गुजरात के कच्छ की शिल्पकला और उसका पुनरुद्धार

गुजरात के कच्छ की शिल्पकला और उसका पुनरुद्धार

गुजरात का कच्छ क्षेत्र भारत की कुछ बेहतरीन शिल्प कलाओं के लिए मशहूर है। ये सदियों पुरानी शिल्प कलाएं और परम्पराएं संस्कृति और समुदायों का मिश्रण से बनी हैं। कच्छ हालंकि तरह तरह की कशीदाकारी के लिए जाना जाता है लेकिन यहां मिट्टी, धातु और चमड़े की शिल्पकला सहित कई तरह की कला और शिल्पकलें भी पाई जाती हैं। इन कलाओं की परंपरा बहुत पुरानी है लेकिन हाल ही के वर्षों में इन कलाओं का पुनरुत्थान हुआ है जिसकी वजह से ये कलाएं इस क्षेत्र की पहचान बन गई हैं।

लेकिन सवाल ये है कि कच्छ कलाओं का पुनरुत्थान कैसे हुआ? विभिन्न संगठनों ने कैसे ज़मीनी स्तर पर इन कलाओं और कलाकारों को बढ़ावा दिया है? और हम इन प्रयासों से क्या सीख सकते हैं?

हमारी ऑनलाइन सिरीज़ ‘हेरिटेज मैटर्स’ के तहत हमने हमारे ‘कच्छ क्रॉफ़्ट-ए स्टोरी ऑफ़ रिवाइवल’ के सत्र में कुछ प्रमुख संगठनों के सदस्यों को आमंत्रित किया और ये समझने की कोशिश की कि पुनरुत्थान कार्यक्रमों से कैसे कच्छ को लोगों को लाभ हुआ और कैसे ये शिल्प कलाएं इस क्षेत्र का अभिन्न अंग और रोज़गार का ज़रिया बन गईं।

इस सत्र में हमारे मेहमान थे क़साब कच्छ क्राफ़ट वीमैन प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड के निदेशक और सी.ई.ओ. पुनीत सोनी, कारीगर क्लिनिक के संस्थापक और सी.ई.ओ. डॉ. निलेश प्रियदर्शी, कला रक्षक के प्रोजेक्ट कॉर्डिनेटर मुकेश भनानी और पीपल ट्री की हेड ऑफ़ प्रॉडक्ट, डिज़ाइन एंड स्ट्रेटेजी, अर्चना नायर।

कच्छ क्षेत्र में चरवाहों के कई समुदाय रहते हैं और इनमें से कई अर्ध ख़ानाबदोश हैं जो ऊंट और भेड़ चराते हैं। ये लोग लगभग पांच सदियों पहले राजस्थान, सिंध, बलूचिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान से यहां आए थे। व्यापार, कृषि और पशु चराने के कारण शिल्पकला यहां के कई समुदायों के जीवन में रची बसी हुई है।

रबारी समुदाय

चूंकि कच्छ मरुस्थल और समंदर के बीच है इसलिए ये व्यापार का केंद्र था। सूखे मौसम की वजह से यहां के लोगों ने अपनी रोज़मर्रा की ज़रुरतों को पूरा करने के लिए संसाधनों से रोज़मर्रा के उत्पाद बनाने लगे थे। इनमें कशीदाकारी वो कला था जिसकी वजह से कच्छ को आज पूरे विश्व में जाना जाता है।

कच्छी कढ़ाई

कच्छ में पाको, रबारी और सफ़ जैसी तरह तरह की कशीदाकारी शैलियां है जो यहां रहने वाले रबारी, अहीर, मेघवाल, सोधा, राजपूत, जाट मुतवा और हरिजन मेघवार जैसे अन्य समुदायों की ख़ास पसंद हैं। इनमें से प्रत्येक समुदाय चमकीले परिधान पहनता है और सबकी अपनी शैली है तथा कशीदाकारी की अपनी विशिष्टता है। इन समुदायों की महिलाएं ही हैं जो पीढ़ियों से कशीदाकारी करती आई हैं और जिन्होंने इस कला को जीवित रखा हुआ है।

मेघवार की महिलाओं द्वारा किया गया पाको कढ़ाई | क़साब कच्छ क्राफ़ट

अर्चना नायर के अनुसार, “कच्छ में विभिन्न शिल्प कलाओं का समागम है। यहां हर वो शिल्प कला है जिसकी आप कल्पना कर सकते हैं….यहां 14-15 तरह की कशीदाकारी होती हैं जो अलग अलग समुदाय करते हैं। हर कशीदाकारी दूसरी कशीदाकारी से अलग होती है। इनकी अपनी ख़ुद की ख़ासियत होती है, ख़ुद की अपनी तकनीक होती है…इनकी बुनाई भी अलग होती है जैसे भूजोड़ी, तंगालिया, पटोला…ये सूची बहुत लंबी है। यहां धातु और चमड़ा शिल्प कला तथा अनेक शिल्प कलाएं हैं।”

रबारी कढ़ाई के कुशन कवर, क़साब संगठन की कारीगरों द्वारा बनाये गए | पीपल ट्री

लेकिन कच्छ में शिल्प कलाओं को पुनर्जीवित करना इन संगठनों के लिये आसान नहीं था जिनकी शुरुआत सन 1990 के दशक में हुई थी। इस सत्र में हमने ये जानने की कोशिश की कि कैसे कला रक्षा, क़साब कच्छ क्राफ़्ट वीमैन प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड और कारीगर क्लिनिक ने पिछले सालों में कारीगरों के साथ काम किया, संसाधनों, कौशल तथा ट्रैनिंग से उनकी कला को विश्व में फैलाने तथा उसका बाज़ार बनाने में मदद की है। गुजरात में सन 1998 के तूफ़ान और फिर सन 2001 में भुज में आए भूकंप की वजह से इन संगठनों को, इन शिल्प कलाओं को पुनर्जीवित करने के अपने तौर तरीक़ों को बदलना पड़ा था। कच्छ में कशीदाकारी कला को पुनर्जीवित करने के लिये सन 1997 में क़साब कंपनी की स्थापना की गई थी जिसमें सिर्फ़ महिला कारीगर ही थीं। आज ये कंपनी कच्छ के 62 गांवों में 11 समुदायों के 1500 से ज़्यादा महिला कारीगरों के साथ काम कर रही है।

क़साब संगठन की महिलाएं एक डिज़ाइन वर्कशॉप में

कंपनी के निदेशक और सी.ई.ओ. पुनीत सोनी के अनुसार हमारा उद्देश्य महिला कारीगरों के लिये ऐसा संगठन बनान था जिसकी मदद से “क़साब” स्थापित किया जा सके। सन 1990 के दशक के दौरान स्थितियां बहुत चुनौतीपूर्ण थीं। महिला कारीगरों को मेहनताना ठीक नहीं मिलता था और उनकी कशीदाकारी परंपरा ढ़लान पर थी और बाज़ार में ऐसी कशीदाकारी की भरमार थी जो न तो प्रमाणिक थी और न ही पारंपरिक। हम एक ऐसा संगठन बनाना चाहते थे जहां महिलाएं मिलकर काम करें और कमा सकें…इस कला का पुनरुत्थान हमारा प्रमुख उद्देश्य था।”

कारीगरों ख़ासकर सिंध से आए कशीदाकारों के लिये कला रक्षा की स्थापना सन 1993 में हुई थी। कला रक्षा की वजह से आज विशिष्ट संस्कृति वाले सात समुदायों के कशीदाकारी करने वाले एक हज़ार कारीगरों के जीवन में सुधार आया है। यहां एक संग्रहालय भी है जहां पिछली पीढ़ी से मिले बुनने योग्य कपड़े और बहुमूल्य माल असबाब संरक्षित हैं। इसके अलावा शैक्षिक संस्थान कला रक्षा विद्यालय भी है। कला रक्षा के प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर मुकेश भनानी के अनुसार वे कारीगरों की सर्वक्षेष्ठ रचनात्मकता को सामने लाते हैं और उनका संगठन इसी सिद्धांत पर काम करता है। उनका मानना है कि शिल्पकला-उत्पाद की उत्पादन प्रक्रिया में कारीगरों का पूरी तरह शामिल होना बहुत महत्वपूर्ण है ताकि उनके काम की गुणवत्ता में निखार आए। कला रक्षा का शैक्षिक विभाग भी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे कारीगरों को मौजूदा समय की मांग के अनुसार डिज़ाइन तैयार करने में मदद मिलती है। यहां कारीगरों को डिज़ाइन बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है।

कला रक्षा के संग्रहालय में कारीगर | कला रक्षा

कारीगरों की रचनात्मकता को बाहर लाना और बाज़ार के हिसाब से उनके हुनर को बेहतर करना कला रक्षा का उद्देश्य रहा है – ये हम कला रक्षा विद्यालय के माध्यम से कर रहे हैं। ये इंडिया का पहला ऐसा डिज़ाइन स्कूल है जहाँ ऐसे पारंपरिक कारीगर प्रशिक्षित किये जाते हैं जो पढ़े-लिखे नहीं हैं और जिन्हे पता नहीं होता कि उनका सामान कहाँ बिकता है, कौन ख़रीदता है। ये सब चीज़ें वो यहाँ सीखते हैं और इनका समावेश अपने काम में करते हैं।’

मुकेश का कहना है कि हालंकि कारीगरों को अपनी पारंपरिक तकनीक के बारे में जानकारी है लेकिन ये हमारा फ़र्ज़ है कि हम पारंपरिक तकनीक से हटकर नये ज़माने की तकनीक सिखाएं। इसके लिये हम उन्हें सही हुनर और प्रशिक्षण मुहैया कराते हैं।

कला रक्षा के कारीगरों द्वारा की गई रबारी कढ़ाई, जो पीपल ट्री पर उब्लब्ध है

एक तरफ जहां कला रक्षा और क़सब जैसे संगठनों ने कारीगरों के साथ मिलकर काम किया है वहीं कारीगर क्लिनिक एक विशेष उद्देश्य के साथ काम करती है। कारीगर क्लिनिक के संस्थापक डॉ. निलेश प्रियदर्शी के अनुसार, “एक जगह जहाँ कमी आ रही थी वो थी कारीगरों की पहचान। अगर हम कच्छ को भूल जाएं और पूरे शिल्पकला क्षेत्र की बात करें, तो आज भी ये देखा जाता है कि कारीगर जो काम कर रहे हैं उससे उनकी ज़िन्दगी में ज़्यादा बदलाव नहीं आये हैं। इस सिलिसिले में हमने कारीगरों से पूछा कि आपके लिए अच्छी ज़िन्दगी क्या है , तो जवाब आया कि हमें सिर्फ पैसे नहीं चाहिए, पैसे के साथ आइडिंटिटी भी चाहिए। तो हमने इस कमी को देखा और सोचा कि अगर कारीगर के ख़ुद के नाम की ब्रांड बनाई जाए तो उनकी उम्मीदें पूरी हो जाएंगी।

कारीगर क्लिनिक ख़ुद को कारीगरों के लिये एक ग्राम बिजनैस क्लिनिक मानती है। ये क्लिनिक कारीगरों को उधमी के रुप में विकसित करने और आत्मनिर्भर बनने में मदद कर रही है। ये संगठन कारीगरों को हुनर सीखने, संसाधनों का उपयोग करने और व्यवसाय का पारिस्थितिक तंत्र विकसित करने में सहयोग देती है।

पाबिबेन ऐसी ही एक सफलता की कहानी है। पाबिबेन एक पारंपरिक रबारी कशीदाकार हुआ करती थीं जो आज एक सफल उद्धमी बन चुकी हैं जिन्होंने अपने समदाय की दो सौ से ज़्यादा महिलाओं को रोज़गार दे रखा है। कारीगर क्लिनिक ने उनकी उनके ब्रांड ‘pabiben.com‘ को स्थापित करने में मदद की। ‘pabiben.com‘ आज पाबि बैग के लिये मशहूर हैं।

पाबिबेन

एक अद्धमी के रुप में पबीबेन की उन्नति का उदाहरण देते हुए डॉ. निलेश ने कहा कि पाबिबेन ने पंद्रह सौ रुपये प्रतिमाह की कमाई से शुरुआत की थी लेकिन आज उनका तीस लाख से ज़्यादा का कारोबार है। वे अब और कारीगरों को उनके ब्रांड स्थापित करने में मदद कर रहे हैं और उनके ब्रांड के नाम उन्हीं के नाम पर होते हैं ताकि बाज़ार में उनकी पहचान बन सके।

पीपल ट्री पर मौजूद पाबि बैग

शिल्पकला क्षेत्र के ई-कॉमर्स पक्ष पर काम करने वाली अर्चना नायर का मानना है कि इस कला के विकास और उत्पत्ति के लिये ग्राहकों में जागरुकता भी बहुत महत्वपूर्ण है। ग्राहकों का ये जानना बहुत ज़रुरी है कि एक उत्पाद बनाने में कितनी मेहनत लगती है। ये जानने के बाद ही ग्राहकों को उत्पाद की अहमियत समझ में आती है। पीपल ट्री में वे लोग ख़रीदारों को उत्पाद बनाने की प्रक्रिया के बारे में समझाते हैं और उन्हें बनानेवाले कारीगरों के बारे में भी बताते हैं।

एक महत्वपूर्ण बात जो मिस्टर सोनी ने बताई वो थी सामान की संख्या से ज़्यादा गुणवत्ता को एहमियत देना। कारीगरों के सभी दल इस बात को सुनिश्चित करते हैं कि गुणवत्ता के साथ समझौता न हो।

कढ़ाई से बना चौपड़ का खेल

हमारे सभी मेहमानों की राय थी कि मौजूदा समय में शिल्पकला और डिज़ाइन में विविधता लाना महत्वपूर्ण है लेकिन साथ ही शिल्पकला और तकनीक की प्रामाणिकता और मौलिकता को बनाये रखना भी उतना ही ज़रुरी है। भले ही बाज़ार में कितनी ही मांग हो या फिर आधुनिक समय में ग्राहकों की मांग के अनुसार उत्पाद की डिज़ाइन दोबारा क्यों न बनानी पड़े, शिल्पकला और तकनीक की प्रामाणिकता और मौलिकता के साथ समझौता नहीं होना चाहिये।

इन सभी संगठनों में एक समानता है और वो ये है कि ये सभी संगठन सिर्फ़ शिल्पकला ही नहीं बल्कि कारीगरों को बढ़ावा देने के लिये काम कर रहे हैं। हुनर को तराशना, बाज़ार और बिजनैस के प्रति जागरुकता पैदा करना, ये कुछ ऐसी चीज़े हैं जो ये संगठन कारीगरों को सिखाते हैं। हमारे सभी मेहमानों का मानना था कि कला और शिल्पकला की क़ीमत की एहमियत समझकर ही हम हमारी समृद्ध विरासत को अगले स्तर तक ले जा सकते हैं।

ये सत्र अंग्रेज़ी में हमारे चैनल पर दिखाया गया है। आप इस सत्र की पूरी परिचर्चा अंग्रेज़ी में यहां देख सकते हैं-

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