भारतीय उपमहाद्वीप की 4 महत्वपूर्ण और अद्भुत मस्जिदें

भारतीय उपमहाद्वीप की 4 महत्वपूर्ण और अद्भुत मस्जिदें

भारत कई धर्मों और संस्कृतियों का देश है, और इस्लाम उनमें से एक है।  मस्जिद मुसलमानों के लिए नमाज़ पढ़ने की जगह के रूप में बनवायी जाती है जिनमें जटिल कलात्मक विवरणों के साथ निर्मित सुंदर संरचनाएं होती हैं। भारत की कुछ मस्जिदों के शानदार वास्तुशिल्प देखते ही बनती है जो हमे उस वक़्त के ऐतिहास के बारे में जानकारी देती है।

आज हम आपको ऐसे ही 4 मस्जिदों के बारे में बताते हैं।

1- थट्टा मस्जिद, सिंध

क्या आप जानते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे खूबसूरत मस्जिदों में से एक सिंध में थट्टा की ‘नीली मस्जिद’ है? थट्टा की जामिया मस्जिद को पांचवें मुगल सम्राट, शाहजहाँ द्वारा बनवाया गया था। लेकिन आगरा के ताजमहल और दिल्ली की जामा मस्जिद जैसे अन्य स्मारकों के विपरीत, पाकिस्तान में यह मस्जिद, हालांकि सुंदरता और भव्यता के बराबर है, पर्याप्त ध्यान आकर्षित करने में विफल रही है।

पाकिस्तान में करांची से एक सौ कि.मी. दूर थट्टा आज एक धीमी रफ़्तारवाला शहर है लेकिन किसी समय ये सिंध की राजधानी और व्यापारिक केंद्र हुआ करता था। थट्टा राजधानी की ख़ुशहाली की वजह उसकी भौगोलिक स्थिति थी। क्योंकि ये सिंघ नदी के मुहाने पर बसा हुआ था। थट्टा कई राजवंशों का सत्ता केंद्र रहा है। सन 711 में उमय्यद ख़िलाफ़त के जनरल मोहम्मद बिन क़ासिम ने स्थानीय शासक राजा दहीर से ये क्षेत्र छीन लिया था। अरब हमले के बाद 11वीं शताब्दी के आरंभ में मेहमूद गज़नी ने यहां आक्रमण किया। ये हमला सन 1000 और सन 1027 के दौरान तुर्की मूल के सुल्तान के, भारतीय उप-महाद्वीप पर किए गए 17 हमलों में से एक था। गज़नी के स्थानीय सेनापति इब्न सुमर ने सिंध में सत्ता हथिया कर सुमरा राजवंश की स्थापना की जिसने सन 1051 से लेकर सन 1351 तक राज किया। सन 1351 में सम्मा राजवंश जिसे राजपूत वंश का माना जाताहै, ने इस क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया और थट्टा को अपनी राजधानी बना लिया। यहीं से आने वालों वर्षों तक थट्टा ने अपना सुनहरा समय देखना आरंभ किया था।

मुख्य नमाज हॉल में प्रवेश का रास्ता केंद्रीय आंगन से है। | विकिमीडिआ कॉमन्स 

मस्जिद निर्माण के पीछे कहानी कुछ इस तरह है। सन 1626 के क़रीब शाहजहां ने अपने पिता जहांगीर के ख़िलाफ़ बग़ावत कर मुग़ल साम्राज्य की प्रांतीय राजधानी थट्टा में शरण ले ली थी। शाहजहां को डर था कि उन पर पिता का भरोसा उठ चुका है और कामयाब सैन्य अभियानों के बावजूद जहांगीर उन्हें अपना अत्तराधिकारी नहीं बनानेवाले हैं।

शाहजहां की, अपनी सौतेली मां यानी बेगम नूरजहां से भी खुली अदावत चल रही थी जो शहज़ादे शहरयार (शाहजहां का छोटा भाई) को अगला बादशाह बनावाना चाहती थीं। एक बाग़ी शहज़ादे के तौर पर भी थट्टा में, सिंधी लोगों की मेहमान नवाज़ी से शाहजहां बहुत प्रभावित हुआ। जब शाहजहां बादशाह बना तो उसने इस मेहमान नवाज़ी के बदले थट्टा में एक मस्जिद बनाने का आदेश दिया। और पढ़ें

2- ख़ानक़ाह शाहबाज़िया मस्जिद, बिहार

प्राचीन काल में ‘अंगदेश’ के नाम से मशहूर भागलपुर की शोहरत आज अपने उम्दा सिल्क उत्पादों के कारण ‘सिल्क सिटी’ के रूप में है। पटना-हावड़ा लूप रेल रुट पर गंगा के दक्षिणी किनारे पर बसे इस शहर में धार्मिक, आध्यात्मिक और लोक-आस्था से जुड़े कई स्थल हैं । यह शहर पीर-पैग़म्बरों के आस्तानों और समृद्धशाली अतीत के साथ, यहां सदियों से चली आ रही गंगा-जमुनी संस्कृति की मिसाल भी पेश करता है।

पटना-हावड़ा लूप रेल लाईन पर पटना से 223 कि.मी. पूरब भागलपुर रेलवे स्टेशन के पश्चिमी केबिन के निकट स्थित ख़ानक़ाह शाहबाज़िया की शाही मस्जिद और मदरसे के साथ सैयद शाह शाहबाज़ रहमतुल्लाह का नाम जुड़ा हुआ है जिनकी गिनती उन चालीस सूफ़ी संतों में की जाती है जिनके बारे में मान्यता है कि उन्हें ख़ुदा के हुक्म से इस ज़मीं पर भेजा गया है। कहते हैं कि इस पवित्र आस्ताने में सबकी दुआ क़ुबूल होती है और सबकी मुरादें पूरी होती हैं। यही कारण है मुस्लिम समुदाय के साथ हिन्दू तथा हर क़ौम के लोग यहां आकर हाज़िरी देते हैं।

ख़ानक़ाह शाहबाज़िया मस्जिद | विकिमीडिआ कॉमन्स 

आज से तक़रीबन 181 वर्ष पूर्व सन 1838 में भागलपुर की यात्रा करनेवाले अंग्रेज़ विद्वान मान्टगोमरी मार्टिन अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री, एंटीक्विटीज़ एण्ड स्टेटिस्टिक्स ऑफ़ इस्टर्न इंडिया’ में लिखते हैं कि यहां ख़ासकर मुसलमानों द्वारा सबसे पवित्र माना जानेवाला स्थान मौलाना शाहबाज़ की दरगाह है। मार्टिन बताते हैं कि यहां रोज़ाना श्रद्धालु चढ़ावा चढ़ाते हैं, लेकिन यहां सबसे ज़्यादा लोग, अश्विन महीने (सितम्बर से अक्टूबर तक) में आते हैं।

यह हज़रत शाहबाज़ मोहम्मद का इक़बाल ही है कि बादशाह शाहजहां और फ़र्रुख़ सियर सहित कई मुग़ल शहज़ादे यहां हाज़िरी दे चुके हैं। बंगाल के नवाब मुर्शिद क़ुली खां और कई बड़ी हस्तियां इनके दर पर मात्था टेक चुकी हैं।

सूफ़ी संतों और फ़क़ीरों की सरज़मीं रही भागलपुर में सुहरवर्दी सिलसिले की दो अन्य हस्तियां भी हुई हैं जिनमें एक हैं शेख़ अलाउद्दीन चिर्मपोश (पुरैनी), जिनके आध्यात्मिक शिष्यों में अम्बर के संत अहमद चिर्मपोश सरीखे नाम शामिल हैं। दूसरे हैं मख़दूम सैयद हुसैन पीर दमड़िया, जिनके पिता मख़दूम सैयद हसन पीर दमड़िया के आशीर्वाद से मुग़ल बादशाह हुमायूं दूसरी बार हिन्दुस्तान के तख़्त पर बैठे। यही वजह रही कि अकबर से लेकर शाह शुजा और औरंगज़ेब तक तमाम शहज़ादों की आस्था उनके प्रति बनी रही। प्रो.एच.एस. असकरी अपनी पुस्तक ‘इस्लाम एण्ड मुस्लिम इन मिडिवल बिहार’ में सूबे के सुहरवर्दी सूफ़ी-संतों की चर्चा करते हुए फ़रमाते हैं कि 17 वीं सदी में बिहार में सुहरवर्दी सिलसिले की दो प्रमुख हस्तियां हुई हैं। इनमें से एक हैं पटना के दीवान शाह अरज़ान और दूसरे हैं भागलपुर के मौलाना मोहम्मद शाहबाज़ जो कि मौलाना यासीन सुहरावर्दी के आध्यात्मिक शिष्य और एक महान परम्परावादी संत थे। और पढ़ें

3- सीदी सैय्यद मस्जिद, गुजरात

यह मस्जिद अहमदाबाद की सबसे बड़ी या सबसे पुरानी मस्जिद नहीं है, लेकिन सीदी सैय्यद मस्जिद शहर की एक प्रसिद्ध प्रतीक है। और जानने के लिए देखे यह वीडियो

4- चेरामन जुमा मस्जिद, केरल

उत्तरी कोच्चि के छोटे-से शहर मेथाला के एक कोने में सिमटी-सी दो मंज़िला मस्जिद है – चेरामन जुमा मस्जिद। इस मस्जिद की खासियत यह है की इसे भारत का सबसे पहला मस्जिद माना जाता है। और जानने के लिए देखे यह वीडियो

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