छितकुल- भारत के मुहाने पर बसा एक गांव

छितकुल- भारत के मुहाने पर बसा एक गांव

निर्भीक यात्रियों के लिये ये गांव एकदम अनोखा है। छितकुल भारत-तिब्बत सीमा पर देश का अंतिम गांव है जो समुद्र-तल से 11,320 फ़ुट की ऊंचाई पर है। इसकी सुंदरता तो बस देखती ही बनती है।

गाँव नक्शे पे  | एल एच आई 

किन्नौर ज़िले में बास्पा नदी के तट पर स्थित छितकुल गांव हिमाचल प्रदेश में हिमाद्रि पहाड़ियों से बहुत क़रीब है। यहां आने पर जीवन एकदम सजीव हो उठता है। एक घाटी में हिमालय पर्वत से घिरा यह गांव कुल 650 लोगों की बस्ती है जो लकड़ी के मकानों में रहती है।

छितकुल गांव का साफ़ नीला आकाश, सुबह की हवा और परिंदों की चहचहाहट, ये कुछ ऐसी चीज़ें है जिसका अनुभव आपने पहले शायद ही किया होगा। अगर आप यहां कुछ समय रुके तों बर्फ़ से ढ़के हिमालय पर्वत के पीछे शाम को सूर्यास्त का दृश्य आपको आश्चर्यकित कर देगा।

ग्राम चितकुल का दृश्य | सराहन

हिमाचल के अन्य गांवों की तरह छितकुल गांव के साथ भी रहस्मय कथा जुड़ी हुई है। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि गांव की देवी माथि वृंदावन से लंबी यात्रा तय करके यहां आईं थीं और तभी उन्होंने यहां रहने का फ़ैसला किया। माना जाता है कि माथि देवी और उनके परिवार ने वृंदावन से मथुरा और बद्रीनाथ होते हुए यहां तक की लंबी और कठिन यात्रा की थी। हिमाचल प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में अपने भतीजों-भांजों तथा पति को प्रहरी नियुक्त कर उन्होंने छितकुल में बसने का फ़ैसला किया।

ऐसा भी माना जाता है कि माथि देवी के आने के बाद गांव में ख़ुशहाली आने लगी और इस तरह वह गांव की एक महत्वपूर्ण देवी बन गईं। लोक-कथा के अनुसार पड़ौसी गांव कामरु के बद्रीनाथ भगवान माथि देवी के पति हैं और सांगला गांव के नाग देवता तथा रक्छम गांव के शमशेर देवता माथि देवी के भतीजे-भांजे हैं।

ये कथा सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी चल रही है। पारंपरिक कथा वाचक गोर्च और पौराणिक कथाओं के स्थानीय जानकार ये कथा सुनाते रहे हैं। स्थानीय त्यौहारों के दौरान देवी तथा उनसे जुड़ी प्राचीन कथाएं सुनाते हैं।

घाटी में स्थित छितकुल गांव देखने के लिये पैदल जाना ही सबसे बेहतर है क्योंकि तेढ़ी-मेढ़ी बुनावट वाले रास्ते ही आपको इस गांव की तरफ़ ले जाते हैं। छितकुल का विन्यास इस क्षेत्र की ख़ासियत है। पहाड़ी की तलहटी पर मकानों के अलग अलग गुच्छों में ये गांव बसा हुआ है जहां संकरी और ढ़लानदार पगडंडियां हैं जो हर घर को सार्वजनिक स्थानों से जोड़ते हैं। यही गांव के प्रमुख मार्ग माने जाते हैं। कुछ मार्ग पक्के अथवा पत्थरों के बने हुए हैं जबकि कुछ मिट्टी या फिर घास के हैं। ये मार्ग बस इतने ही चौड़े हैं कि एक बार में एक व्यक्ति ही उन पर चल सकता है।

ठेठ गाँव पाथवे पैटर्न को दर्शाती तस्वीर | सराहन 

गांव के ऊपर छितकुल क़िला है। हालंकि इसे लोग क़िला कहते हैं लेकिन ये दरअसल एक मंदिर है। दुर्गनुमा तीन मंज़िला ये भवन ठेठ पहाड़ी शैली में बना है। भवन की बुनियाद स्थानीय ठोस पत्थर की बनी हुई है। जबकि बाक़ी की तीन मंज़िलें पत्थरों और लकड़ियों की बनी हैं। सबसे ऊपरी मंज़िल में एक छोटा-सा मंदिर है। इस मंज़िल के चारों तरफ़ लकड़ी की बाल्कनियां हैं।

राजसी टॉवर किला | सराहन

इसी तरह माथि देवी का मंदिर भी इस गांव का एक महत्वपूर्ण स्थान है। स्थानीय लोगों के अनुसार ये मंदिर क़रीब पांच सौ साल पुराना है।

सुंदर मठिया देवी मंदिर | सराहन

वास्तुकला के मामले में माथि देवी मंदिर अद्भुत है। हाल ही में इस मंदिर की मरम्मत की गई है और लकड़ी की छतों की जगह पत्थर की छतें बनाई गईं हैं। क़िले की तरह ये मंदिर भी लकड़ी और पत्थर का बना हुआ है और ये ठेठ किन्नौरी/पहाड़ी वास्तुकला शैली का नमूना है। गांव के मध्य स्थित इस मंदिर की लकड़ियों पर महीन नक़्क़ाशी है और छत बहुत आकर्षक है।

छितकुल गांव की सबसे बड़ी ख़ासियत है पुराने लकड़ी के मकान जो देशी वास्तुकला शैली का शानदार नमूना हैं। हर मकान की अपनी ही शैली है और कोई भी मकान डिज़ाइन या तफ़्सील के मामले में दूसरे मकान से बिल्कुल मिलता जुलता नहीं है हालंकि वे एक दूसरे से लगभग जुड़े हुए हैं। ये मकान सड़क, पगडंडियों और ढलान के अनुसार विभिन्न दिशाओं में बने हुए हैं। कई मकानों का मुख सूरज की तरफ़ है और यहां से हिमालय की पवित्र चोटियों का सुंदर दृश्य दिखता है।

पृष्ठभूमि में हिमालय के साथ घर | सराहन

जिस तरह मकान एक दूसरे से भिन्न हैं, उसी तरह मकान बनाने का सामान भी अलग होता है। अमूमन मकान बनाने में पत्थर और लकड़ी का इस्तेमाल किया गया है लेकिन नये मकानों के निर्माण में गारे, सीमेंट और ईंटों का भी इस्तेमाल होने लगा है। पहले मकानों की छतें लकड़ी की होती थीं जिसकी जगह पत्थर ने ले ली थी लेकिन अब छतें टिन की भी बनने लगी हैं। विविधता के बावजूद छितकुल गांव में किन्नौरी देशी वास्तुकला शैली की झलक मिलती है।

गाँव में आम अनाज के लिए घर  | सराहन 

छितकुल की यात्रा करना बहुत हिम्मत वाला काम है क्योंकि आपको किन्नौर ज़िले में बहुत ही दुर्गम पहाड़ी मार्गों से गुज़रना होगा। ये मार्ग बहुत ही ढ़लावदार, संकरे और उबड़-खाबड़ हैं। हिमपात की वजह से नवंबर से मार्च तक छितकुल जाने वाले सभी मार्ग बंद कर दिये जाते हैं।

मुश्किल सड़क गांव के लिए  | विकिमीडिआ कॉमन्स 
गाँव में स्थानीय लोग | सराहन 

कठिन मार्गों के बावजूद छितकुल में सैलानियों का आना शुरु हो गया है। जो लोग चुनौतियों का सामना करके यहां तक पहुंच जाते हैं वे यहां के शांतिपूर्ण वातावरण और प्राकृतिक सुंदरता पर तो मोहित होते ही हैं साथ ही ये जगह उन लोगों के लिये भी एकदम मुनासिब है जिन्हें प्राकृतिक छटा में सेल्फ़ी लेकर सोशल मीडिया में शेयर करने का शौक़ है। इसलिये, इसके पहले कि यहां चीज़ों में बदलाव आए, आप भारत के मुहाने पर बसी भगवानों की इस धरती को ज़रुर देखने जाएं।

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