भारत की शिल्पकला का गुणगान

भारत की शिल्पकला का गुणगान

भारत की महान कलाओं और शिल्पकारी की समृद्ध विरासत के बारे सारा विश्व जानता है। हमारे देश में शिल्पकारी परंपराओं में विविधता हमारी कलात्मक निधि की साक्षी है। क़रीब दो हज़ार साल तक विश्व में भारतीय कपड़ों और हस्तकला से संबंधित वस्तुओं का विश्व में ख़ूब व्यापार होता थ और क़िस्म तथा उत्कृष्टता के लिए इनकी बहुत मांग होती थी। दुर्भाग्य से इनमें से ज़्यादातर शिल्पकलाएं आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं। एक तरफ़ जहां कुछ शिल्पकलाएं फिर से चलन में आ गईं हैं वहीं भारत के कोने कोने में कई शिल्पकलाएं ऐसी हैं जो अपने संरक्षण, बढ़ावे और लोकप्रियता की बांट जो रही हैं। लेकिन ऐसा क्यों है कि भारत की शिल्पकला को लेकर फ़िक्र नहीं की जाती है? इन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए क्या किया जा सकता है?

हमारी साप्ताहिक श्रृंखला हेरिटेज मैटर्स के इस सत्र “सेलब्रेटिंग इंडियाज़ क्राफ़्ट्स” (भारतीय शिल्पकारी का गुणगान), भारतीय शिल्पकलाओं की विरासत की जांच-पड़ताल की गई और आज इनके सामने चुनौतियों पर गहन विचार विमर्श किया। चर्चा में आम्रपाली जूवैल्स के सह-संस्थापक राजीव अरोड़ा, यूनाईटेड वर्ल्ड इंस्टीट्यूट ऑफ़ डिज़ाइन की एसोसिएट प्रोफ़ेसर काकोली बिस्वास और पीपल ट्री की निरीक्षक तथा प्रमुख डिज़ाइनर अर्चना नायर ने हिस्सा लिया। चर्चा में शामिल इन सभी लोगों को पारंपरिक शिल्पकला को पुन: जीवित करने तथा इसे बढ़ावा देने का अच्छा अनुभव है और इन्होंने देश के अलग अलग हिस्सों में शिल्पकारों के साथ काम किया है। चर्चा के एक महत्वपूर्ण सत्र में कोविड महामारी से बुरी तरह प्रभावित हस्तशिल्प क्षेत्र तथा इस प्रतिकूल परिस्थितियों में कैसे इस कला को विकसित कर इसे प्रासंगिक बनाया जाय, इस पर भी गहन विचार-विमर्ष किया गया।

भारतीय शिल्पकलाओं को अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ रहा है ?

गुजरत की रोगन कला  | LHI

भारत में शिल्पकलाओं की जितनी क़िस्में और प्रकार हैं, उन्हें समझना बहुत मुश्किल है। हर क्षेत्र की उसकी हस्तकला में विशेषज्ञता है। कपड़ा हो, लकड़ी का काम हो, पैंटिंग और भित्ति चित्र हों, गहने हों या फिर खिलौने हों, प्रत्येक हस्तकला का अपना एक ख़ास स्थान है। परिचर्चा में शिल्पकलाओं की कहानियों और उनके इतिहास पर रौशनी डालने के लिए खराद, रोग़न, ढोकरा, बिदरी, पत्तचित्र जैसे कई और कला- रुपों पर विचार किया गया। कई पीढ़ियों से कारीगर समुदाय अपनी कलाओं में समरुफ़ रहे हैं और वे उस परंपरा का निर्वाह रहे हैं जो हज़ारों साल पुरानी है। इसके बावजूद इन कारीगरों या फिर इन अनगिनत कलाओं को लोगों के सामने लाने के लिए ज़रूरी कोशिशें नहीं की गई हैं।

पीपल ट्री के संग्रह में मौजूद एक ढोकरा कला से बनी एक वस्तु | पीपल ट्री

भारतीय कलाओं और शिल्प के लिए स्थापित ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म पीपल ट्री की मुख्य क्युरेटरअर्चना का कहना है कि मूल समस्या ये है कि हम शिल्प और शिल्पकारों को सम्मान नहीं देते हैं। “हमें उन्हें शिल्प कहना बंद करना पड़ेगा, ये कला की चीज़े हैं । कारीगर जिस कला के हुनर से इन्हें बनाते हैं, लोगों को उसकी सराहना करनी चाहिए। ये कलाकृतियां वे लोग बनाते हैं जिन्होंने इस कला को सीखने में सैंकड़ों साल लगाए हैं।” पीपल ट्री पूरे भारत से पुरस्कार विजेता कारीगरों की बनाईं गईं बेहतरीन हस्थ- कलाकृतियों को इस प्लेटफ़ॉर्म के ज़िरिए लोगों के सामने लाता है। इसके अलावा पीपल ट्री इन पारंपरिक शिल्पकलाओं के बारे में जागरुकता पैदा करने और इनमें नई नई चीज़ों को शामिल करने की भी कोशिश कर रहा है।

ज़ेवरों के प्रमुख ब्रांड “अम्रपाली जैवलर्स” के को-फ़ाउंडर राजीव अरोड़ा इस बात से सहमत हैं कि हम हमारी शिल्पकलाओं की उस तरह से खुले दिल से सराहना नहीं करते हैं जैसी की जानी चाहिए । “हम ज़ेवर को एक कला के रुप में कभी भी नहीं देखते। इसे एक वस्तु के रुप में बेचा जाता है…..मैं संयुक्त राष्ट्र द्वारा किए गए एक शोध को पढ़ रहा था जिसके अनुसार पिछले चार दशकों में हमने अपने तीस प्रतिशत कारीगरों को खोया है क्योंकि ये लोग कुछ और मज़दूरी करने लगते हैं…ये महान हुनर की बरबादी है….हम एक जीवित संस्कृति हैं और हमें इस पर गर्व होना चाहिए, हम इस मामले में विश्व को रास्ता दिखा सकते हैं।”

राजीव अरोड़ा द्वारा सह स्थापित जयपुर का आम्रपाली संग्रहालय जो आभूषणों को समर्पित है | आम्रपाली संग्रहालय

चर्चा के दौरान एक और जो महत्वपूर्ण बात सामने आई वो ये थी कि भारत में कारीगर- समुदाय बड़ी मुश्किलों से दो जून की रोटी का जुगाड़ कर पाता है । उनका गुज़र बसर करना इतना मुश्किल है कि वे बमुश्किल कला को लोगों तक पुहंचाने या फिर इनमें नई बात पैदा करने पर ध्यान दे पाते हैं। लेकिन आज के समय के अनुसार शिल्पकलाओं और उनकी डिज़ाइनों को प्रासंगिक बनान महत्वपूर्ण है। यहीं पर डिज़ाइनरों की भूमिका आती है। काकोली बिस्वास के अनुसार, “मैंने मेहसूस किया है कि ये कलाएं और शिल्प युगों से चली आ रही हैं लेकिन हमें उन्हें प्रासंगिक बनाने की ज़रुरत है…हमें बाज़ार में इनकी मांग पैदा करनी होगी और बतौर डिज़ाइनर या डिज़ाइन शिक्षक हमें उन्हें डिज़ाइन, रंगों आदि के बारे में बताने की ज़रुरत है। ये डिज़ाइनरों का फ़र्ज़ है कि वे उन्हें जाकर जानकारियां दें क्योंकि कारीगर तो वहीं बना रहे हैं जो वे बनानना जानते हैं।” काकोली बिस्वास गुजरात में ज़मीनी स्तर पर कारीगरों और शिल्पकारों के साथ काम करती रही हैं और विभिन्न डिज़ाइन संस्थानें में पढ़ाती रही हैं।

राजीव और अर्चना दोनों इस बात पर सहमत हैं कि ये भी एक समस्या है कि बाज़ार में हम अपनी शिल्पकला को किस तरह पेश करें। हमारी हस्तशिल्प कला की मार्किटिंग और इसे बढ़ावा देने के उपायों पर भी नए सिरे से विचार करना होगा। अर्चना के अनुसार, “हमें पनी शिल्पकलाओं में लाभ कमाने की क्षमता नहीं देख पाते हैं। हमारी शिल्प कला बेहतरीन है। विश्व में इसका कोई जवाब नहीं है। हमें इसे बाज़ार में सही तरीक़े से पेश करना होगा।”

पीपल ट्री के संग्रह में मौजूद एक पिछवाई पेंटिंग  | पीपल ट्री

कोरोना महामारी और लॉकडाउन की वजह से शिल्प कला क्षेत्र को भी भारी नुक़सान हुआ है और ये कला और पीछे चली गई है। लेकिन पीपल ट्री जैसी संस्थाओं ने मुश्किल की इस घड़ी में पहल कर कारीगरों के साथ काम किया है और उनकी पहुंच को और फ़ैलाने के लिए कई उपाय बताए हैं तथा उन्हें डिजिटल और तकनीक की दुनिया से परिचित करवाया है। अर्चना ने बताया कि कैसे पीपल ट्री ने मौजूदा हालात में दूर से ही कारीगरों के साथ काम किया और विपत्ति को अवसर में बदला। “हमने कई कारीगरों से संपर्क किया जो दुनिया से कटे हुए थे। उनका संपर्क सिर्फ़ उन शहरों से था जहां वे अपना सामान बेचने जाते थे। हम उन्हें ऑनलाइन लेकर आए। हमारी नई नई डिज़ाइन ऐसे ही माहौल में बनीं। पहले कई ऐसी बाधाएं थीं जो अब सीधे उनके साथ जुड़कर काम करने में पेश नहीं आती हैं…अगर वे इस तरीक़े को समझ लें तो इस प्रक्रिया के ज़रिए वे और लोगों तक पहुंच सकते हैं।”

काकोली ने बताया कि शिल्प कला के दस्तावेज़ तैयार करना भी इस क्षेत्र का एक मसला है। उन्होंने कहा कि हालंकि अब शिल्प-दस्तावेज़ (प्रलेखन)डिज़ाइन पाठ्यक्रम का हिस्सा है लेकिन फिर भी तकनीक, क़िस्मों और इस युगों पुरानी परंपराओं की बारीकियों का प्रलेखन तैयार करने की दिशा में अभी बहुत कुछ किये जाने की ज़रुरत है।

भारत की कला और शिल्प को कैसे पुनर्जीवित कर बढ़ावा दिया जा सकता है ?

हमारे विशेषज्ञों की बातचीत से, कला और शिल्प के क्षेत्र में बदलाव लाने के लिए ये चंद उपाय सामने आए हैं।

1. शिल्प और शिल्पकारों को मान्यता

इस क्षेत्र में काम करने वाले लाखों शिल्पियों के कामों को मान्यता देने की ज़रुरत का ज़िक्र करते हुए राजीव ने कहा कि हम उन्हें माहिर शिल्पकारों के रुप में नहीं देखते हैं। उनकी रचनाएं शाश्वत, कालातीत और अमूल्य हैं। उन्हें समाज में इसी लिहाज़ से सम्मान और प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए । हमारे सभी वक्ता इस बात पर सहमत थे कि शिल्प की सही एहमियत, कठिन परिश्रम, इसके इतिहास, परंपराओं और शिल्प कला की हमारी धरोहर को जब तक हम मान्यता नहीं देंगे, हम इसे दुनिया के सामने बेहतर तरीक़े से नहीं रख सकते। हमें उनकी सराहना करने की ज़रुरत है, उन्हें मान्यता देने की ज़रुरत है और उन्हें संरक्षण देने की ज़रुरत है।

2.उत्पाद में विविधता और शिल्प में नवीनता

बतौर डिज़ाइनर काकोली का मानना है कि उत्पाद में विविधता और डिज़ाइन में नवीनता से शिल्प कला को आगे ले जाया जा सकता है। उनका ये भी कहना है कि एक तरफ़ जहां नए डिज़ानर्स नए नए डिज़ाइन के साथ प्रयोग कर रहे हैं वहीं उन्हें कला और शिल्प की मौलिकता और इसके मूलतत्व को भी बरक़रार रखना चाहिए । ये इस बदलाव में न मूल तत्वों को हरगिज़ नहीं खोया जना चाहिए।

काकोली बिस्वास द्वारा साझा एक टाई में पटोला का अभिनव उपयोग | काकोली बिस्वास

3.बेहतर सरकारी नीतियां

हमारी नीतियां शिल्प-अनुकूल होने चाहिए । उदाहरण के लिए शिल्प के सामानों पर भारी कर और सोने या चांदी पर आयात कर की वजह से शिल्पिकारों के लिए समस्याएं पैदा हो जाती हैं। हमारे वार्ताकार इस पर सहमत थे कि शिल्पकारों को इन करों से मुक्त कर देना चाहियए ताकि वे आसानी से बाज़ार में अपना सामान बेच सकें।

4.शिक्षा प्रणाली और प्रालेखन में सुधार

स्कलू के पाठ्यक्रम में पारंपरिक कला और शिल्प के विषयों को शामिल किया जाना चाहिए ताकि बच्चों को कम उम्र से ही कला के इन रुपों की जानकारी मिल सके। इन शिल्प कलाओं के बेहतर प्रालेखन की भी ज़रुरत है ताकि आगे आने वाली पीढ़ि के लिए ये सनद रहे। इससे हमें हमारी विविधता वाली शिल्प कला के ज्ञान-कोष और इसके बारे में जानकारी पैदा करने में मदद मिल सके।

अब समय आ गया है कि हम अपने कला-रुपों और शिल्प की एहमियत को मान्यता दें जो हमारी सांस्कृतिक धरोहर का न सिर्फ़ महत्वपूर्ण हिस्सा हैं बल्कि जिससे बड़ी संख्या में लोगों की रोज़ी रोटी भी जुड़ी हुई है।

मुख्य चित्र: पीपल ट्री

ये सत्र अंग्रेज़ी में हमारे चैनल पर दिखाया गया है। आप इस सत्र की पूरी परिचर्चा अंग्रेज़ी में यहां देख सकते हैं-

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