तारेवाली कोठी : लखनऊ का ग्रीनविच कनेक्शन

तारेवाली कोठी : लखनऊ का ग्रीनविच कनेक्शन

हम में से कितने लोग आसमान की तरफ़ देखकर कह सकते हैं, मुझे भी मुट्ठी भर आसमान चाहिये? हां, अगर आप किसी नवाब की तरह बेहद दौलतमंद हैं फिर तो ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा ही नहीं है। ठीक कुछ इसी तरह अवध के नवाब नसीरउद्दीन हैदर (1827-1837) के साथ हुआ जिन्हें झक्की और सनकी माना जाता था।

नसीरउद्दीन हैदर हमेशा भारतीय और यूरोपीय चापलूस मित्रों से घिरे रहते थे और वो इन्हें, ख़ासकर यूरोपीय दोस्तों को, प्रभावित करने का कोई भी मौक़ा हाथ से नहीं जाने देते थे। इनमें से किसी एक ने जब नवाब को खगोलीय बेधशाला बनाने का सुझाव दिया तो वह फ़ौरन राज़ी हो गये क्योंकि खगोल और ज्योतिष विधा में उनकी बहुत दिलचस्पी थी जिसके बारे में लोग जानते भी थे। इस तरह एक साल के भीतर ही सन 1832 में शाही बेधशाला बनाने का काम शुरु हो गया।

नसीरउद्दीन हैदर | विकिमीडिया कॉमन्स

इस काम के लिये कलकत्ता से कैप्टन हरबर्ट को अवध के नवाबों की राजधानी लखनऊ बुलवाया गया। हज़रतगंज के एक विशाल भू-खंड पर नव-क्लासिकी शैली में दो मंज़िला बेधशाला बनाई गई जिसके बीच में दो बड़े सभागार थे जिनके नीचे एक बेसमेंट था। ऊपरी मंज़िल के ऊपर अवलोकन के लिये एक छोटा गोलाकार कमरा बनवाया गया। कमरे के ऊपर धातु का एक अर्धगोलाकार गुंबद था जिसे चरखी और चकरी से घुमाया जा सकता था। गुंबद में शटर लगे हुए थे और खगोलीय पिंड को देखने के लिये इन्हें उसी अनुसार घुमाया जा सकता था। इसीलिये नवाब ने बेधशाला का नाम “ तारे वाली कोठी ” रखा था।

नसीरउद्दीन हैदर ने ये बेधशाला सिर्फ़ खगोलीय पिंड को देखने के लिये नहीं बनवाई थी। वह चाहते थे कि यहां युवा दरबारी खगोल शास्त्र और भौतिक विज्ञान के बारे में जानकारी लें। इस बात का उल्लेख कैप्टन हरबर्ट की डायरी में मिलता है ।

तीन साल बाद, फ़रवरी सन 1835 में नसीरउद्दीन हैदर बेधशाला निर्माण की धीमी गति से नाराज़ हो गये और उन्होंने कलकत्ता के गवर्नर जनरल से कहा कि कैप्टन हरबर्ट की जगह किसी और को भेजा जाए। बहरहाल, कलकत्ता से लेफ़्टिनेंट कर्नल आर. विलकॉक्स लखनऊ आए और उन्हें नवाब के दरबार में बतौर शाही खगोल शास्त्री नियुक्त किया गया। नवाब शायद विलकॉक्स से बहुत प्रभावित रहे होंगे तभी उन्होंने “तारों वाली कोठी” के पास ही विलकॉक्स के लिये ख़ासतौर पर एक मकान बनवा दिया था।

विलकॉक्स की निगरानी में न सिर्फ बेधशाला का काम तेज़ी से हुआ बल्कि उसने इसे इंग्लैंड की बेधशाला ग्रीनविच की तर्ज़ पर बनवाया। विलकॉक्स ने प्रसिद्ध ग्रीनविच शाही बेधशाला की तरह ही लखनऊ की बेधशाला में उपकरण लगवाये जिनमें बैरोमीटर, मैग्नेटोमीटर, चुंबक, थर्मोमीटर और बिजली उत्पन्न करने वाले उपकरण शामिल थे। बेधशाला में चार टेलिस्कोप भी थे। मुख्य टेलिस्कोप पीतल के स्तंभ पर लगा हुआ था। ये स्तंभ फ़र्श से छत से होते हुए ऊपर जाता था और इसकी ऊंचाई बीस मीटर थी।

तारेवाली कोठी - दरोगा अब्बास अली c.1874। | ब्रिटिश लाइब्रेरी

इसी बीच एक हादसा हो गया। नसीरुद्दीन हैदर को किसी ने ज़हर दे दिया और जुलाई सन 1837 को उनकी मृत्यु हो गई। तब तक बेधशाला का निर्माण कार्य पूरा नहीं हुआ था। उनके स्थान पर अंग्रेज़ों ने उनके चाचा मोहम्मद अली शाह को नवाब बना दिया। शुरुआत में नये नवाब को बेधशाला बनवाने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उनका कहना था कि वह इतना ख़र्चा नहीं उठा सकते। लेकिन उनके शासनकाल में बेधशाला आख़िरकार सन 1841 के अंत में बनकर तैयार हो गई। इस पर 19 लाख रुपये से ज़्यादा की लागत आई थी।

शाही बेधशाला बहुत कामयाब रही और जैसा कि नसरउद्दीन हैदर चाहते थे, यहां युवा दरबारियों को खगोल शास्त्र के बारे में पढ़ाया जाने लगा। इसके अलावा खगोल शास्त्र पर होने वाले कामों का बेधशाला के कर्मचारियों ने अंग्रेज़ी से उर्दू और फ़ारसी में अनुवाद भी किया जो उस समय दरबार की भाषा हुआ करती थीं। शाही बेधशाल को लखनऊ पंचांग निकालने का भी श्रेय जाता है। ये सभी चीज़ें और प्रकाशन लखनऊ के शाही छापाख़ाने में छपे गए थे।

जिस तरह शाही बेधशाला सनक में बनवाई गई थी ठीक उसी तरह ये एक झटके में बंद कर दी गई जिसके पीछे अवध के 11वें और अंतिम नवाब वाजिद अली शाह का हाथ था जो बहुत तुनक मिज़ाज थे। अंतिम नवाब ने जनवरी सन 1849 में बेधशाला बंद करने का आदेश दे दिया । वजह यह थी कि बेधशाला के अनुवादक कमालउद्दीन हैदर ने अपनी किताब सवानेह-ए-सलातीन-ए-अवध में वाजिद अली शाह और अन्य नवाबों के बारे में कई ख़राब बातें लिख दी थीं। इस किताब में अवध के शासकों के जीवन को दर्शाया गया था।

नवाब वाजिद अली शाह | विकिमीडिया कॉमन्स

हालांकि उससे पहले वाजिद अली शाह ख़ुद बेधशाला को बेहतर बनाने और इसे फिर बहाल करने पर साढ़े चार लाख रुपये ख़र्च कर चुके थे जिसमें से पचास हज़ार रुपये भवन के लिये मिर्ज़ापुर-पत्थर ख़रीदनें में ख़र्च किए गए थे। उन्होंने बेधशाला के रखरखाव के लिये छह हज़ार रुपये से ज़्यादा की रक़म का वार्षिक अनुदान भी शुरु किया था।

बेधशाला के बंद होने से तारे वाली कोठी बेकार हो गई लेकिन सन 1857 की बगावत में इसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहां से फ़ैज़ाबाद के तालुक़दार मौलवी अहमदउल्लाह शाह और अन्य बाग़ी नेता, बाग़ावत की गतिविधियों का संचालन करते थे। बग़ावत के दौरान रणनीति पर विचार विमर्श के लिये इन लोगों की यहां बैठकें हुआ करती थीं। फ़रवरी सन 1856 में अंग्रेज़ों द्वारा वाजिद अली शाह को सत्ता से बेदख़ल करने और उनके साम्राज्य को अपने अधिकार क्षेत्र में लेने के बाद अंग्रेज़ों ने अहमदुल्लाह शाह, जो स्थानीय सामंत थे,की संपत्ति पर भी क़ब्ज़ा कर लिया था।

अंग्रेज़ों की इस हरकत से नाराज़ होकर अहमदुल्लाह शाह ने अपनी मातृभूमि को विदेशियों के कब्ज़े से मुक्त करने की महिम छेड़ दी। ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के अनुसार उनकी कोठी में तालुक़दार, स्थानीय रईस, ज़मींदार और सामंतवादियों की दो नवंबर सन 1857 में बैठक हुई जिसमें अपदस्थ नवाब वाजिल अली शाह की पत्नी बेगम हज़रत महल और पुत्र शहज़ादे बिरजीस क़द्र के समर्थन में घोषणा-पत्र पर दस्तख़त किए गए थे।

सन 1857 की बग़ावत और मार्च सन 1858 में अंग्रेज़ सेना द्वारा लखनऊ पर फिर कब्ज़ा करने के दौरान तारे वाली कोठी को बहुत नुक़सान पहुंचा। पीतल के विशाल स्तंभ सहित बेधशाला के सारे आधुनिक उपकरणों का नामोनिशान तक मिट गया।

कुछ साल बाद सन 1863 में कोठी फिर सजीव हो उठी। यहां बैंक ऑफ़ बंगाल की शाखा खुल गई। बैंक ऑफ़ बंगाल तीन प्रेसीडेंसी बैंकों में से एक था। बाद में तीनों बैंकों को मिलाकर इम्पीरिय बैंक ऑफ़ इंडिया बना दिया गया था। सन 1955 के बाद इम्पीरियल बैंक ऑफ़ इंडिया, स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया में तब्दील हो गया और आज तारे वाली कोठी में स्टेट बैंक आफ़ इंडिया का लखनऊ मुख्यालय है।

तारेवाली कोठी की अभी की तस्वीर  | रमीन खान

तारे वाली कोठी अब न तो खगोल संबंधी सपनें पूरा करने की जगह है और न ही ये, इसे बनाने वाले दौलतमंद और सनकी नवाब का प्रतीक है। आज इसका उद्देश्य महज़ भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करना है। आज इसे देखकर इसके गौरवशाली समय का हल्का-सा अभास होता है।

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