्यूम। लेकिन कन्नौज के इत्र बनाने वाले अपनी विरासत को बचाने की भरसक कोशिश कर रहे हैं जो अपने आप में विश्व में अनोखी है। आज के ज़माने में लोग परफ़्यूम पसंद करते हैं लेकिन हम उम्मीद करते हैं कि कन्नौज के इत्र को उसकी वो जगह मिलेगी जिसका वो हक़दार है।

* मुख्य चित्र: मुग़ल कल का इत्रदान, मेट्रोपोलिटन म्यूजियम ऑफ़ आर्ट

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