उमदा-उत-तवारीख: सिख इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत

उमदा-उत-तवारीख: सिख इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत

शेरे-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह के जीवन से जुड़े काफी रोचक किस्से कहानियां हैं, जिन पर अक्सर चर्चा की जाती है और उनकी प्रमाणिकता को लेकर सवाल भी उठाए जाते हैं। महाराजा के जीवन एवं राज्य के संबंध में अभी तक हज़ारों पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं, सैंकड़ों शोध-पत्र पढ़े जा चुके हैं तथा तत्कालीन अंगे्रज़ यात्रियों ने अपने सफरनामों में भी इसका विस्तार से उल्लेख किया है, परंतु एक ऐसी भी पुस्तक है जिसे सिख राज्य तथा महाराजा रणजीत सिंह से संबंधित जानकारियों में एक प्राथमिक जगह प्राप्त है। इस पुस्तक का नाम ‘उमदा-उत-तवारीख’ है, जो किसी विदेषी लेखक या किसी विष्वविद्यालय के नामी प्रोफेसर अथवा विद्वान इत्यादि की नहीं, बल्कि महाराजा की दिनांक-पत्री लिखने वाले लाला सोहन लाल सूरी की दरबारी गतिविधियों, राज्य के हालात तथा महाराजा के जीवन से जुड़ी घटनाओं पर आधारित एक इतिहासिक रचना है।

उमदा-उत-तवारीख | विकिमीडिआ कॉमन्स 

चूंकि सोहन लाल सूरी स्वयं खालसा दरबार के कर्मी थे और बेषक उनकी रचना पर महाराजा का अपना व्यक्तिगत प्रभाव होना स्वाभाविक है। किंतु यह भी सत्य है कि यह पुस्तक सिख राज्य की समकालीन है और इस से राज्य की हर गतिविधि को एक ‘रोज़नामचा’ की भांति प्रमुख दस्तावेज़ के तौर पर समझा जा सकता है।

मुंशी सोहन लाल सूरी के पिता गणपत राय सूरी, शुक्करचक्कीया मिसल (महाराजा रणजीत सिंह के दादा सरदार चढ़त सिंह द्वारा कायम की गई मिसल) के मुंषी थे और वे महाराजा रणजीत सिंह के दादा स. चढ़त सिंह शुक्करचक्कीया तथा बाद में महाराजा के पिता स. महां सिंह के समय मिसल का पूर्ण लेखा-जोखा रखते रहे। महाराजा ने लाहौर पर कब्ज़ा करने के बाद सूरी परिवार को विषेष सम्मान दिया और उनके लाहौर में निवास के लिए शहर के मोची गेट के अंदर बाज़ार चैहट्टा मुफ्ती बाकर में आलीषान हवेली बनवाकर दी। सन् 1812 में सोहन लाल सूरी ने दरबारी इतिहासकार की हैसियत से लाहौर दरबार का रोज़नामचा लिखना शुरू किया, जिस में लाहौर दरबार से संबंधित सभी प्रकार की जानकारियां प्रतिदिन लिखी जाती थीं। सोहन लाल के पिता द्वारा लिखा शुक्करचक्कीया मिसल का लेखा-जोखा और इतिहास उन्हें विरासत में मिल गया। जिस में पंजाब के विगत् पूरे 750 वर्ष का इतिहास दर्ज था।

लाहौर दरबार। | विकिमीडिआ कॉमन्स 

सोहन लाल सूरी को पर्षियन, अरबी, पंजाबी, संस्कृत तथा हिंदी भाषा में अच्छा ज्ञान होने के साथ-साथ गणित तथा खगोल विद्या में भी महारत हासिल थी। वे सुजान राय भंडारी से बहुत प्रभावित थे, जो मुगल बादषाह जहांगीर के समय कलानौर के कानूंगो थे और जिन्होंने बादषाह औरंगजेब तक के शासन का सारा मुगल इतिहास ‘खुलासत-उल-तवारीख’ में कलमबद्ध किया था। सोहन लाल ने उसी तर्ज पर सिक्ख राज्य के सम्पूर्ण इतिहास को पर्षियन भाषा में लिखना शुरू किया, जिसे ‘उमदा-उत-तवारीख’ का नाम दिया गया। सोहन लाल सूरी ने इस पुस्तक में सन् 1812 से लेकर सन् 1849 की लाहौर दरबार से संबंधित सभी जानकारियों को पाँच अंकों में दर्ज किया। इन्हें फारसी में ‘दफ्तर’ कहा जाता था।

पहला दफ्तर जिस के 172 पृष्ठ हैं, में गुरू नानक देव जी से लेकर सन् 1771 का इतिहास दर्ज है। दफ्तर दो के 408 पृष्ठ हैं और इसमें स. चढ़त सिंह शुकरचक्कीया से लेकर सन् 1830 तक का लेखा-जोखा दर्ज है। तीसरे दफ्तर के 764 पृष्ठ हैं और इसमें सन् 1831 से लेकर महाराजा रणजीत सिंह के देहांत तक अर्थात सन् 1839 तक की जानकारियां दर्ज हैं। चैथे दफ्तर के 218 पृष्ठ हैं और इसमें सन् 1839 से लेकर सन् 1845 तक की जानकारियां तथा अंतिम व पाँचवें दफ्तर में सन् 1845 से लेकर सिक्ख राज्य की समाप्ति तक का इतिहास व दरबार की जानकारियां दर्ज हैं। उमदा-उत-तवारीख के कुल 1700 पृष्ठ हैं और सन् 1852 में सोहन लाल सूरी का देहांत होने के 34 वर्ष बाद अंग्रेज़ सरकार द्वारा पहली बार इसे सन् 1886 में लाहौर से पुस्तक के रूप में प्रकाषित करवाया गया।

महाराजा रणजीत सिंह | विकिमीडिआ कॉमन्स 

इतिहास में दर्ज है कि महाराजा रणजीत सिंह ने सोहन लाल सूरी के काम से खुष होकर लाहौर के पास गांव मांगा की जागीर उन्हें इनाम के तौर पर दी। सिक्ख राज्य की समाप्ति के बाद उन्होंने सिक्ख राज्य का सारा लेखा-जोखा और उनके पास मौजूद सभी जानकारियां अपने लिखे एक पत्र सहित ब्रिटिष सरकार को सौंप दीं, जो आज भी राॅयल एषियाटिक सोसाईटी लायब्रेरी लंदन में मौजूद हैं। इसी कारण पंजाब में सिक्ख राज्य की समाप्ति के बाद ब्रिटिष हुकूमत ने सोहन लाल सूरी की गांव मांगा की जागीर आबाद रखी और उन्हें 1225 रूपये सालाना पैंषन मिलती रही।

शेरे-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह से संबंधित इतिहास को समय-समय पर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। कभी शेरे-पंजाब की निष्पक्षता को निषाना बनाया गया, तो कभी उनके वंषजों की प्रमाणिकता को ही कटघरे में खड़ा कर दिया गया। स्वयं इतिहास ने भी शेरे-पंजाब की गरिमा को भी ज़़ख्म देने में कोई कसर नहीं छोड़ी।अतः महाराजा रणजीत सिंह से संबंधित इतिहास में पैदा किए गए उक्त भ्रम तथा संदेह से बाहर निकलने के लिए सिख राज्य के मूल स्रोत माने जाते सिक्ख राज्य के वकील, दरबारी इतिहासकार और महाराजा की दिनांक-पत्री लिखने वाले लाला सोहन लाल सूरी द्वारा लिखित ‘उमदा-उत-तवारीख’ को पढ़ना बेहद जरूरी बन जाता है।

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