लखनऊ की ऐतिहासिक  कोठियाँ 

लखनऊ की ऐतिहासिक कोठियाँ 

लखनऊ शहर सीधे एक परियों के कहानी से बाहर आता है जिसे नवाबी युग के दौरान उत्तरी भारत की सांस्कृतिक राजधानी माना जाता था। लखनऊ अवध की राजधानी बनी जब नवाब आसफ उद दौला ने 1775 सीई में फैजाबाद से अपनी राजधानी यहां स्थानांतरित कर दी। उत्तर प्रदेश की राजधानी जो एक नवाबों की सीट थी, जिसने इसे दरबारी शिष्टाचार, सुंदर उद्यान, कविता, संगीत और अच्छे व्यंजनों के साथ एक बहु सांस्कृतिक शहर में बदल दिया।

नवाब अपने पीछे शानदार इमारतों और बगीचों की एक श्रृंखला छोड़ गए जो हमें नवाबी युग की याद दिलाती है। लखनऊ महान ऐतिहासिक महत्व और स्थापत्य चमत्कारों के स्मारकों का घर है जो उनकी भव्यता को बनाए रखते हैं, जो आज तक शहर के गौरवशाली इतिहास की दास्तां बता रहे हैं। आज हम आपको लखनऊ के ऐसे 5 ऐतिहासिक कोठियों के बारे में बताते हें

1- छतर मंज़िल पैलेस

फ़रहत बख़्श कोठी या , छतर मंज़िल पैलेस शहर की स्थापत्यकला के बेहतरीन नमूनों में से एक है जिसे आज छतर मंज़िल के नाम से जाना जाता है। भवन की बनावट की वजह से इसका नाम छतर मंज़िल पड़ गया। मेजर जनरल क्लॉड मार्टिन ने अपने निवास के पास गोमती नदी के किनारे के जंगलों को साफ़ कर फ़रहत बख़्श कोठी बनाई थी जिसे वह अपना टाउन हाउस कहते थे। मार्टिन का शहर के बाहर भी एक बड़ा घर था जिसे कोंस्टेंशिया कहते थे और जहां अब ला मार्तिनियर कॉलेज है। फ़रहत बख़्श कोठी का निर्माण कार्य सन 1781 में पूरा हो गया था और मार्टिन यहां सन 1800 तक रहे। यहीं एक कमरे में उनका निधन हुआ था।

नदी से छत्तर मंजिल पैलेस, लखनऊ 1864  | ब्रिटिश लाइब्रेरी

फ़रहत बख़्श कोठी या छतर मंज़िल उस समय एक अनूठी इमारत थी। भवन का भू-तल भी दो मंज़िला था, ये मंज़िलें तभी नज़र आती थीं जब नदी का जलस्तर बहुत कम हो जाता था। इस तरह के तलघर बहुत बड़े होते थे और मॉनसून में जब नदी का जलस्तर बढ़ जाता था तब इनमें पानी भर जाया करता था। ऐसे में ये तलघर ख़ाली छोड़ दिए जाते थे और नदी का जलस्तर कम होने पर ही यहां वापसी होती थी। तलघर के दो तरफ़ अष्टकोणीय मीनारें थीं, जहां से हवा आती थी ताकि तलघर ठंडा रहे। हाल ही में मिली शाही गोंडोला नाव से इन बातों को बल मिलता है। और पढ़ें…

2- रोशन-उद-दौला कोठी

अवध के दूसरे नवाब नसीरउद्दीन हैदर (1827-1837) के शासनकाल में ताज-उद-दीन मुहम्मद हुसैन ख़ान सन 1832 से लेकर सन 1837 तक अवध के प्रधानमंत्री रहे थे। उन्हें नसीरउद्दीन हैदर ने ख़ुद रोशन-उद-दौला का ख़िताब दिया था और तभी से उन्हें इसी नाम से जाना जाता था। कहा जाता है कि रोशन उद्दौला चालाक और महत्वाकांक्षी मंत्री थे जिनका मासिक वेतन 25 हज़ार रुपये था। उन्हें घर के रखरखाव के लिये पांच लाख रुपये सालाना भी मिलते थे। इसके अलावा राज्य के राजस्व में भी उनका पांच प्रतिशत कमीशन होता था जो लगभग पांच लाख रुपये सालाना होता था। उनकी दो पत्नियों को सरकारी ख़ज़ाने से वेतन के रुप में, हर महीने, क्रमश: पांच और तीन हज़ार रुपये मिलते थे।

रोशन-उद-दौला कोठी एल्बम फोटो - लखनऊ 1880 की | ब्रिटिश लाइब्रेरी

मुख्य क़ैसर बाग़ महल की दक्षिण-पश्चिम दिशा में रोशन-उद-दौला कोठी स्थित है जिसका निर्माण सन 1827-34 के दौरान हुआ था। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि रोशन-उद-दौला ने, अपने लिये जो कोठी बनवाई थी ,वह इंडो-फ़्रैच शैली में बनी बहुत भव्य कोठी थी और ये अवध के नवाबों और राजाओं के महलों को भव्यता के मामले में टक्कर देती थी। कोठी का उत्तरी हिस्सा पहले बना था जिस पर असफ़उद्दौला के दौलत ख़ाने का प्रभाव दिखआई देता है। कोठी का दक्षिणी हिस्सा दूसरे चरण में बनवाया गया था जो देखने में तो अलग था लेकिन पांच प्रवेश द्वारों से जुड़ा हुआ था। और पढ़ें..

3- तारेवाली कोठी

अवध के नवाब नसीरउद्दीन हैदर (1827-1837) हमेशा भारतीय और यूरोपीय चापलूस मित्रों से घिरे रहते थे और वो इन्हें, ख़ासकर यूरोपीय दोस्तों को, प्रभावित करने का कोई भी मौक़ा हाथ से नहीं जाने देते थे। इनमें से किसी एक ने जब नवाब को खगोलीय बेधशाला बनाने का सुझाव दिया तो वह फ़ौरन राज़ी हो गये क्योंकि खगोल और ज्योतिष विधा में उनकी बहुत दिलचस्पी थी जिसके बारे में लोग जानते भी थे। इस तरह एक साल के भीतर ही सन 1832 में शाही बेधशाला बनाने का काम शुरु हो गया।

तारेवाली कोठी - दरोगा अब्बास अली c.1874। | ब्रिटिश लाइब्रेरी

इस काम के लिये कलकत्ता से कैप्टन हरबर्ट को अवध के नवाबों की राजधानी लखनऊ बुलवाया गया। हज़रतगंज के एक विशाल भू-खंड पर नव-क्लासिकी शैली में दो मंज़िला बेधशाला बनाई गई जिसके बीच में दो बड़े सभागार थे जिनके नीचे एक बेसमेंट था। ऊपरी मंज़िल के ऊपर अवलोकन के लिये एक छोटा गोलाकार कमरा बनवाया गया। कमरे के ऊपर धातु का एक अर्धगोलाकार गुंबद था जिसे चरखी और चकरी से घुमाया जा सकता था। गुंबद में शटर लगे हुए थे और खगोलीय पिंड को देखने के लिये इन्हें उसी अनुसार घुमाया जा सकता था। इसीलिये नवाब ने बेधशाला का नाम “ तारे वाली कोठी ” रखा था।

नसीरउद्दीन हैदर ने ये बेधशाला सिर्फ़ खगोलीय पिंड को देखने के लिये नहीं बनवाई थी। वह चाहते थे कि यहां युवा दरबारी खगोल शास्त्र और भौतिक विज्ञान के बारे में जानकारी लें। इस बात का उल्लेख कैप्टन हरबर्ट की डायरी में मिलता है । और पढ़ें..

4 – दिलकुशा कोठी

लखनऊ के प्रतिष्ठित इमारतों में एक इमारत है दिलकुशा महल जो ऐतिहासिक ला मार्टिनियर कॉलेज के पास शहर की पूर्वी दिशा में स्थित है। ये कोठी शहर की गहमा गहमी से दूर एक शांत इलाक़े में है। दिलकुशा महल अथवा कोठी का शाब्दिक अर्थ ‘दिल को ख़ुश करने वाला’ या ‘मेरा दिल ख़ुश’ होता है। इस कोठी का निर्माण अवध के छठे नवाब सआदत अली ख़ान के लिये सन 1805 में करवाया गया था। चारों तरफ़ हरियाली से घिरा ये महल एक ऊंची ज़मीन पर स्थित है जिसे अंगरेज़ मेजर गोर औउसले की देखरेख में बनवाया गया था जो नवाब के एक अच्छे दोस्त थे। ये महल घर के साथ साथ एक सैरगाह भी था जो यूरोपीय शैली में बना हुआ है। चूंकी ये गोमती नदी के किनारे था इसलिये नवाब और उनका परिवार आराम और शिकार के लिये यहां नाव से आसानी से आया जाया करते थे।

दिलकुशा कोठी

दिलकुशा कोठी आरंभ में तीन मंज़िला इमारत हुआ करती थी जिसमें भू-तल भी होता था। इसके चार सजावटी अष्टकीणीय बुर्ज हुआ करते थे और जिन पर चमकीली पॉटरी सजी होती थी। महल में प्रभावशाली सीढ़ियों से प्रवेश किया था। ये सीढ़ियां बरामदे के नीच मध्य प्रवेश द्वार तक जाती थीं। इस बरामदे की सुरक्षा के लिये बड़े स्तंभ थे जो दूसरी मंज़िल की छत तक ऊंचे थे। दिलकुशा कोठी की दो बार मरम्मत हुई थी, पहली बार 1830 में और दूसरी बार 1870 में। कहा जाता है कि कोठी की डिज़ाइन सन 1721 में निर्मित इंग्लैंड के नॉर्थम्बरलैंड के सीटन डेलावल हॉल की डिज़ाइन से काफ़ी मिलता जुलता है। और पढ़ें..

5- मूसा बाग़

लखनऊ शहर के पश्चिम छोर यानी गोमती नदी के तट पर मूसा बाग़ के अवशेष हैं जो देखने में भूतहा लगते हैं लेकिन उसमें गुज़रे ज़माने की शाही आभा भी नज़र आती है। भारतीय- यूरोपीय शैली में बनी इस कोठी के अवशेषों को देखकर इसके गौरवशाली समय को आज भी मेहसूस किया जा सकता है। शहर से दूर इस कोठी में अवध के छठे नवाब सआदत अली ख़ां (1798-1814) शग़ल के लिये यहां वक़्त बिताया करते थे। कोठी के साथ शाही अतीत तो जुड़ा ही हुआ है लेकिन इसका समृद्ध और रहस्मय इतिहास भी है। सन 1857 के बग़ावत के दौरान ये क्रांतिकारियों का अड्डा हुआ करता था। इसके अलावा इसके साथ भूत-प्रेत की कहानी भी जुड़ी हुई है जो इसमें और भी दिलचस्पी पैदा कर देती है।

मूसा बाग़ - 1858 | विकिमीडिआ कॉमन्स 

मूसा बाग़ में एक हिस्से में चार मंज़िलें और दूसरे हिस्से में नीचे की तरफ़, पानी के पास दो मंज़िलें हुआ करती थीं। यहां लाल मिट्टी की नलियां बनी हैं जिनके ज़रिये नदी की ठंडी हवा ऊपर छत तक जाती थी। और पढ़ें..

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