बाल गंधर्व: महाराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान

बाल गंधर्व: महाराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान

20वीं सदी के आरंभिक दशकों में एक गायक महाराष्ट्र की महिलाओं के लिए फ़ैशन का प्रतीक बन गया था। ये गायक जिस तरह की साड़ियां और ज़ेवरात पहनता था और जिस तरह का व्यवहार करता था, मराठी महिलाएं ठीक उसी तरह उसकी नक़ल करती थीं। दिलचस्प बात ये है, कि ये स्टार कोई महिला नहीं बल्कि एक पुरुष था, जो नाटकों में महिला पात्र निभाने के लिए मशहूर था। इनका नाम नारायण श्रीपद राजहंस था, जो “बाल गंधर्व” नाम से प्रसिद्ध थे। इनके प्रशंसकों में स्वतंत्रता सैनानी लोकमान्य तिलक से लेकर बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ शामिल थे। इसके अलावा महाराष्ट्र की तमाम जानी-मानी हस्तियां भी बाल गंधर्व की मुरीद थीं।

26 जून, सन 1888 में जन्में नारायण श्रीपद राजहंस मराठी थियेटर के मशहूर गायक और अभिनेता थे। उन्होंने 25 से ज़्यादा संगीत-नाटकों में अभिनय किया था। उनके पिता का नाम श्रीपद राजहंस और मां का नाम अन्नपूर्णा बाई था, जो महाराष्ट्र में सांगली ज़िले के नागथाने गांव के रहने वाले थे।

बचपन से ही नारायण राजहंस पर संगीत का प्रभाव था। उनकी प्रतिभा को देखते हुए शास्त्रीय संगीत सीखने के लिए, उन्हें महाराष्ट्र के जलगांव में एक संगीत शिक्षक के सुपुर्द कर दिया गया। संगीत में उनका करिअर बहुत कम उम्र में ही शुरु हो गया। दस साल की उम्र में जब वह मंच पर गा कर रहे थे, तो उस दौरान दर्शकों में लोकमान्य तिलक भी मौजूद थे, जो उनकी गायिकी से इतने प्रभावित हुए, कि उन्होंने उनका नाम बाल गंधर्व रख दिया। इसके बाद सारी ज़िंदगी वह इसी नाम से जाने गये।

बाल गन्धर्व

बाल गंधर्व की गायन प्रतिभा पर कोल्हापुर के छत्रपति साहू महाराज का ध्यान गया, जो कला और संगीत के संरक्षक हुआ करते थे। बाल गंधर्व की प्रतिभा से प्रभावित होकर सन 1905 में छत्रपति साहू महाराज ने उनको किर्लोस्कर नाटक मंडली में भर्ती करवा दिया। ये एक महत्वपूर्ण नाटक मंडली थी, जिसकी स्थापना बलवंत पांडुरंग किर्लोस्कर ने की थी, जिन्हें अन्नासाहब किर्लोस्कर नाम से जाना जाता था। अन्नासाहब ने ही पहली बार मराठी थियेटर में संगीत-नाटक की शुरुआत की थी।

उन दिनों महिलाओं को नाटकों में काम करने की इजाज़त नहीं थी। इसीलिए नाटक मंडलियां ऐसे युवाओं की तलाश में रहती थीं, जो गायिकी के साथ-साथ महिलाओं का किरदार भी निभा सकें। बाल गंधर्व को किर्लोस्कर नाटक मंडली में प्रसिद्ध नाटककार गोविंद बल्लाल देवल ने प्रशिक्षण दिया।

रंगमंच हमेशा से ही महाराष्ट्र की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहा है। संगीत-नाटक मराठी रंगमंच की विशेषता रहा है, यानी ऐसा नाटक जिसमें संगीत भी होता है।

अन्नासाहब किर्लोस्कर ने “शाकुंतल” नाटक के साथ ही मराठी थियेटर में एक नई विधा को जन्म दिया, जिसे “संगीत-नाटक” के नाम से जाना जाता है। इस विधा के ज़रिए शास्त्रीय संगीत आम लोगों तक पहुंचा। बाल गंधर्व ने अपने सटीक अभिनय और गायिकी से इसे इतना लोकप्रिय बना दिया, कि उस युग को “गंधर्व युग” के नाम से जाना जाने लगा। नाट्य-संगीत के उनके प्रस्तुतिकरण को क्लासिक माना जाता है। संगीत-नाटक आज भी लोकप्रिय है और कलाकारों की पीढ़ियां बाल गंधर्व जैसे महान कलाकारों की विरासत को आगे बढ़ा रही हैं।

बाल गंधर्व ने सन 1905 में “शाकुंतल” संगीत-नाटक के साथ अपने करिअर की शुरुआत की। शाकुंतल संस्कृत नाटक कालिदास के लिखे “अभिज्ञान शाकुंतलम” पर आधारित था, जिसका रुपांतरण अन्नासाहब किर्लोस्कर ने किया था। इस नाटक में बाल गंधर्व ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। बाल गंधर्व ने अपनी आवाज़ और शांकुतला के रुप में अपने अभिनय से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया था। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

सन 1911 में बाल गंधर्व ने मानापमान नाटक मे अभिनय किया, जो उनके प्रसिद्ध नाटकों में से एक था। इसमें उन्होंने भामिनी की भूमिका की थी। जिस दिन नाटक खेला जाना था, उस दिन बाल गंधर्व के घर में एक त्रासदी हो गई। उनके पहले बच्चे का निधन हो गया था, लेकिन नाटक के प्रति वह इतने समर्पित थे, कि इस हादसे और साथियों के समझाने के बावजूद नाटक स्थगित नहीं किया। उन्होंने नाटक किया और अपने अभिनय से दर्शकों को रुला दिया।

किर्लोस्कर नाटक मंडली के साथ मतभेद होने के बाद बाल गंधर्व इससे अलग हो गए और पांच जुलाई सन 1913 को उन्होंने गंधर्व नाटक मंडली की स्थापना कर दी। उनके साथ अभिनेता गोविंद बोडस और हारमोनियम वादक तथा गायक गणपतराव तेंबे भी उनके साथ शामिल हुए।

शुरुआत में वित्तीय संकट और अन्य दिक़्कतों के बाद बाल गंधर्व की नाटक मंडली को अपार सफलता मिली और इसका नाम दूर दूर तक फैल गया। बड़ौदा के महाराज सयाजीराव गायकवाड़-तृतीय ने जब इस बारे में सुना, तो उन्होंने कंपनी को संरक्षण दिया।

बाल गंधर्व हर बार पहले की तुलना में कहीं ज़्यादा बेहतर अभिनय करते थे। उनके द्वारा अभिनीत कुछ प्रसिद्ध किरदार है-स्वयंवर में रुकमणि, जो भगवान कृष्ण और रुकमणि के विवाह पर आधारित था, एकच प्याला में सिंधु जो एक युवा वकील की शराब की लत की वजह से परिवार में बरबादी के बारे में था और वसंतसेना। वसंतसेना की भूमिका उन्होंने शुद्रक के संस्कृत नाटक मृच्छकटिका के रुपांतरित नाटक में निभाई थी। बाल गंधर्व की कंपनी ने शारदा जैसे नाटक भी किए, जिसमें बाल-विवाह जैसी कुरीतियों की आलोचना की गई थी।

बाल गंधर्व दर्शकों को समग्र रंगमंच का अनुभव कराते थे । इसीलिए उनकी एक अलग पहचान बनी। वह नाटक के लिए भव्य सेट और किरदारों के लिए शानदार पोशाकें बनवाते थे जो उन दिनों आम बात नहीं थी। वह अपने काम में कोई कसर छोडने वाले व्यक्ति नहीं थे । वह क्वालिटी के साथ समझौता नहीं करते थे। वह लिबास और सजावट पर जमकर ख़र्च करते थे, भले ही उसका इस्तेमाल एक दृश्य के लिए ही क्यों न हो। वह अपनी साड़ियों और ज़ेवर की क़िस्म पर ख़ास ध्यान देते थे। उनकी ज़्यादातर साड़ियां और ज़ोवर विशेष ऑर्डर पर सर्वश्रेष्ठ सामग्री से तैयार करवाई जाती थीं। महिलाओं का किरदार वह इतने विश्वास और ऊर्जा से अदा करते थे, कि लगता ही नहीं था कोई पुरुष महिला का अभिनय कर रहा है।

बाल गन्धर्व, बाएं में

कहा जाता है, कि एक बार बाल गंधर्व हल्दी-कुमकुम समारोह में महिला के भेस में चले गए थे, तो वहां उन्हें कोई पहचान नहीं पाया। हल्दी-कुमकुम समारोह सिर्फ महिलाओं के लिए होता था।

प्रसिद्ध संगीत वैज्ञानिक और संगीत समालोचक मोहन नाडकर्णी अपनी किताब ‘द नान्परेल थेस्पियन’ में लिखते हैं-“बाल गंधर्व के अभिनय का जलवा ऐसा बढ़ा, कि नाटक के रसिक लोग भले ही नाटक कहीं भी हो रहा हो, उसे देखने के लिए दूर दूर से आते थे। उस समय तार के द्वारा टिकटें बुक करवाईं जाती थीं और लोगों को लाने के लिए बसों का इंतज़ाम किया जाता था। क्या आप सोच सकते हैं कि उन दिनों लोग उनके अभिनय को देखने और उनके गायन को सुनने के लिए सौ रुपए तक का टिकट ख़रीदते थे।”

सिनेमा के आने के बाद थियेटर की लोकप्रियता घटने लगी और मनोरंजन की दुनियां में उसकी पकड़ कमज़ोर हो गई। प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता-निर्देशक और अभिनेता वी. शांताराम ने बाल गंधर्व के साथ एक अनुबंध किया था जो एक फ़िल्म के बाद ही ख़त्म हो गया। बाल गंधर्व फ़िल्मों में अभिनय को लेकर सहज मेहसूस नहीं करते थे। उनकी पहली फ़िल्म “धर्मात्मा” सन 1935 में रिलीज़ हुई थी। ये फ़िल्म संत एकनाथ पर आधारित थी, जिसमें उन्होंने पुरुष का मुख्य किरदार निभाया था, जो मंच पर उनके द्वारा अभिनीत किरदारों से एकदम अलग था। बाद में उन्होंने “साध्वी मीरा बाई” नाम की फ़िल्म की थी। इन दोनों ही फ़िल्मों को कोई ख़ास सफलता नहीं मिली।

बाल गंधर्व को सन 1955 में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जिसे आज संगींत नाटक अकादमी पुरस्कार कहते हैं। ये भारत में संगीत के क्षेत्र का सर्वोच्च पुरस्कार है। सन 1964 में रंगमंच के क्षेत्र में बहुमूल्य योगदान के लिए, उन्हें भारत के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मभूषण से नवाज़ा गया।

बाल गन्धर्व, महिला की वेशभूषा में

पुणे में उनके सम्मान में “बाल गंधर्व रंग मंडल” की स्थापना की गई, जिसकी नींव ख़ुद बाल गंधर्व ने रखी थी। इसका निर्माण पुणे निगम ने सन 1968 में किया था। रंग मंडल बनाने का विचार प्रसिद्ध लेखक और व्यंगकार पी.एल. देशपाण्डे का था। सन 2011 में बाल गंधर्व के जीवन पर एक फ़िल्म रिलीज़ हुई जिसका नाम “साउंड ऑफ़ हेवन-द स्टोरी ऑफ़ बाल गंधर्व” था। इस फ़िल्म में बाल गंधर्व की जीवन यात्रा दिखाई गई है।

दुर्भाग्य से बाल गंधर्व अपनी कला में अपनी श्रेष्ठता और व्यवसायिक्ता में तालमेल नहीं बैठा पाए। उन्हें रंगमंच की दुनिया में बहुत सफलता हासिल की लेकिन अंतिम दिनों में उन्हें वित्तीय संकट झेलना पड़ा। सन 1967 में बाल गंधर्व का निधन हुआ और इस तरह मराठी रंगमंच का एक गौरवपूर्ण युग भी समाप्त हुआ। अपने जीवनकाल में बाल गंधर्व ने मराठी रंगमंच में भरपूर योगदान दिया, जिसकी अमिट छाप आज भी हमें दिखती है।

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