नासिक की गुफाओं के साथ गौतमीपुत्र सातकर्णि का संबंध

नासिक की गुफाओं के साथ गौतमीपुत्र सातकर्णि का संबंध

नासिक शहर के बाहर व्यस्त मुंबई-नासिक राजमार्ग के पास एक छोटी-सी पहाड़ी पर 24 बौद्ध गुफाओं का एक समूह है, जिसे पांडव लेणी अथवा पांडवों की गुफा कहा जाता है। ये गुफाएं नासिक के स्थानीय लोगों, सुबह सैर करने वालों और सेल्फ़ी खींचने वाले युवाओं में बहुत लोकप्रिय है| लेकिन कम ही लोग जानते हैं, कि इन गुफाओं में एक दीवार पर मशहूर नासिक प्रशस्ति अंकित है, जो प्राचीन भारत के महान राजाओं में एक गौतमीपुत्र सातकर्णि की गौरवपूर्ण गाथा बताती है।

प्रथम और द्वितीय सदी में शासन करने वाला ये सातवाहन राजा, अपने आप में अनूठा था, क्योंकि वह उन चंद राजाओं में से एक था, जिसे उसकी मां गौतमी-पुत्र के नाम से जाना जाता था। इस मृतक राजा के सम्मान में उसकी मां गौतमी बालाश्री के आदेश पर ही नासिक-गुफाओं में शिलालेख लिखवाया गया था, जो नासिक प्रशस्ति के नाम से प्रसिद्ध है। इस शिलालेख के अलावा, यहां सातवाहन राजवंश से संबंधित और भी कई शिलालेख हैं, जिनकी वजह से नासिक गुफाओं का बहुत ऐतिहासिक महत्व है।

नासिक की गुफाओं का एक हिस्सा

द्वितीय ई.पू. और द्वितीय सदी के बीच दक्कन के ज़्यादातर हिस्सों पर सातवाहनों का शासन होता था। रोमन साम्राज्य के साथ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की वजह से सातवाहन शासक बहुत समृद्ध और शक्तिशाली थे। उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंदी क्षत्रप थे, जो गुजरात, राजस्थान और मालवा के अधिकतर हिस्सों पर राज करते थे। दिलचस्प बात ये है, कि सातवाहनों और क्षत्रपों के बीच कई युद्ध हुए, लेकिन दोनों ने ही नासिक गुफाओं को संरक्षण दिया, जिसकी वजह से ये गुफाएं और दिलचस्प हो जाती हैं।

प्रथम ई.पू. और तृतीय सदी इसवी के दौरान बनी ये गुफाएं महाराष्ट्र में सबसे पुरानी बौद्ध गुफाओं में से एक हैं। दक्कन में अधिकतर गुफाओं की तरह नासिक गुफाएं भी प्राचीन व्यापार मार्ग पर बनवाई गई थीं। ये व्यापार मार्ग तटीय क्षेत्र को मध्य भारत से जोड़ता था। ये गुफाएं थाल घाट दर्रे के पास स्थित हैं, जो प्राचीन सोपारा बंदरगाह को जोड़ने वाले सड़क मार्गों में से एक था। इन गुफाओं में कई अभिलेख हैं, जो इनकी विशेषता है। दिलचस्प बात ये है, कि इन अभिलेखों में विभिन्न पृष्ठभूमि के लोगों-राजाओं और रानियों से लेकर व्यापारियों तथा आम लोगों द्वारा किये गये दान का उल्लेख है। इनमें से हर किसी ने अपनी हैसियत के अनुसार गुफा बनाने में योगदान किया था।

गुफा नंबर 3- गौतमीपुत्र विहार

24 गुफाओं में से गुफा नंबर तीन सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। इसे गौतमीपुत्र विहार के नाम से जाना जाता है। इस गुफा में सातवाहन राजवंश से संबंधित कई अभिलेख हैं। सातवाहन राजवंश का सबसे महान शासक गौतमीपुत्र सातकर्णि था जिसने अपना साम्राज्य तोलंगाना से लेकर मालवा, बरार और कोंकण तक फैला दिया था। गुफा परिसर में सबसे पुराना अभिलेख गौतमीपुत्र का है, जिसका आदेश क़रीब 124वीं सदी में उनके 18वें राज्य-संवत में दिया गया था। अभिलेख के अनुसार गौतमीपुत्र ने गुफा में रहने वाले भिक्षुओं को 200 निवर्तन भूमि (200 निवर्तन का इलाक़ा) दान की थी जो पहले क्षत्रप राजा नाहापना के वाइसराय उषवदत्त के पास थी। ठीक इसके नीचे 130वीं सदी में उनके 24वें राज्य संवत से एक अभिलेख है, जिसमें पूर्व में किये गये दानों में बदलाव का उल्लेख है।

 

गुफा 3

इस गुफा में प्रसिद्ध नासिक प्रशस्ति है, जो उनकी मां गौतमी बालाश्री ने 19वें राज्य वर्ष के दौरान सन 149 में अपने पोते वशिष्ठपुत्र पुलुवमी के सम्मान में बनवाया था। ये उन प्रमुख अभिलेखों में से एक है, जो गौतमीपुत्र सातकर्णि की सैन्य-विजय पर रौशनी डालता है। अभिलेख के अनुसार गौतमीपुत्र ने साका, यवन और पहलवा राजाओं को हराया था। कहा जाता है, कि गौतमीपुत्र ने क्षत्रपों को ख़त्म कर सातवाहन परिवार की गरिमा बहाल की थी। अभिलेख के अनुसार महारानी गौतमी बालाश्री ने ये गुफा बनवाकर संघ मठवासी समुदाय को भेंट की थी।

नासिक प्रशस्ति

इस गुफा में एक अन्य सातवाहन अभिलेख गौतमीपुत्र सातकर्णि के पुत्र वशिष्ठपुत्र पुलुवमी के बारे में है, जिसने सन 130 से लेकर सन 150 तक शासन किया था। इस पर सन 152 अंकित है और इसमें उसकी दादी गौतमी बालाश्री द्वारा बनवाई गुफा में रहने वाले भिक्षुओं को गांव भेंट किये जाने का उल्लेख है।

गुफा नंबर 10- नाहापना गुफा

दिलचस्प बात है, कि नासिक प्रशस्ति जहां दावा करता है, कि कैसे गौतमीपुत्र ने क्षत्रपों को नेस्तनाबूत कर दिया था, वहीं गुफा-परिसर में नाहापना गुफा (गुफा नंबर 10) है, जिसमें क्षत्रप शाही परिवार द्वारा किये गये दानों का ज़िक्र है।

गुफा 10

क्षत्रप मध्य एशिया से आए स्किथियंस अथवा शक के वंशज थे। स्किथियंस अथवा शक सदियों तक भारत में रहे थे और उनका भारतीयकरण हो गया था। क्षत्रप पश्चिम भारत के बड़े हिस्से पर राज करते थे और वे संस्कृत भाषा के संरक्षक भी थे। इसीलिये इसमें कोई अचरज नहीं होता, कि गुफा नंबर दस के अभिलेख दक्कन में ज्ञात वो अभिलेख हैं, जो संस्कृत में हैं, हालांकि ये संस्कृत विशुद्ध नहीं है, क्योंकि इनमें अन्य भाषाओं का भी मिश्रण है। गुफा में पश्चिमी क्षत्रप शासक नाहापना के परिवार से संबंधित छह अभिलेख हैं। नाहापना ने पहली सदी में शासन किया था और उसने गौतमीपुत्र सातकर्णि के साथ कई युद्ध किये थे। इस गुफा में अभिलेख नाहापना के दामाद उषवदत्त और उसकी पत्नी दक्षमित्रा (नाहापना की बेटी) के हैं। यहां के अभिलेख में सातवाहनों को हराने के बाद उषवदत्त द्वारा भिक्षुओं को सोने के तीन हज़ार सिक्के, भोजन और आसरा देने का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा उषवदत्त की पत्नी दक्षमित्रा द्वारा भी दान करने का अभिलेख है।

शाही परिवार के दान के अलावा गुफा परिसर में अलग अलग लोगों द्वारा भी दान करने के प्रमाण हैं। तपसिनी नाम की एक महिला तपस्वी ने संघ के भिक्षुओं को गुफा नंबर सात जबकि मछुआरे मुगुदास ने गुफा नंबर आठ भिक्षुओं को भेंट की थी।

दाएं से बाएं, गुफा नंबर 6, गुफा नंबर 7, गुफा नंबर 8, गुफा नंबर 9

गुफा नंबर 12 के एक रिकॉर्ड के अनुसार रामनका नामक एक व्यक्ति ने बारिश से बचाव के लिये वस्त्र ख़रीदने हेतु भिक्षुओं को एक सौ कार्षापण (प्राचीन भारतीय सिक्के) दान किये थे। दिलचस्प बात ये है, कि यहां यूनानी श्रद्धालुओं के भी अभिलेख हैं, जिन्हें यवन कहा जाता था। ख़ुद को यवन धर्मवेद का पुत्र बताने वाला इंद्रागनीदत्त नामक यवन श्रद्धालु ने भिक्षुओं को उपहार में देने के लिये गुफा नंबर 17 बनाई थी।

गुफा 17

गुफा नंबर 18 परिसर में एकमात्र चैत्य (प्रार्थना गृह) गुफा है। ये अन्य गुफाओं से छोटी और साधारण भी है। यहां के अभिलेख के अनुसार भाटपालिका नाम की एक महिला ने चैत्य पर महारथ हासिल करने के लिये इस गुफा के निर्माण में दान किया था। इस महिला को अभिलेख में महा हाकु सिरी की पोती बताया गया है।

गुफा नंबर 18 का चैत्य गृह

छठी सदी के बाद से भारत में बौद्ध धर्म के पतन के बाद भिक्षु इन गुफाओं को छोड़कर चले गये। समय बीतने के साथ इनके इतिहास से अनभिज्ञ स्थानीय लोग इन गुफाओं को पांडव लेणी अथवा पांडवों की गुफा कहने लगे। उनका विश्वास था, कि इन गुफाओं को पांडवों ने बनाया था।

गुफा नंबर 20 में बुद्धा और बोधिसत्व की मूर्ती

इन गुफाओं के इतिहास को लेकर तब जिज्ञासा जागी जब सन 1823 में अंग्रेज़ अफ़सर कैप्टन जैम्स डेलामैन यहां आया और इसके बारे में एक पत्रिका में लिखा। बाद में डॉ. आर.जी. भंडारकर, जॉर्ज बुहलर, एडवर्ड वेस्ट, आर्थर वेस्ट और भागवानलाल इंद्रजी जैसे भारतीय इतिहास के विद्वानों ने इन गुफाओं में मिले अभिलेखों का अध्ययन किया। इससे सातवाहनों के शासन के भुला दिये गये इतिहास पर नयी रौशनी पड़ी।

बारिश क मौसम के दौरान गुफाओं से दिखता दृश्य

आज ये गुफा-परिसर ट्रैकिंग करने वालों के लिए एक लोकप्रिय स्थान है| लेकिन उम्मीद की जाती है. कि जो लोग यहां आते हैं ,वे इसे एक नयी रौशनी में देखेंगे।

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