मराठा इतिहास के भूले हुए अध्याय

मराठा इतिहास के भूले हुए अध्याय

भारत के इतिहास में 18वीं सदी एक महत्वपूर्ण मोड़ थी। ये वो समय था जब मराठा साम्राज्य दक्षिण में तंजावुर से लेकर उत्तर में अटक तक फैल गया था। हम जहां छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे शासकों के शासन के बारे में जानते हैं जिन्होंने साम्राज्य स्थापित किया था, लेकिन हम ये नहीं जानते कि पेशवाओं के शासनकाल में साम्राज्य महत्वपूर्ण और अधिक शक्तिशाली बना। लेकिन आज लोगों को मराठा वैभव के बारे में कितना याद है? क्या हम मराठा इतिहास के कई अध्यायों के बारे में कुछ ख़ास जानते हैं?

मराठा साम्राज्य का नक्शा | LHI

इस युग के महान साम्राज्य के निर्माताओं के कई स्मारक और यादगारें आज उपेक्षा, अज्ञानता तथा बेपरवाही के शिकार हैं। मराठा इतिहास में कल्पना से भी बड़े पेशवा बाजीराव की समाधि, मध्य प्रदेश के एक गांव में जर्जर हालत में थी। ये समाधि बाजीराव पेशवा की एकमात्र निशानी है। लेकिन सन 2000 के दशक में, इतिहास में दिलचस्पी रखने वाले चंद लोगों ने मिलकर इसे बचाया है।

पेशवा बाजीराव की समाधि | श्रीमंत बजीराव पेश्वा जनकल्याण समिति

मराठों का साम्राज्य बहुत वीराट था जिसकी शुरुआत एक क्षेत्रीय शक्ति के रुप में हुई थी। हम अपने क्षेत्रीय इतिहास के बारे में इतना कम क्यों जानते हैं? क्या ये भाषांतर में खो गया लगता है?

हमारी साप्ताहिक श्रंखला हेरिटेज मैटर्स के दूसरे एपिसोड में हमने इन सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की और ये जानने की कोशिश भी की है कि हमारे अतीत को बेहतर ढंग से समझने के लिए स्थानीय ऐतिहासिक दस्तावेज़ों और सूत्रों तक पहुंच कितना महत्वपूर्ण है। मराठा “लेगेसी-लॉस्ट इन ट्रांसलेशन” नामक शीर्षक के इस सत्र में हमारे मेहमान थे पुणे स्थित इतिहासकार उदय कुलकर्णी, जिनकी मराठा इतिहास पर लिखी किताबें ख़ूब पढ़ी जाती हैं।

उद्योगपति और टोयोटा किर्लोस्कर मोटर कम्पनी के उपाध्यक्ष विक्रम किर्लोस्कर, जिन्हें इतिहास, ख़ासकर मराठा इतिहास और ऐतिहासिक धरोहर में बहुत दिलचस्पी है। 5एफ़ वर्ल्ड एंड पुणे सिटी कनेक्ट के अध्यक्ष डॉ. गणेश नटराजन जो पुणे सिटी की विकास परियोजना से क़रीब से जुड़े हुए हैं और जो जन सक्रियता तथा संरक्षण के हिमायती भी हैं। हमारे साथ इस सत्र में एक ख़ास मेहमान भी जुड़े हैं जिनका नाम है गौरव मंडलोई जिन्हें इतिहास और ऐतिहासिक धरोहरों में दिलचस्पी है और जो ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण तथा इसके लिए मुहिम के बारे में अच्छी जानकारी रखते हैं। गौरव पिछले आठ साल से मध्य प्रदेश में रावेरखेड़ी गांव में पेशवा बाजीराव की समाधि को बचाने के प्रयासों में लगे हैं।

क्या मराठा इतिहास भाषांतर में खो गया है?

कई बार स्थानीय इतिहास भाषा की वजह से ज़्यादातर लोगों की पहुंच के बाहर होता है। पुराने दस्तावेज़ों और स्रोत को स्थानीय भाषा में सनद किया जाता है और ये आम लोगों तक तभी पहुंच सकता है जब इनका अनुवाद हो। ऐसी सूरत में प्रामाणिक सूचना के प्रसार के लिए अनुवाद बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। डॉ. कुलकर्णी ने मराठा इतिहास पर किताब लिखने के पहले शोध तथा पुराने दस्तावेज़ों को निकालकर उनका अनुवाद किया था। उन्होंने अपने शोध के दौरान क़रीब दो सौ ऐसे दस्तावेज़ों का पता लगाया जो लंदन में रॉयल एशियाटिक लाइब्रेरी में थे। ये दस्तावेज़ अंग्रेज क़रीब दो सौ साल पहले लंदन ले गए थे। डॉ. कुलकर्णी ने ऐसे कई दस्तावेज़ों का मराठी भाषा की मोदी लिपि से देवनागरी लिपि में अनुवाद किया किया।

उन्होंने कहा, ‘कुछ अपवादों को छोड़कर आप पाएंगे कि कुछ अपवादों को छोड़कर,अधिकतर मराठा इतिहास मराठी भाषा में लिखा गया है। महाराष्ट्र के बाहर अधिकतर लोगों को ये नहीं पता कि मराठों ने दरअसल किया क्या था।’ इस बात से डॉ. कुलकर्णी, मराठा इतिहास को अंग्रेज़ी भाषा में लिखने के लिए प्रेरित हुए ताकि आने वाली पीढ़ियों को अतीत के इस अध्याय के बारे में जानकारी मिल सके। उन्होंने सॉल्स्टिस एट पानीपत (2012), द इरा ऑफ़ बाजीराव (2016), द एक्स्ट्रॉर्डनरी एपोच ऑफ़ नानासाहब पेशवा (2020) जैसी किताबें लिखीं जिनमें हमें मराठों के इतिहास के कई दिलचस्प और अनजान पहलुओं के बारे में जानकारी मिलती है। डॉ. कुलकर्णी ने मराठी गद्य पानिपतची बखर (बखर आफ़ पानीपत) का हिंदी और फिर अंग्रेज़ी में अनुवाद कियामजो बाद में किताब के रुप में प्रकाशित हुआ।

पानीपत के उपर उदय कुलकर्नी की किताब   | amazon.in

डॉ. नटराजन के अनुसार, मराठा पूरी तरह से विविधतापूर्ण और एकीकृत समुदाय का एक उदाहरण हैं। उन्होंने तंजावुर शहर में मराठों की छोड़ी गई सांस्कृतिक विरासत का भी ज़िक्र किया। सन 1675 और सन 1855 में तंजावुर में मराठा राजओं का शासन होता था। तंजावुर के मराठा राजाओं में से सबसे प्रसिद्ध थे महाराजा सरफोजी जो शिक्षा और कला के बहुत बड़े संरक्षक थे। डॉ. नटराजन ने तेलुगु नाटक “पल्लकी सेवा प्रबंधम” का उल्लेख किया जो तंजोर के शाहजी महाराज (1684-1710) ने लिखा था। ये नाटक तमिलनाडु में तिरुवरुर मंदिर में किए जाने वाले अनुष्ठान पर आधारित है।

डॉ. नटराजन के अनुसार, इस नाटक में तमिलनाडु, महाराष्ट्र तथा दक्षिण भारत के कई हिस्सों की संस्कृतियों का मिश्रण है। ये कला के ऐसे रुप पर आधारित है जिसका चलन दो शताब्दियों तक रहा। ये वो चीज़ है जो हम पुणे लाना चाहते हैं और लोगों को बताना चाहते हैं कि उस समय भी आप संस्कृति के द्वारा आपस में एकसूत्र में बंध सकते थे। आज भी तिरुवरुर मंदिर में हर साल एक बार “पल्लकी” का नृत्य नाटिका के रुप में आयोजन होता है।

मराठा धोरोहर को कैसे बचाया जाए !

भारत में ऐतिहासिक धरोहरों का हाल बहुत बुरा है। ये बात आज देश में मराठा विरासत छोड़कर गए कई मराठा शासकों पर भी ख़री उतरती है। पूरे उप-महाद्वीप में मराठा दबदबे का श्रेय बाजीराव-प्रथम को जाता है। हालंकि सन 1740 में चालीस की उम्र में ही उनका निधन हो गया था लेकिन कहा जाता है कि उन्होंने कभी कोई युद्ध हारा नहीं था। अपनी एक मुहिम के दौरान जब पेशवा बाजीराव-प्रथम का नर्मदा नदी के तट पर निधन हो गया तब उनके जनरल महदजी सिंधिया ने उनके सम्मान में यहां एक समाधि बनवाई थी।

बाजी राव की प्रतिमा | LHI

सन 1930 के दशक से ये भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की सूची में है लेकिन इस दौरान ये समाधि गुमनामी के अंधेरे में खोई रही है। सन 2015 में आई बॉलीवुड फ़िल्म बाजीराव मस्तानी के बाद लोगों का कुछ ध्यान इस समाधि की तरफ़ गया। क़रीब आठ साल से गौरव मंडलोई मोगावा जैसे धरोहर कार्यकर्ता रावेरखेड़ी को बचाने की मुहिम में लगे हुए हैं। गौरव को इस समाधि के बारे में तब पता चला जब वह किशोर अवस्था में थे। वह समाधि के इतिहास और और उसकी स्थिति से इतने विचलित हो गए कि उन्होंने देश की विरासत को समझने और उसे संरक्षित रखने के लिए हेरिटेज मैनेजमेंट कोर्स कर लिया। गौरव ने स्थानीय संगठनों, प्रशासन और लोगों के साथ मिलकर इस स्थल को विकसित और इसे संरक्षित करने की मुहिम चला रखी है। हाल ही में इन्होंने यहां एक सड़क और पुल बनवाने में सफलता हासिल की है। यहां एक साइनबोर्ड भी लग गया है। ये लोग सोशल मीडिया के ज़रिए भी जागरुकता मुहिम चलाते हैं। गौरव ने कहा, “हमारे क्षेत्र में इतने बड़े योद्धा की समाधि होना हमारे लिए गर्व की बात है लेकिन समाधि अनदेखी का शिकार थी। लेकिन हमने सोचा की कैसे लोगों के साथ रोज़ की एक्टिविटीज करके इसे एक महत्वपूर्ण स्मारक बनाया जाए।”

हालंकि अभी इस दिशा में बहुत कुछ काम होना है लेकिन इन प्रयासों की वजह से कम से कम स्थानीय लोगों को तो समाधि के महत्व के बारे में पता लग ही गया है। गौरव की राय में धरोहर की हिफ़ाज़त करना सिर्फ़ सरकारी विभागों की ही ज़िम्मेदारी नहीं है बल्कि सार्वजनिक-निजी साझेदारी के ज़रिए भी इस तरह की धरोहरों और ऐतिहासिक स्मारकों को संरक्षित करने तथा इन्हें बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है। उनका सुझाव है कि ख़ामियों में, मौक़े तलाशना भी एक तरीक़ा हो सकता है। सी.एस.आर. (कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी) मुहिम और उद्योग तथा कॉरपोरेट जगत द्वारादिए जाने वाले अवसरों से भी रावेरखेड़ी जैसी धरोहर-मुहिम को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

किर्लोस्कर का मानना है कि हमारे इतिहास और धरोहर को समझने के लिए जब बात शिक्षा और जागरुकता की आती है तो पाठ्यक्रम में मानव विज्ञान को शामिल करना बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। उनका सुझाव है कि समय आ गया है कि हम इस दिशा में हो रहे कामों को उनका वाजिब हक़ दें। “मुझे लगता है कि जैसे जैसे समाज आगे बढ़ता है, ये जानना बहुत ज़रुरी हो जाता है कि अतीत में क्या हुआ। इस बात ने मुझे हमेशा आकर्षित किया है कि ये शासक देश को कैसे चलाते होंगे। उनके पास हुनर था…भारत में चीज़ों का निर्माण होता था। फ़िरौती जैसी चीज़ों के लिए दी गई बड़ी-बड़ी रक़मों का इतिहास में उल्लेख है, लेकिन आख़िर ये रक़म आई कहां से? ज़ाहिर है कि इस तरह का धन पैदा करने का कोई तो तरीक़ा रहा होगा। मुझे लगता है कि निर्माण के मामले में हम कहीं भटक गए हैं और ये इसलिए हुआ क्योंकि हमने अपनी कला को सम्मान नहीं दिया है। अगर आप ये जानना चाहें कि एक मशीन कैसे काम करती है तो पहले आपको पता होना चाहिए कि आपका हाथ कैसे काम करता है…हम इससे कहीं भटक गए हैं… ”

डॉ. नटराजन का मानना है लोगों को अनके इतिहास और धरोहर के बारे में जागरुक बनने के लिए तकनीक में संवर्धिक वास्तविकता (आगमेंटेड रियलिटी) और आभासी वास्तविकता( वर्चुअल रियलिटी) जैसी प्रगति, दोनों को जोड़ा जा सकता है।

डॉ. कुलकर्णी का कहना था, “हमारे स्मारकों के प्रति लोगों में जागरुकता और दिलचस्पी पैदा की जानी चाहिए। ये तभी संभव है जब स्मारकों से जुड़ी कहानियां और लोकप्रिय होंगी। इसलिए कहानियों का लोगों तक पहुंचना ज़रुरी है और तभी लोगों की स्मारकों में दिलचस्पी पैदा होगी। कई स्मारक सुंदर और आकर्षक नहीं हैं लेकिन उनसे जुड़ी कहानियां बहुत दिलचस्प होती हैं…इसके अलावा स्मारकों का आत्मनिर्भर होना भी ज़रुरी है….और इसके लिए संयुक्त प्रयासों की ज़रुरत है….”

हम आशा करते हैं कि हम साथ मिलकर न सिर्फ़ हमारी राष्ट्रीय धरोहर को बचा सकते हैं बल्कि क्षेत्रीय इतिहास को उसका जाइज़ हक़ भी दिलवा सकते हैं।

ये सत्र अंग्रेज़ी में हमारे चैनल पर दिखाया गया है। आप इस सत्र की पूरी परिचर्चा अंग्रेज़ी में यहां देख सकते हैं-

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