कम ख़तरनाक नहीं था सन 1896 का प्लेग 

कम ख़तरनाक नहीं था सन 1896 का प्लेग 

ब्यूबोनिक प्लेग पिस्सुओं से फैलता है। वे पिस्सू जो जानवरों के शरीर पर रहकर उनका ख़ून चूसते हैं और अवसर पाने पर मनुष्य को संक्रमित कर देते हैं। संसार भर में पिस्सुओं की 2500 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं, इसलिए ऐसे में यह पता लगाना आसान नहीं है कि पिस्सू की कौन सी प्रजाति से यह जानलेवा संक्रमण फैल रहा है।

सन 1896 में यही हुआ था। तत्कालीन मुंबई में यह संक्रमण फैल गया। ईस्ट इंडिया कंपनी की ब्रिटिश सरकार ने ऐसे में भारतीय सेना को काम पर लगाया और इस महामारी के विरुद्ध इतनी सख़्त मोर्चाबंदी की जो ऐतिहासिक घटना बन गई।

यह कोई ऐसी घटना नहीं थी जो आकस्मिक स्थितियों में सेना के उपयोग का कोई अकेला उदाहरण रही होगी। ऐसे तमाम अवसर आते रहते हैं, लेकिन सन 1896-97 में प्लेग की इस महामारी से बचने के लिए जो इंतज़ाम किए गए थे वह आज के कोविड-19 से भी व्यापक थे।

दरअसल, ब्यूबोनिक प्लेग सैकड़ों साल तक संसार भर में तबाही मचाता रहा है । इसकी सबसे ख़तरनाक स्थिति 14वीं शताब्दी में सामने आई थी जब इसने यूरोप की आधी से अधिक आबादी को साफ़ कर दिया था। उसे तब ‘काली मौत’ का नाम दिया गया था।

सन 1896 की गर्मियों में जब यह प्लेग मुंबई में पहुंचने से पहले, सन 1850 के आसपास चीन और संसार के अन्य देशों में काफ़ी तबाही मचा चुका था। इस प्लेग के लक्षण बहुत भयावह होते थे, जिसमें बहुत तेज बुख़ार और ग्रंथियों का सूज जाना शामिल था, ख़ासतौर से अंडकोष और बग़ल के हिस्सों में जानलेवा गांठों का पड़ जाना। जब तक आधुनिक एंटीबायोटिक का निर्माण नहीं हुआ था तब तक इस रोग से पीड़ित होने वाले व्यक्ति की कुछ ही दिन में मौत हो जाना निश्चित हुआ करता था। बहुत कम ऐसे लोग हुआ करते थे जो इसके क़हर से बच पाते थे।

तब ‘गेटवे टू इंडिया’ कहलाने वाला मुंबई भारत का महत्वपूर्ण बंदरगाह और व्यावसायिक केंद्र था। सन 1896 में यहां की आबादी लगभग आठ लाख रही थी। यह प्लेग संभवत: उस वर्ष अगस्त माह की शुरुआत में आया था। पहला केस उसी महीने में पता चला था, लेकिन स्वास्थ्य विभाग के लोगों के पास इस तरह की बीमारियों से लड़ने का अनुभव नहीं था इसलिए उन्हें समझ में नहीं आया कि क्या किया जाए। उनकों यह भी चिंता थी कि यदि इसके बारे में अधिक चर्चा की गई तो इसका व्यापार पर बहुत विपरीत प्रभाव पड़ेगा और इस बंदरगाह पर व्यापारिक जहाज़ों का आना बंद हो जाएगा।

लेकिन स्थितियां इतनी ख़राब होती गईं कि ऐसी सोच ज़्यादा देर तक नहीं टिक पाई। अक्टूबर माह आते-आते तक म्युनिस्पिल प्लेग समिति का गठन किया गया जिसका मुख्य अधिकारी ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की भारतीय मेडिकल सेवा का अधिकारी था। ईस्ट इंडिया कंपनी ने सन 1873 में इंडियन मेडिकल सर्विस की स्थापना की थी। यह स्थापना तत्कालीन मुख्य जगहों– मुंबई, मद्रास और बंगाल के लिए की गई थी। मात्र संयोग यह था कि इस प्लेग के फैलने से कुछ ही दिन पूर्व, सन 1896 में ही इस सेवा को सेना के सुधारों के अंतर्गत एक एकीकृत सेवा का रूप दिया गया था। अब उनकी ज़िम्मेदारी थी कि वह भारतीय सेना के स्टाफ़ के स्वास्थ्य का तो ध्यान रखें ,साथ ही आम जनता के लिए ज़रूरी स्वास्थ्य सेवाओं की जिम्मेदारियों भी निभाएँ।

सन1897 की मुंबई प्लेग समिति

अब म्युनिस्पिल कॉरपोरेशन की इस समिति ने प्लेग के ऐसे रोगियों को ढ़ूंढ़ कर उन्हें अलग करने, संक्रमण-मुक्त करने, संक्रमणकारी स्थलों को नष्ट करने तथा यात्रियों की आवाजाही पर कड़ी निगाह रखने का काम किया। पर दिक़क़त यह थी कि रोग के फैलाव को रोकने के यह उपाय असफल हो गए। इनकी वजह से लोगों में भय का माहौल व्याप्त हो गया और शहरों से बड़ी संख्या में लोगों का पलायन शुरू हो गया।

मार्च सन 1897 में हज़ारों लोग प्लेग के संक्रमण और सम्भावित मृत्यु के भय से पलायन कर चुके थे। मरने वालों की संख्या 20 हज़ार के आसपास पहुंच चुकी थी। यह बीमारी दूसरे शहरों में भी फैलने लगी थी । धीरे-धीरे इसने व्यापक रूप से लिया था।

सरकार की पहली चिंता यह थी कि मुंबई को एक व्यापारिक राजधानी के रूप में बनाए रखने के लिए इस संक्रमण को दूर रखना और इससे मुक्त पाना ज़रूरी था। परंतु इस सोच के कारण वह स्थिति को उचित तरीक़े से नहीं संभाल पाई। सरकारी तौर पर सर्वोच्च स्तर पर भारत के मामलों के सचिव लॉर्ड जॉर्ज फ़्रांसिस हैमिल्टन ने इस रोग से लड़ने के लिए कठोर क़दम उठाने पर बल दिया।उन्होंने तत्कालीन वायसराय विक्टर ब्रूस एल्गिन से असहमति दिखाई जो इस मामले में सोच समझकर चलने की राय रखते थे।

दरअसल एलगिन के दिमाग़ में तब भी सन 1857 की भारतीय विद्रोह की घटनाएँ ताज़ा थीं। वह ऐसा कोई क़दम नहीं उठाना चाहते थे जिसको लेकर स्थानीय लोगों के अधिकारों और परंपराओं का हनन हो और लोगों में दोबारा विद्रोह की भावना को बल मिले ।

इसके बावजूद जब सन 1897 के वसंत के आसपास, प्लेग की रोकथाम के लिये जो कार्यवाही की गई तो वह सोची-समझी रणनीति से कहीं अधिक कठोर साबित हुई। इसके लिए एक ख़ास अध्यादेश लाया गया जिसे ‘एंडेमिक डिज़ीज़ एक्ट’ का नाम दिया गया। इसमें सरकार को इस समस्या से निपटने के लिए अथाह शक्ति दी गई थीं।

अब नई प्लेग समितियों का गठन किया गया और रोग प्रभावित क्षेत्रों में बहुत सख़्त नीति के अंतर्गत कार्यवाही की गई। मुंबई में म्युनिसिपल समिति को बदलकर भारतीय सेना के ब्रिगेडियर-जनरल विलियम गाटाकर के नेतृत्व में एक सख़्त समिति का रूप दिया गया।

इस समिति ने प्लेग के मरीज़ों को ढ़ूंढ़ कर उन्हें अलग जगह पर रखना आरंभ किया था। साथ ही युद्ध स्तर पर गलियों और मकानों को, व्यापक रूप से असँक्रमित किए जाने की कार्यवाही सुनिश्चित की गई। इसके लिए प्रभावित क्षेत्रों में शक्तिशाली दलों को संदिग्ध भवनों की तलाशी के अधिकार दिए गए। इस संक्रमण को रोकेने के लिए, भवनों को रासायनिक असंक्रमणकारी घोल और शक्तिशाली पंप के प्रेशर से निकलते पानी से धुलवाया गया। यात्रियों को भी बहुत बारीकी से स्क्रीनिंग कर, उनमें से संक्रमित लोगों को रोक दिया गया।

प्लेग से बचाव-- रेल यात्रियों की जांच

यह प्लेग के रोगियों से, संक्रमण बचाने का एक बेहतर तरीक़ा था। शहर और आसपास के इलाक़ों में विशेष अस्पतालों और कैंपों की स्थापना की गई। ब्रिटिश आर्मी की इकाइयों और भारतीय सेना के जवानों ने पूरी शक्ति के साथ इन कारवाई में साथ दिया। सिपाहियों को, क्षेत्रों को सील करने, सर्च पार्टियों को सहायता करने, यात्रा के प्रतिबंधों को सुनिश्चित करने, मरीज़ों की देखभाल और संक्रमण को रोकने की प्रक्रिया की देखरेख करने की ज़िम्मेदारी दी गई थी।

स्वास्थ्य विभाग से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने तब स्थिति पर निगाह डालते हुए कहा था

“हमने घरों को इस तरह से असंक्रमित किया है जैसे किसी घर में आग लगी हो और उसका बचाव किया जाता हैहमने स्टीम इंजन और प्रेशर से पानी और असंक्रमणकारी घोल को पूरे घरों में बेहतर तरीक़े से छिड़कने के प्रयास किये।

दिक़्क़्त यह थी कि यह ऐसा रोग था जिसके विषय में कोई कुछ नहीं जानता-समझता था। अच्छी बात यह थी कि प्लेग के लिए टीका बनाने की प्रक्रिया में काफ़ी सफलता मिल चुकी थी। दुर्भाग्य यह था कि इसे फैलाने में चूहों और पिस्सुओं की भूमिका पूरी तरह समझ में नहीं आ सकी थी। आरंभ में इसके फैलाव को रोकने के लिए किए गए उपाय कारगर नहीं हुए थे।

काले प्लेग का मुंबई का एकमात्र जीवित बचा मरीज

इसके साथ ही भारत के वायसराय एल्गिन और अन्य लोगों का जो अंदेशा था वह सच साबित होता दिख रहा था। भारत के लोग इस संबंध में की गई कार्यवाही को अपने अधिकारों और परंपराओं पर अतिक्रमण की तरह देख रहे थे। जब एक दूसरे के प्रति अविश्वास की भावना हो तब ऐसे अंदेशे और भी बढ़ जाया करते हैं। बीमारी को फैलने से रोकने के लिए, आने-जाने पर लगाये गए प्रतिबंधों को, धार्मिक यात्राओं से जोड़ कर देखने पर आक्रोश की स्थिति उत्पन्न हो रही थी। इसी तरह घरों की जबरन जांच को निजता का उल्लंघन माना जा रहा था। तम्बूओं और अस्पतालों में लोगों को उनकी इच्छा के बिना अलग रखा जा रहा था, जो उनके हित में था पर आम जनता की समझ से परे था।

ऐसी स्थिति में ब्रिटिश इंडिया के अधिकारियों के सरकारी निर्णयों और कार्यवाहियों का विरोध तथा उनसे असहयोग तो होना ही था। मार्च सन 1898 में आख़िरकार इस स्थिति को लेकर हड़तालें और दंगे शुरू हो गए, तब उच्च अधिकारियों को अपने फ़ैसलों में बदलाव की रणनीति पर अमल करना पड़ा। घरों की जामा तलाशियों के लिए लगाए गए सैन्य बलों को वापस बुला लिया गया और स्थानीय लोगों के साथ सहयोग की भावना को तरजीह दी जाने लगी।

ब्रिटिश रॉयल डबलिन इकाई जिसकी ड्यूटी घर-घर जाकर प्लेग के मरीजों का पता लगाने की थी 

आख़िरकार सन 1898 में इस संक्रामक रोग से लड़ने के लिए जनता को यह बताया जाना और जागरूक करना प्रमुख उपाय हो गया कि यह बीमारी फैलती कैसे है। चूहों का सफाया करने तथा झुग्गी-झोपड़ियों में स्वच्छता अभियान और नए टीके की ईजाद ने इस दिशा में काफ़ी योगदान मिला। लेकिन ऐसा नहीं था कि यह संक्रामक रोग बहुत जल्दी ख़त्म हो गया हो। सन 1920 के आसपास तक यह रोग धीरे-धीरे हिम्मत हार गया था। आज प्लेग से कोई ख़तरा ही नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि जब तक इसके ख़तरे से मुक्ति मिलती, तब तक भारत के लगभग एक करोड़ लोगों की जानें इस बीमारी ने लील ली थीं।

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