शामलाजी- गुजरात का दो हज़ार साल पुराना व्यापारिक केंद्र

शामलाजी- गुजरात का दो हज़ार साल पुराना व्यापारिक केंद्र

मेहसाणा-उदयपुर राजमार्ग 8 पर एक छोटा-सा नगर है जिसे शामलाजी कहते हैं। ये शहर गुजरात के अरावली ज़िले में मेश्वो नदी के तट पर स्थित है। भारत के सबसे व्यस्त राजमार्ग पर ये मुसाफ़िरों के आराम करने का एक महत्वपूर्ण ठिकाना है। मुंबई से सूरत, वड़ोदरा, अहमदाबाद, उदयपुर और आगरा से होता हुआ दिल्ली तक जाने वाला राजमार्ग 8 गुजरात और राजस्थान की सबसे महत्वपूर्ण जीवन रेखा है। अरावली पर्वत श्रंखला में दाख़िल होने के पहले शामलाजी अंतिम स्टॉप है। ये यहां से बनास-बेड़च नदी के पठार में मिल जाता है जहां आज उदयपुर है। ये इस मार्ग पर एक महत्वपूर्ण स्टॉप है और ऐतिहासिक तथा मध्यकाल में तो ये और भी महत्वपूर्ण स्टॉप होता था। उस समय व्यापारी बैल गाड़ियों में लदे अपने सामानों के साथ यहां सुस्ताने के लिये रुका करते थे।

शामलाजी में खुदाई का दृश्य। पीछे क़िलेबंद दीवारें | भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण

मेशवो नदी घाटी का इतिहास बहुत पुराना है। यहां पाषाण तथा लघु पाषाण युग के कई स्थान हैं जिनका एम.एस. विश्वविद्यालय के पुरातत्व और गुजरात पुरातत्व विभाग ने पता लगाया है। 1960 के दशक में श्याम सागर जलाशय बनने के पहले पूरी मेशव नदी घाटी डूब गई थी और साथ ही पाषाण युगीन स्थल भी डूब गए थे। इसके साथ क्षत्रप युग का बौद्ध धार्मिक स्थल देवनी मोरी भी जलमग्न हो गया था। चौथी सदी में क्षत्रप शासक रुद्रसेन तृतीय (348-378) के शासनकाल के दौरान यहां ईंटों का एक सुंदर स्तूप बनवाया गया था जो गुजरात में एकमात्र स्तूप था। रुद्रसेन-तृतीय ने एक सुंदर पुरावशेष मंजूषा (casket) दान की थी। इस पर अंकित अभिलेख के अनुसार इसमें बुद्ध के अवशेष हैं। इस परिसर में दो विहार और कई छोटे स्तूप हैं। इसके अलावा यहां ईंटों का एक अनोखा मेहराबदार मंदिर भी था। ये परिसर 9वीं शताब्दी के आस पास वीरान हो गया था।

शामलाजी में मुख्य मंदिर | विकिमीडिआ कॉमंस

आधुनिक समय में शामलाजी में एक सुंदर मंदिर है जो शामलाजी के अवतार में कृष्ण और विष्णु भगवान को समर्पित है। 15वी-16वीं शताब्दी का ये आधुनिक शहर एक प्राचीन ऐतिहासिक स्थान पर स्थित है।

शामलाजी में क़िलेबंद दीवार, नीचे और पुराने अवशेष  | भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण

सन 1961-62 में प्रो.सुब्बाराव की देखरेख में देवनी मोरी और शामलाजी में एस.एस. विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग ने खुदाई करवाई थी। खुदाई में पता चला कि क्षत्रप के समय ये शहर क़िलेबंद था। इसकी वजह ये थी कि ये एक महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग पर स्थित था। शहर के आस पास ईंटों की ठोस दीवारें हुआ करती थी। खुदाई में क्षत्रप समय के पहले भी यहां आबादी के बारे में पता चला जो शायद पहली शताब्दी के आस पास रही होगी।। क्षत्रप युग के दूसरे चरण का शहर भी क़िलेबंद था और यहां मिली ईंटों का आकार देवनी मोरी में मिली ईंटों के बराबार है। इससे साबित होता है कि दूसरे चरण का शहर चौथी-पांचवी शताब्दी के समय का रहा होगा। अगले चरण में यहां मैत्रक राजवंश का शासन हो गया और अंत में यह आरंभिक मध्यकाल में नष्ट हो गया। यहां से गुजरात सुल्तान (अहमद शाह प्रथम 1410-1443), मेवाड़ रियासत और बड़ौदा गायकवाड़ (खांडेराव सहित 1870) के समय के सिक्के मिले हैं। यहां एक अच्छा ख़ासा आधुनिक शहर बसा करता था।

शामलाजी का मंदिर शहर की प्रमुख विशेषता है। इस मंदिर के निर्माण को लेकर कई तरह की लोक कथाएं हैं। एक लोक कथा के अनुसार भगवान ब्रह्मा ने यहां एक हज़ार साल तक तपस्या की थी और जब भगवान शिव प्रसन्न हो गए, तो उन्होंने ब्रह्मा से यज्ञ करने को कहा। यज्ञ के दौरान भगवान शामलाजी के रुप में प्रकट हुए। दूसरी लोक कथा के अनुसार देवों के वास्तुकार विश्वकर्मा ने यहां आकर एक रात में मंदिर बना दिया था लेकिन इसके पहले कि वह मंदिर ले जाते दिन निकल गया और इस तरह उन्हें मंदिर यहीं छोड़ना पड़ा। तीसरी लोक कथा काफ़ी संभव लगती है। इसके अनुसार एक स्थानीय आदिवासी को शामलाजी की मूर्ति मिली थीं। उसने मूर्ति की पूजा शुरु कर दी और उसकी खेतीबाड़ी अच्छी होने लगी। इस बात का पता चलने पर वैष्णव संप्रदाय के एक व्यापारी ने एक मंदिर बनवाकर वहां इस मूर्ति की स्थापना करवा दी। इसके बाद इडर रियासत के शासकों ने मंदिर में और काम करवाकर इसे सुंदर बनाया। शामलाजी इडर रियासत में आता था। हाल ही के इतिहास से पता चलता है कि एक धनवान व्यापारिक परिवार ने भी इसका जीर्णोद्धार करवाया था।

हर साल यहां कार्तिक पूर्णिमा (अक्टूबर-नवंबर) के समय एक बड़ा मेला लगता है जो तीन हफ़्ते तक चलता है। मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालु ऊंट-गाड़ियों में यहां आते हैं और भजन कीर्तन करते हैं। वे मेशवो नदी में स्नान भी करते हैं। शामलाजी को साक्षी गोपाल अथवा गदाधर भी कहा जाता है। मंदिर की मूर्ति गुप्त काल (7वी-8वीं सदी) के अंतिम वर्षों में या फिर गुप्त काल के बाद की वास्तुकला का नमूना लगती है। गुजरात में वैष्णव संप्रदाय 7वीं और 8वीं शताब्दी में तेज़ी से फैला था। उस समय इस संप्रदाय के प्रवर्तक रामानुजाचार्य और निबाकाचार्य जैसे संत थे। सन 1565 में वैष्णव संप्रदाय के प्रसिद्ध प्रवर्तक श्री वल्लभाचार्य शामलाजी आए थे। इससे ये मंदिर बहुत प्रसिद्ध हो गया और एक बार फिर ये महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल के रुप में स्थापित हो गया।

मंदिर के पिछले हिस्से का दृश्य | विकिमीडिआ कॉमंस

ये मंदिर दो मंज़िला है। नागर शैली में बने इस मंदिर का ऊंचा चबूतरा तारे की तरह है। आधार पर कई देवी-देवताओं की मूर्तियां बनी हुई हैं। इसके अलावा हाथियों की भी मूर्तियां हैं और लगता है मानों इन हाथियों ने मंदिर संभल रखा हो। मंदिर के मुख्य मंडप के ऊपर बने गुंबद पर इस्लामिक वास्तुकला का प्रभाव दिखता है। पीले बालू पत्थर से बने मंदिर पर महाभारत और रामायण के कई दृश्य बने हुए हैं। मंदिर के अहाते में सीमेंट के हाथी की एक विशाल आदम क़द मूर्ति बनी है।

मंदिर के चबूतरे पर बने हाथी (गजाधर) | विकिमीडिआ कॉमंस

मंदिर में कई अभिलेख हैं लेकिन 94 तथा 102 ई.पू. के दो अभिलेख बहुत आधुनिक हैं और ये पूर्व के अभिलेखों की नक़ल हो सकते हैं हालांकि इसमें संदेह भी है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर लगी तांबे की प्लेट पर एक अभिलेख अंकित है जो सन 1762 का है। इसे टिंटो के स्थानीय शासक ठाकोर ने लिखवाया था। सभी अभिलेखों में मूर्ति का उल्लेख गदाधरजी नाम से है। भागवान विष्णु को गदाधर भी कहा जाता है।

सोलंकी शैली के तोरण वाला हरीशचंद्र चौरी का 9वीं-10वीं शताब्दी का मंदिर | गुजरात पर्यटन

मुख्य मंदिर के साथ ही एक और प्राचीन मंदिर है जो आरंभिक 9वीं शताब्दी का है। ये मंदिर बहुत छोटा है और इसका एक ही हिस्सा बचा रह गया है। कई लोगों और विद्वानों का मानना है कि ये मूल मंदिर का स्थान है। ये हरीशचंद्र चौरी के नाम से जाना जाता है। दिलचस्प बात ये है कि इसके सामने सोलंकी शैली (11वी-12वीं शताब्दी) का एक सुंदर तोरण (प्रवेश द्वार) भी है।

शीस्ट पत्थर की शिव की चतुर्भुजाकार मूर्ति। शिव नंदी पर झुके हुये हैं।

यहां गणेश को समर्पित एक छोटा-सा मंदिर भी है। मंदिर में स्थापित मूर्ति गुप्तकाल के अंतिम वर्षों में प्रचलित शैली की है। इस मंदिर के परिसर में शिव और चमुंडा सहित अन्य देवी-देवताओं की भी मूर्तियां मिली हैं

आज मंदिर की देखरेख एक ट्रस्ट करता है। परिसर और इसके पास का जलाशय तो देखते ही बनता है। अरावली का मौसम ज़्यादातर बहुत सुहावना ही रहता है। शामलाजी एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल बन चुका है और यहां सैलानी भी बहुत आते हैं।

मुख्य चित्र सौजन्य: गुजरात पर्यटन

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