गुरू तेग़ बहादुर की अमर कहानी 

गुरू तेग़ बहादुर की अमर कहानी 

तमाम दुनिया के सिख 24 नवम्बर को ‘शहीदी दिवस’ के रूप में याद ऱखते हैं। सन 1675 में आज ही के दिन सिखों के नवें गुरू, गुरू तेग़बहादुर को, मुग़ल बादशाह औरंगज़ैब के हुक्म से, दिल्ली के चांदनी चौक इलाक़े में शहीद कर दिया गया था। उन्हीं की याद में बनाये गये दिल्ली के दो गुरूद्वारे, गुरूद्वारा सीसगंज और गुरूद्वारा रकाबगंज सिखों के लिये महत्वपूर्ण तीर्थ-स्थान माने जाते हैं।

गुरु नानक  | विकिमीडिया कॉमन्स 

गुरू नानकदेव (1469-1539) ने सिख पंथ की शुरूआत की थी। जिन्हें सिखों के दस गुरूओं में पहला गुरू माना जाता है। सिख गुरूओं को सदियों तक दिल्ली सल्तनत के ज़ुल्मों का शिकार होना पड़ा था। सन 1606 में, गुरू तेग़बहादुर के दादा और सिखों के पांचवें गुरू, गुरू अर्जनसिंह को मुग़ल बादशाह जहांगीर ने क़त्ल करवा दिया था। उनके बाद, महज़ ग्यरह बरस की उम्र में गुरू हरगोबिंद उनके उत्तराधिकारी बन गये । गुरू हरगोबिंद सैंतीस साल तक यानी सबसे लम्बे समय तक सिखों के गुरू बने रहे। उन्होंने ख़ुद को, हरमिंदर साहिब के सामने अकाल तख़्त पर समर्पित कर दिया था।

गुरु हरगोबिंद  | विकिमीडिया कॉमन्स 

गुरू तेग़बहादुर, सिखों के छठे गुरू, गुरू हरगोबिंद के पुत्र थे। उनका जन्म सन 1621 के आसपास अमृतसर में हुआ |

गुरू तेग़बहादुर का नाम त्याग मल रखा गया था। उन्हें भाषाओं पर पूरा नियंतरण था, वह अच्छे लिखते बहुत अच्छा थे और वह युध्द कला मं भी माहिर थे। वह बेहतरीन गुड़सवार थे। तलवार चलाना भी ख़ूब जानते थे। उन्होंने तेरह साल की उम्र में युध्द में हिस्सा लिया था। सिखों की लोक-कथाओं के अनुसार उन्होंने मैदान-ए-जंग में बड़ी बहादुरी दिखाई थी। उसी के बाद उनके पिता ने उनका नाम तेग़बहादुर (तेग़ यानी तलवार ) रख दिया था।

गुरू तेग़बहादुर का ज़माना, इतिहास का एक बेहद दिलचस्प दौर था। मुग़ल साम्राज्य काफ़ी संगठित और मज़बूत हो चुका था। इसलिये जहांगीर ने अपनी सल्तनत को और बढ़ाने के लिये पश्चिम और दक्षिण की और नज़रें दौड़ाना शुरू कर दी थीं। पश्चिमी देशों से व्यापार के लिये यात्री बड़े जोश के साथ मुग़ल दरबार में आने लगे थे जो क़ीमती तोहफ़ों के साथ दूरदराज़ से नये नये विचार भी ला रहे थे। वह नये नये विचारों का दौर था । जहांगीर के बेटे शाहजहां ने, न सिर्फ़ उन नीतियों का पालन ही नहीं किया बल्कि अपने पिता की विस्तार की नीतियों को धीरे धीरे आगे बढ़ाया। शाहजहां के ज़माने में ही भारत में कला और शिल्पकला को ज़बरदस्त बढ़ावा मिला। बादशाह और दरबारियों के पास रेशम, हीरे-मोती, हाथी दांत और सोना-चांदी ख़ूब दिखाई देता था।

मुग़लों के दौर में पूरी दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी ) का 25 प्रतिशत हिस्सा भारत के पास था। हर जगह सहनशीलता दिखाई पड़ती थी। कई यूरोपिय लेखकों ने तब भारत की तारीफ़ में बहुत कुछ लिखा था। व्यापार तेज़ी पर था और मुनाफ़ा बेहिसाब था। दक्कन के भी सुन्हरे दिन चल रहे थे। पश्चिमी ऐशिया और विदेशी व्यापार की वजह से आदिल शाही और क़ुतुब शाही के ख़ज़ाने लबालब भरे हुये थे । 17वीं शताब्दी के मध्य में छत्रपति शिवाजी के नेतृत्व में प्रथम मराठा राज्य का उदय हुआ। साथ ही असम में लचित बोरफुकन के नेतृत्व में अहोम ने भी अपनी ताक़त दिखाई और मुग़लों के बढ़ते क़दमों को रोक दिया। हालांकि वह मुग़लों के हमलों के लिये कोई बड़ी चनौती नहीं खड़ी कर पाये। औरंगज़ैब के नेतृत्व में मुग़ल सल्तनत के लिये दक्कन एक नया मैदान-ए-जंग बन गया था। औरंगज़ेब ने अहमदनगर पर क़ब्ज़ा कर लिया और अपनी तलवार की चमक मरोठों तक पहुंचा दी। आदिल शाही(1686) और क़ुतुब शाही(1687) का अंत क़रीब था। पूरे दक्कन पर मुग़लों का क़ब्ज़ा हो गया। पश्चिम में सिख मुग़लों के लिये हमेंशा कांटे की तरह रहे, कभी दोस्त कभी दुश्मन ।

गुरु हर राइ  | विकिमीडिया कॉमन्स 

गुरू हरगोबिंद की मौत के बाद उनके पोते (गुरू हरगोबिंद के बड़े बेटे भाई गुरूदित्ता के पुत्र)गुरू हर राय मात्र 14 वर्ष की आयु में उनके उत्तराधाकरी बन गये।गुरू हर राय ने 17 वर्षों तक सिखों को आला दर्जे का नेतृत्व दिया। मात्र 31 साल की उम्र में उनका दाहांत हो गया। गुरू हर राय की अचानक मौत के कारण उनके पांच साल के बेटे गुरू हरकिशन को गुरू बनाया गया। तेग़बहादुर तुरंत अपने भतीजे से मिलने पहुंच गये। दुर्भाग्य से, चेचक की वजह से, मात्र आठ वर्ष की उम्र में गुरू हरकिशन की मौत हो गयी। सिखों के बीच इस दुर्घटना से उथलपुथल फैल गई। गुरू हरकिशन कह गये थे कि अगले गुरू का चयन बकाला में होगा। लेकिन वहां दो झूठे दावेदारों ने पहले ही डेरे डाल दिये थे।

इसी से जुड़ी एक दौलतमंद व्यापारी माखनसिंह की कहानी भी है। माखनसिंह अपने जहाज़ में यात्रा कर रहा था तभी उसका जहाज़ तूफ़ान में फंस गया। माखन सिंह ने गुरूदेव से प्रार्थना की और वादा किया कि अगर वह जीवित बच गया तो सोने की 500 मोहरें ( ग्यारह ग्यारह ग्राम के 500 सिक्के ) गुरूजी की सेवा में पेश करेगा। सुरक्षित यात्रा पूरी करने के बाद, माखन सिंह अपना वादा पूरा करने के लिये जब अमृतसर पहुंचा तो वहां उसे गुरू हरकिशन की मृत्यू की ख़बर मिली। वह बाकाला पहुंचा और वहां गुरूजी के उत्तराधिकारी होने का दावा करनेवाले दोनों लागों से मिला। उसने ने उन दोनों को दो दो मोहरें भेंट कीं। उन दोनों ने वह मुहरें स्वीकार करलीं और माखन सिंह को ख़ूब दुआएं दीं। असंतुष्ट मन से जब वह बाहर जा रहा था तभी एक बच्चे ने उसे बताया कि एक पवित्र सज्ज्न और भी हैं जो निचली मंज़िल में बैठे तपस्या कर रहे हैं। वह तेग़बहादुर सिंह थे। माखन सिंह वहां पहुंचा और गहरी तपस्या में डूबे व्यक्ति को देखकर उसने, उनके सामने भी दो मोहरें रख दीं। जब वह वापस जा रहा था, तभी उसने एक गंभीर एक आवाज़ सुनी जो कह रही थी कि तूफ़ान से सुरक्षित बचने के लिये तूने 500 मोहरें देने का वादा किया था तो अब सिर्फ़ दो मोहरें कयों दे रहा है। माखन सिंह को लग गया था कि यही असली गुरू हैं। उसने तुरंत वादे के मुताबिक़ मोहरें उनके सामने रखीं और उन्हें गुरू का असली उत्तराधिकारी मान लिया । दोनों झूठे दावेदार वहां से खिसक गये और गुरू तेग़बहादुर को , 16 अप्रैल 1664 को सिखों का नवां गुरू मनोनीत कर दिया गया। उनके पहले पांच साल बहुत सुकून से गुज़रे क्योंकि तब औरंगज़ैब मुग़ल साम्राज्य पर अपनी पकड़ मज़बूत करने में व्यस्त था। औरंगज़ैब उत्तर भारत के उन दूरदराज़ इलाक़ों में बार बार गया जहां बड़ी तादाद में सिख आबाद थे।पंजाब से लेकर असम और कश्मीर से लेकर विंध्याचल तक औरंगज़ैब ने सिखों के कई जल्सों में भी शिरकत की ।

शादी के 34 साल बाद, 1666 में, गुरू तेग़बहादुर के घर बेटे का जन्म हुआ ।यह परिवार और पूरे सिख समुदाये के लिये हर्षोउल्लास का मौक़ा था। उन्होंने अपने बेटे का नाम गोबिंद राय रखा। उनका यही मशहूर बेटा गुरू गोबिंद सिंह के नाम से इतिहास में अमर हो गया।

1669 में जैसे ही औरंगज़ैब ने ग़ैर-मुस्लिमों पर जज़िया यानी टैक्स लगाया, सुकून की वह घड़ियां ख़त्म हो गईं । हुकुमत के इस फ़ैसले से पूरी सल्तनत में ग़ुस्सा और नाराज़गी फैल गई थी। तब तक सिख क़ौम काफ़ी ताक़तवर बन चुकी थी। जिसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि गुरू तेग़बहादुर के पास दो हज़ार लोगों की हथियारबंद फ़ौज थी । इसीलिये मुग़ल हुकुमत में बड़ी बेचैनी पैदा हो गई थी।

गुरु तेग़ बहादुर और कश्मीरी पंडित  | विकिमीडिया कॉमन्स 

सिखों की मान्यता के मुताबिक़ 1675 में कश्मीरी पंडितों के गुट ने गुरू तेग़बहादुर से, इस मुद्दे को लेकर सम्पर्क किया था कि उन्हें धर्म परिवर्तन के लिये मजबूर किया जा रहा है । कश्मीरी पंडितों के सिखों से हमेशा अच्छे सम्बंध रहे थे। उनके गुरू पंडित कृपाराम ने सिखों के सातवें गुरू को संस्कृत सिखाई थी । कश्मीरी रहनुमा गुरू तेग़बहादुर से मदद की गुहार लगा रहे थे। गुरू तेग़बहादुर ने भी महसूस किया कि इस मामले को औरंगज़ैब के पास ले जाया जाना चाहिये और उनसे इस मुद्दे पर बात की जानी चाहिये।

गुरू तेग़बहादुरस जानते थे कि उनका काम बहुत मुश्किल है । इसीलिये उन्होंने सबसे पहले अपने नौ वर्ष के पुत्र गोबिंद राय को अपने उत्तराधिकारी के रूप में अगला गुरू मनोनीत किया।फिर अपनी सत्ता त्याग कर कर रोपड़ में प्रवेश किया। वहां पहुंचते ही मुग़ल अफ़सरों ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया और जेल में डाल दिया।गुरू तेग़बहादुर की गिरफ़्तारी और उन्हें सिरहिंद की जेल में डाले जाने की ख़बर जंगल की आग की तरह चारों तरफ़ फैल गई।

दिल्ली का चांदनी चौक  | विकिमीडिया कॉमन्स 

चार महीने बाद गुरू तेग़बहादुर को दिल्ली भिजवा दिया गया।जैसा बताया जाता है कि औरंगज़ैब ने उनसे कहा था कि या तो वह इस्लाम क़ुबूल करलें या कोई करिश्मा करके दिखायें । गुरू तेग़ बहादुर ने दोनों ही बातें मानने से इनकार कर दिया। उसके बाद उन्हें, 11 नवम्बर 1675 को, चांदनी चौक में खुले आम क़त्ल करवा दिया गया। गुरू तेग़बहादुर का कटा हुआ सिर आनंदपुर साहिब ले जाया गया और उनका धड़, उनके शिष्यों ने दिल्ली में दफ़्ना दिया गया। उनके बाद बने गुरू गोबिंद सिंह ने मुग़लों के ख़िलाफ़ जंग जारी रखी।

गुरुद्वारा रकाब गंज  | विकिमीडिया कॉमन्स 

18वीं शताब्दी में मुग़ल सल्तनत कमज़ोर पड़ जाने के बाद 11 मार्च 1883 को फ़ौजी सिख नाता बघेल सिंह( 1730-1802) अपनी सेना के साथ दिल्ली पहुंच गया और उसने लाल क़िले पर क़ब्ज़ा कर लिया। फ़िर उसने शाह आलम-।। के साथ समझौता कर लिया। जिस के तहत उसे दिल्ली में सिखों के इतिहासिक स्थानों पर गुरूद्वारे बनवाने की अनुमति मल गई। बघेलसिंह ने चांदनी चौक में ठीक उस जगह गुरूद्वारा सीसगंज साहिब बनवाया जहां गुरू तेग़बहादुर को क़त्ल किया गया था और जहां उनका धड़ दफ़्न किया गया था वहां गुरूद्वारा रकाबगंज साहिब बनवाया।

आज देश में गुरू तेग़ बहादुर के नाम पर सैंकड़ों स्कूल, कालेज, अस्पताल, सड़कें और रेल्वे स्टेशन मौजूद हैं। जिनमें मुम्बई और दिल्ली के गुरू तेग़बहादुरनगर रेल्वे स्टेशन और मेट्रो स्टेशन काफ़ी अहम हैं। गुरू तेग़बहादुर की बहादुरी और उनकी त्रासद मौत ने उन्हें सिख इतिहास में अमर बना दिया।

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