गोविंद देव जी मंदिर: आस्था और परंपराओं का केंद्र

गोविंद देव जी मंदिर: आस्था और परंपराओं का केंद्र

जयपुर की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत सालों से लोगों के लिये आकर्षण का केंद्र रहे हैं लेकिन भव्य महलों और चहलपहल वाले बाज़ारों के अलावा शहर के मंदिर भी सैलानियों तथा स्थानीय लोगों की पसंदीदा जगह हैं। ऐसा ही एक मंदिर है गोविंद देव जी।

राजस्थान के गुलाबी शहर के सिटी पैलेस परिसर में स्थित गोविंद देव जी मंदिर भगवान कृष्ण के गोविंद रुप को समर्पित है। हालंकि मंदिर का निर्माण 18वीं शताब्दी में हुआ था लेकिन गोविंद देव की मूर्ति का इतिहास इससे कहीं पुराना है। इस मूर्ति का संबंध अध्यात्मिक नगर वृंदावन से भी है जहां पहले इसकी स्थापना हुई थी।

गोविंद देव की प्रतिमा के साथ एक दिलचस्प कथा जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि कृष्ण के परपोते वज्रनाथ एक बार कृष्ण की मूर्ति बना रहे थे जिसमें उनकी दादी उनकी मदद कर रही थीं। कहा जाता है कि दादी ने भगवान को साक्षात रुप में देखा था। दादी ने भगवान का जो हुलिया बयान किया उसके अनुसार वज्रनाथ ने जो प्रतिमा बनाई उसका सिर्फ़ पांव और एक हाथ कृष्ण से मिल रहे थे। इसे मदन मोहन कहा जाने लगा और आज उनकी ये प्रतिमा करौली (राजस्थान) के एक मंदिर में स्थापित है। दूसरी प्रतिमा का सीना और बाज़ू कृष्ण से मिल रहे थे जिसे गोपीनाथ कहा जाता था। दादी के अनुसार तीसरी प्रतिमा कृष्ण से एक दम मिलती जुलती थी, ख़ासकर आंखें। इस प्रतिमा का नाम पड़ा गोविंद देव।

16वीं शताब्दी के दौरान उत्तर भारत में संत चैतन्य महाप्रभु की अगुवाई में पूजा की वैष्णव पद्धति लोकप्रिय हो रही थी। चैतन्य महाप्रभु साथ ही गौड़िया वैष्णववाद का भी प्रचार कर रहे थे। गौड़िया का संबंध मौजूदा समय के पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश से है। कहा जाता है कि ब्रज की खोई हुई प्रतिष्ठा को पुन: स्थापित करने के लिये चैतन्य ने ब्रज क्षेत्र में खोए हुए मंदिरों और स्थानों को ढूंढ़ने का आदेश दिया। सांस्कृतिक रुप से ब्रज का संबंध कृष्ण से माना जाता है और इसका अधिकतर हिस्सा उत्तर प्रदेश में है।

चैतन्य महाप्रभु

चैतन्य के दो अनुयायियों, रुप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी ने वृंदावन में गोविंद और मदन मोहन की प्रतिमाएं खोज निकालीं। रूप और सनातन ये दोनों अनुयायी भाई थे और बंगाल के गौड़ मुस्लिम साम्राज्य के दरबार में मुसाहिब थे। लेकिन चैतन्य महाप्रभु से मिलने के बाद वे सारी ज़िंदगी के लिये उनके भक्त हो गए। सन 1525 में रुप गोस्वामी ने वृंदावन में गोविन्द देव की मूर्ती को प्राण-प्रतिष्ठित किया लेकिन सन 1590 में वृंदावन में एक भव्य मंदिर के निर्माण के बाद ही इस प्रतिमा को वहां स्थापित किया गया था।

ये निर्माण आमेर के राजा मानसिंह ने करवाया था । राजा मानसिंह अकबर के सेनापति थे। सन 1587 और 1594 के दौरान बिहार और बंगाल में सैन्य अभियान के समय मान सिंह चैतन्य और वैष्णव परंपरा से बहुत प्रभावित हो गये थे। राजा मान सिंह ने वृंदावन में गोविंद देव जी का सात मंज़िला मंदिर बनवाया था। मंदिर के रिकॉर्ड में मंदिर निर्माण और कारीगरों का उल्लेख मिलता है जो आमेर से बुलवाए गए थे। मंदिर के लिये मुग़ल बादशाह अकबर ने 135 बीघा ज़मीन दी थी। अकबर के 34वें शाही वर्ष के रिकॉर्ड में मंदिर के साथ अकबर के संबंधों का ज़िक्र है।

राजा मान सिंह

वृंदावन में इस मंदिर को बहुत महत्व दिया जाता था और ये आज भी वहां के महत्वपूर्ण मंदिरों में से एक है। लेकिन 17वीं शताब्दी में मंदिर पर संकट के बादल मंडराने लगे थे। सन 1699 में तत्कालीन मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब ने वृंदावन और आसपास के क्षेत्रों में मंदिरों को तोड़ने का आदेश दे दिया। मूर्तियों को बचाने के लिये इन्हें मंदिर से हटा लिया गया। गोविंद देव मंदिर के गोस्वामी मूर्ती लेकर पहले वृंदावन के पास राधाकुंड और कामा ले गए थे लेकिन सन 1714 में मूर्ति आमेर ले जाई गई जो उस समय राजस्थान के कछवाह शासकों की राजधानी हुआ करता था। तब जयपुर शहर के संस्थापक सवाई जय सिंह-द्वतीय का शासन था।

वृन्दावन में स्थित गोविन्द देव मंदिर की एक पुरानी तस्वीर  | ब्रिटिश लाइब्रेरी 

आमेर में मानसागर नामक नहर के तट पर एक मंदिर में मूर्ति को स्थापित किया गया। इस मंदिर के परिसर को कनक वृंदावन कहा जाता है और अब यहां एक हराभरा बाग़ भी है। यहां राधा माधव मंदिर भी है और कहा जाता है कि यहीं मूर्ति स्थापित की गई थी। बाद में मदन मोहन और गोविंद की भी प्रतिमाएं आमेर लाईं गईं।

कनक वृंदावन का एक दृश्य 

सन 1727 में सवाई जय सिंह ने जयपुर को राजधानी बनाने का फ़ैसला किया। उनके लिये गोविंद देव बहुत पूज्यनीय थे। एक प्रसिद्ध मान्यता के अनुसार सवाई जय सिंह ने घोषणा कर दी थी कि असली राजा गोविंद देव ही हैं और वह उनके मात्र एक दीवान (मंत्री) हैं। गोविंद देव की प्रतिमा को सूरज महल नामक पेवैलियन में स्थापित किया गया जो सिटी पैलेस के अंदर है। एक कथा के अनुसार, जब जयपुर शहर बनवाया जा रहा था तब सवाई जय सिंह सूरज महल में ही रहते थे। लेकिन एक दिन उनके सपने में देवता प्रकट हुए और उनसे अपना स्थान माँगा। इसके बाद जय सिंह सूरज महल छोड़कर शहर की दक्षिण दिशा में स्थित मुख्य महल में रहने लगे।

गोविंद देव मंदिर की वास्तुकला अनोखी है। जिस शैली से अन्य विशाल मंदिर बनवाए गए थे, इसे उस तरह से नहीं बनवाया गया था। यह मंदिर एक गार्डन-पेवैलियन की तरह बना हुआ है। ये मंदिर अन्य दो पेवैलियन (मंडप) बादल महल और चंद्र महल के बीच जय निवास में स्थित है। जय निवास जयपुर शहर के पहले का है जहां कभी राजा महाराजा शिकार के समय रुका करते थे। एक अन्य कथा के अनुसार, कहा जाता है कि मूर्ति आमेर से जय निवास लगाई गई थी और जो मंदिर आज हम देखते हैं वो इसी जय निवास में है जिसकी दोबारा साज-सज्जा की गयी थी। इससे पता चलता है कि यह मूर्ति, शहर बनने के पहले से ही इस जगह पर थीं।

चंद्र महल  | ब्रिटिश लाइब्रेरी 

माना जाता है कि सिटी पैलेस परिसर के मध्य में स्थित मंदर में शाही परिवार प्रतिदिन सुबह पूजा किया करता था। कहा जाता है कि मंदिर का स्थान शास्त्र सम्मत है जिसके तहत विष्णु का मंदिर महल के मध्य में होना चाहिये। कृष्ण, विष्णु के ही अवतार माने जाते हैं। कहा जाता है कि जयपुर शहर की परिकल्पना वास्तु शास्त्र और शिल्प शास्त्र की परंपराओं पर ही आधारित थी। मंदिर को जयपुर के शासकों का संरक्षण मिलता रहता था। मंदिर के रखरखाव के लिये एक निश्चित धनराशि तय थी।

जयपुर की पुरानी बस्ती इलाक़े में मदन मोहन और गोपीनाथ के मंदिर बनवाए गए थे। सवाई प्रताप सिंह के शासनकाल (1778-1803) के दौरान मदन मोहन की प्रतिमा करौली भेज दी गई जबकि गोपीनाथ की मूर्ति यहां रही। गोपीनाथ के मंदिर में आज भी कई श्रद्धालु आते हैं।

गोविंद देव मंदिर आज भी लोगों के लिए उतना ही महत्त्व रखता है जितना पहले के ज़माने में, शाही परिवार के लिए भी रखता था। मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। मंदिर में सात झांकियां होती हैं और हर एक में गाये जाने वाले भजन भी निर्धारित हैं। पूजा के समय ख़ासकर जनमाष्टमी (अगस्त-सितंबर) और होली (मार्च) त्यौहारों पर तो यहां की रौनक़ देखते ही बनती। इन दोनों त्यौहारों का संबंध कृष्ण से है। गोविंद देव जी का मंदिर आज भी आस्था और परंपराओं का केंद्र है।

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