बाबे नानक का ननकाना

बाबे नानक का ननकाना

पाकिस्तान का ज़िला श्री ननकाना साहिब वह मुक़द्दस नगर है, जहां 550 वर्ष पूर्व जगतगुरू बाबा नानक जी निरंकार , पिता श्री महिता कालू और माता त्रिपता देवी के घर, बैसाख सूदी 3,20 बैसाख सम्वत 1526 (भाई लालो वाली जन्म साखी के मुताबिक़ जन्म कत्तक सूदी 15 को हुआ था) को प्रकट हुए। इस क़स्बे का पहला नाम रायपुर तथा फिर राय-भोए की तलवंडी पड़ा। गुरू नानक साहिब के आगमन के बाद यह क़स्बा ननकाना साहिब नाम से मशहूर हुआ। गुरू साहिब में नूरानी ज्योति का दीदार करने वाला पहला शख़्स इसी राय भोए की तलवंडी का चौधरी राय बुलार भट्टी था। जिसने गुरू नानक साहिब की बहन बेबे नानकी के बाद गुरू जी में मौजूद रब्बी ज्योति को पहचाना। ‘ख़ुर्शीद खालसा’ के पृष्ठ 36 तथा ‘बैसाख नहीं कत्तक‘ के पृष्ठ 86 के अनुसार राय बुलार ने अपने जीवनकाल में ही सरकारी दस्तावेज़ों में राय भोए की तलवंडी का नाम गुरू नानक के प्यार में आकर ननकाना साहिब रख दिया था। बाबा जी के पिता महिता कालू राय बुलार की ज़मीनों का प्रबंध देखते थे।

गुरूद्वारा जन्म स्थान श्री ननकाना साहिब

श्री ननकाना साहिब के ख़ास बाज़ार में बिल्कुल सामने गुरूद्वारा जन्म स्थान सुशोभित है। गुरू साहिब के पश्चात पाँचवें गुरू तक यह स्थान इसी हालत में रहा। सन् 1612 ई. में जब गुरू हरिगोबिंद साहिब इस पावन स्थान के दर्शनों के लिए आए तो इस स्थान की सेवा उन्होंने अपने शिष्य अलमस्त जी को सौंपी। उसके बाद लंबे समय तक इस पावन स्थान की सेवा उदासी साधू ही करते रहे। सिख राज्य के दौरान महाराजा रणजीत सिंह ने इस पवित्र स्थान का नवनिर्माण करवाया और बाबा साहिब सिंह बेदी के प्रेरित करने पर इस स्थान के नाम जागीर की।

पाकिस्तान के औक़ाफ़ महकमे तथा पाकिस्तान सिख गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी ने गुरू नानक देव जी के 550वें प्रकाश दिवस के मद्देनज़र इस स्थान की भव्य सजावट करवाई है। जहां एक ओर गुरूद्वारा साहिब में नई सराय, लंगर हाल, जोड़ा-घर, प्रबंधकी ब्लाक, सरोवर आदि का सौन्दर्यीकरण तथा नव-निर्माण किया गया है, वहीं गुरूद्वारा साहिब की दर्शनी ड्योढ़ी के सामने बने पार्क में लेज़र तकनीकयुक्त फ़व्वारा लगाकर ,इस स्थान को बिल्कुल नया और आलौकिक रूप दिया गया है।

गुरूद्वारा जन्म स्थान श्री ननकाना साहिब 

गुरूद्वारा जन्म स्थान के दाएं हाथ, साथ वाली गली में गुरूद्वारा पट्टी साहिब मौजूद है। इस स्थान पर सन1475 में गुरू जी को पंडित गोपाल दास से हिन्दी, सन 1478 में पंडित ब्रिज लाल से संस्कृत तथा सन 1482 में मौलवी क़ुतुबुद्दीन के पास फ़ारसी पढ़ने के लिए भेजा गया। गुरू नानक साहिब की तेज़ बुद्धि, आत्मिक ज्ञान और रौशन दिमाग़ के सामने उक्त तीनों सांसारिक उस्ताद नत्मस्तक हुए। गुरू जी ने प्रचलित विद्या पर कटाक्ष करते हुए विद्या का असल रूप उजागर किया। गुरू जी ने इन उस्तादों की शंका का निवारण करने के लिए उक्त स्थान पर आसा राग में पट्टी नामक बाणी सुनाई । जिस स्थान पर गुरू साहिब को पढ़ने के लिए भेजा गया था, वहां गुरूद्वारा पट्टी साहिब सुशोभित है। इस स्थान पर मौलवी क़ुतुबुद्दीन से फ़ारसी पढ़ने के कारण इस स्थान को गुरूद्वारा मौलवी पट्टी साहिब भी कहा जाता है।

गुरूद्वारा बाल-लीला साहिब 

गुरूद्वारा पट्टी साहिब से कोई 20 क़दम की दूरी पर गुरूद्वारा बाल-लीला मौजूद है। इस स्थान पर गुरू जी बाल-अवस्था में अपने साथियों के साथ खेला करते थे। बाद में राय बुलार ने उक्त स्थान पर नानकसर नाम से एक सरोवर बनवाया। गुरूद्वारा साहिब के क़रीब यह सरोवर आज मौजूद तो है, परन्तु रख-रखाव की कमी के कारण अब यह बिल्कुल सूख चुका है। गुरूद्वारे की इमारत का सौन्दर्यीकरण कर उसमें नया दीवान हाल तथा अन्य स्मारक बनाए गए हैं।

गुरूद्वारा जन्म स्थान से मात्र आधा किलोमीटर की दूरी पर गुरूद्वारा तंबू साहिब मौजूद है। उक्त स्थान का यह नाम यहां तंबू की तरह फैले एक वट् वृक्ष के कारण पड़ा। इस स्थान पर गुरू नानक साहिब चूहड़काणा से विद्वान साधुओं को सच्चा सौदा के रूप में भोजन करवाकर वापसी पर रूके थे। हाल ही में गुरूद्वारा साहिब की पुरानी इमारत को ज़मीनदोज़ कर वहां गुरूद्वारा साहिब की नई इमारत का निर्माण करने के साथ-साथ विदेशी सिख संगत के लिए नई आलीशान सराय बनाई गई है। इसके साथ ही गुरूद्वारा पाँचवीं तथा छठी पातशाही भी हैं। गुरूद्वारा पाँचवीं पातशाही के स्थान पर गुरू अर्जुन साहिब के मुबारक चरण पड़े थे और गुरूद्वारा छठी पातशाही के स्थान पर गुरू हरिगोबिंद साहिब, कश्मीर से वापसी के समय ठहरे थे।

गुरूद्वारा माल जी साहिब

यहां से पास ही गुरूद्वारा माल जी साहिब मौजूद है। कहा जाता है कि एक दिन मवेशियों को चराने के दौरान गुरु नानक देव जी एक वृक्ष के नीचे आराम कर रहे थे तभी वे प्रभु चरणों में लीन हो गए। कुछ देर बाद उनके दिव्य चेहरे पर धूप आ गई। उसी समय एक साँप ने अपने फन के साथ गुरु साहिब के चेहरे पर छाया कर दी। जब हाकिम राय बुलार ने दूर से देखा तो वह समझा कि बाबा नानक को सांप ने डस लिया होगा। उसके पास जाने पर सांप अपने बिल में चला गया। राय बुलार ने गुरू साहिब को जगाया, तो वे बिल्कुल ठीकठाक थे। यह अनौखा कौतक देख राय बुलार को गुरू जी के आध्यात्मिक व्यक्तित्व की पहचान हो गई। बाद में यादगार के तौर पर उसी स्थान पर एक भव्य गुरूद्वारा साहिब की इमारत का निर्माण करवाया गया। 550वें प्रकाश दिवस के मद्देनज़र इस स्थान का भी नवनिर्माण करवाया गया है।

गुरूद्वारा कियारा साहिब

इसी प्रकार श्री ननकाना साहिब में गुरुद्वारा कियारा साहिब के बारे में कहा जाता है कि गुरु नानक साहिब बचपन में एक दिन जब मवेशियों को चराने के लिए खेतों में ले गए, तब एक पेड़ के नीचे बैठे गुरु जी प्रभु भक्ति में लीन हो गए और मवेशी किसी किसान के खेतों में घुस गए। जब किसान फ़सल को देखने आया, तो भैंसों को चरते हुए देखकर उसे बहुत ग़ुस्सा आया। वह अनुचित तरीक़े से बोलता हुआ राय बुलार के पास पहुँचा और उस से बाबा नानक की शिकायत की। आंख खुलने पर गुरू नानक देव जी भैंसों को वहां से लेकर अपने घर चले गए। किसान की शिकायत सुनने के आधार पर जब राय बुलार ने अपने आदमियों को उस के साथ फ़सल देखने के लिए भेजा, तो वहां सारा खेत हरा-भरा था। गुरुद्वारा कियारा साहिब उसी खेत में बना हुआ है। इस स्थान का हाल ही में नवनिर्माण करावाया गया है और अब यहां प्रतिदिन प्रकाश किया जा रहा है।

गुरूद्वारा जन्म स्थान श्री ननकाना साहिब 

गुरू नानक देव जी के 550वें प्रकाश दिवस पर देश-विदेश से लाखों की तादाद में श्रद्धालु श्री ननकाना साहिब पहुँच रहे हैं और इसी को देखते हुए पाकिस्तान सरकार ने ज़िले के सभी गुरूद्वारों की पुरानी इमारतों से छेड़छाड़ किए बगैर उन्हें ख़ूबसूरत रूप दे दिया है। यहां तक कि श्री ननकाना साहिब के रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर ‘बाबा गुरू नानक स्टेशन’ तथा स्टेशन से गुरूद्वारा जन्म स्थान के लिए बनाए गए नए रास्ते का नाम ‘बाबा गुरू नानक मार्ग’ रख दिया गया है। संगत की रिहायश के लिए गुरूद्वारा साहिब से थोड़ी दूरी पर नए नमूने की सराय बनाई गई हैं। मतलब यह कि प्रकाश दिवस के मद्देनज़र ज़िला ननकाना साहिब में एक नया नगर बस चुका है और वहां के लोग बाहें फ़ैलाए देश-विदेश से वहां पहुँचने वाली संगत का इंतज़ार कर रहे हैं।

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