भारत की तरफ़ से सप्रेम भेंट

भारत की तरफ़ से सप्रेम भेंट

आप भारत के किसी भी नगर या शहर में जाएं, वहां आपको औपनिवेशिक काल के एक-दो फ़व्वारे ज़रुर देखने को मिल जाएंगे। औपनिवेशिक वास्तुकला शैली में बने इन फ़व्वारों पर उन अंग्रेज़ अफ़सरों या फिर भारतीय लोगों के नाम लिखे हुए होंगे, जिन्होंने उनके निर्माण के लिए चंदा दिया होगा। लेकिन कम ही लोगों को ये जानकारी होगी, कि भारतीयों ने भी सार्वजनिक फ़व्वारों के लिए अंग्रेज़ों को दान दिए थे।

भारत में औपनिवेशिक समय में अमीर भारतीय लोग सद्भावना के तहत सार्वजनिक फ़व्वारे बनवाते थे या फिर इसके लिए दान करते थे। सस्ता पानी आसानी से उपलब्ध कराने की आधुनिक व्यवस्था क़ायम होने के पहले इस तरह के फ़व्वारे बनवाना एक महत्वपूर्ण काम होता था। इससे ना सिर्फ़ आम लोगों के पानी की ज़रुरत पूरी हो जाया करती थी बल्कि दानदाता का भी समाज में सम्मान बढ़ जाता था। बम्बई, कलकत्ता और मद्रास जैसे भारत के कई शहरों में इस तरह के फव्वारे देखे जा सकते है।

हैरानी की बात ये है कि सन 1857 के विद्रोह के बाद संभ्रांत और दौलतमंद भारतीयों ने इंग्लैंड में इस तरह के कई फ़व्वारे बनवाए थे। इस तरह के फ़व्वारे बनवाकर, भारतीय संभ्रांत लोग न सिर्फ़ दान देकर जन-सेवा करते थे, बल्कि ये अंग्रेज़ राजशाही के प्रति वफ़ादारी दिखाने का एक तरीक़ा भी रहा होगा। ये फ़व्वारे ब्रिटेन की राजधानी लंदन से लेकर ऑक्सफ़ोर्डशायर जैसे दूर-दराज़ गांवों तक में बनाए गए थे। आइये, इनमें से कुछ फ़व्वारों को देखते हैं और उनके साथ जुड़ी कुछ दिलचस्प कहानियों के बारे में जानते हैं।

1. रेडीमनी ड्रिंकिंग वॉटर फ़ाउंटेन, लंदन

लंदन के रीजेंट पार्क में रेडीमनी ड्रिंकिंग वॉटर फ़ाउंटेन सर कोवासजी जहांगीर रेडीमनी ने बनवाया था, जो बाम्बे के एक प्रमुख भारतीय व्यापारी और परोपकारी व्यक्ति थे। इसे पारसी फ़ाउंटेन भी कहा जाता है, क्योंकि रेडीमनी का सम्बंध पारसी समुदाय से ही था।

इस फ़व्वारे के निर्माण पर उस ज़माने में 1400 पौंड का ख़र्चा आया था। भारत में अंग्रेज़ों के शासनकाल में रेडीमनी और उनके पारसी समुदाय को काफ़ी सुरक्षा प्रदान की गई थी। रेडीमनी ने यह फ़व्वारे अंग्रेज़ों के लिए आभार स्वरुप बनवाए थे। पारसी, साहसी व्यापारी होते थे । अंग्रेज़ों के शासन में उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार करने के बहुत अवसर मिले। उन अवसरों का उन्होंने भरपूर फ़ायदा उठाया और ख़ूब फले-फूले जिससे पारसी समुदाय भारत के सबसे दौलतमंद समुदायों में से एक बन गया। रेडीमनी को लगा, कि शायद फ़व्वारे बनवाना अंग्रेज़ों का आभार व्यक्त करने का एक अच्छा तरीक़ा हो सकता है।

नाना फड़नवीस, सांगली संग्रहालय

इस फ़व्वारे की डिज़ाइन अंग्रेज़ वास्तुकार रॉबर्ट कर्ले ने गोथिक शैली में बनाई थी। चतुर्भुजाकार का ये फ़व्वारा तीन अष्टकोणिय सीढ़ियों पर आधारित है। इसे बनवाने में इटली के सिसली से दस टन संगमरमर और ब्रिटेन के एबरडीन से चार टन भूरे ग्रेनाइट मंगवाए गए थे। रीजेंट पार्क के सुंदर घासवाले मैदान में स्थित ये फ़व्वारा देखने में बहुत ख़ूबसूरत है। दूर-से ये नियो-गोथिक ब्रिटिश वास्तुकला जैसा लगता है। लेकिन पास आने पर इसके सजावट की बारीकियां नज़र आती है, जिससे पता चलता है कि इसका सम्बंध भारत से है। दो पैनलों पर एक शेर, एक चीड़ का पेड़ और एक और चीड़ के पेड़ साथ सींगों वाला भारतीय सांड बना हुआ है। एक अन्य पैनल पर सर कोवासजी जहांगीर का चेहरा, लोकार्पण अभिलेख और राज चिन्ह बने हुए हैं। फ़व्वारे का उद्घाटन टेक की रानी राजकुमारी मेरी ने सन 1869 में किया था। सन 1970 में हिस्टोरिक इंगिलैंड ने इसे ग्रेड-IIवाले स्मारकों की सूची में रखा था। हिस्टोरिक इंग्लैंड, इंग्लैंड के ऐतिहासिक स्मारकों का संरक्षण करता है। सन 1999-2000 में इंग्लैंड के हेरिटेज लॉटरी फ़ंड ने इस फ़व्वारे की मरम्मत करवाई थी और वहां एक नया प्लैक लगवाया था। सन 2016-2017 में इसकी और मरम्मत करवाई गई। ये फ़व्वारा अब उपयोग में नहीं आता है, लेकिन इस का रखरखाव बहुत ही अच्छा है, जो भावी पीढ़ियों के लिए लंदन के एक छोटे हिस्से में एक भारतीय व्यापारी की निशानी की तरह मौजूद है।

महाराजा का कुंआ, स्टोक रोव, आकस्फ़ोर्डशर | विकीमीडिया कामंस

2. महाराजास वेल, स्टोक रोव, ऑक्सफ़ोर्डशायर

स्टोक रोव दक्षिण ऑक्सफ़ोर्डशायर में एक छोटा-सा गांव है। आज जिसकी आबादी एक हज़ार से भी कम है। ये असली इंग्लिश गांव है, जिसके घरों की छतें घासफूंस की हैं, अग्रभाग लाल ईंटों का है और यहां के मयख़ाने 17वीं सदी के हैं। लेकिन इसका भारत के साथ भी गुप्त संबंध है, जो चार्ल्स डिकन्स के उपन्यासों की तरह बहुत रोमांचक है। स्टोक रोवगांव में एक स्थानीय ज़मींदार का पुत्र एडवर्ड एंडरटन रीड सरकारी मुलाज़िम था और भारत में उत्तर-पश्चिमी प्रांतों का लेफ़्टिनेंट गवर्नर था। उसकी बनारस (अब वाराणसी) के महाराजा इश्वरी प्रसाद नारायण सिंह से दोस्ती थी। एक दिन रात्रि-भोज के दौरान रीड ने महाराजा को एक दुखद कहानी सुनाई कि उनके गांव में भयंकर सूखे के समय,एक घर में थोड़ा-सा पानी बचा रह गया था. एक बच्चे ने वह बचा-खुचा पानी पी लिया। इस पर उसकी मां को गुस्सा आ गया और उसने अपने बच्चे की जमकर पिटाई कर दी। ये कहानी सुनकर महाराजा भावुक हो गए और उन्होंने उस गांव में सूखे हुए कुएं के लिए कुछ करने का फ़ैसला किया।

गुंबद | विकीमीडिया कॉमंस

कुएं की खुदाई हाथों से की गई। उसे 368 फुट गहराई तक खोदा गया। इसकी चौड़ाई चार फ़ुट थी। दो लोगों को कुंआ खोदने में एक साल लगा गया था। महाराजा ने, न सिर्फ़ कुंए की खुदाई का ख़र्चा उठाया बल्कि पानी ऊपर ख़ींचने के लिए जिन मशीनों की ज़रुरत थी, उनका भी ख़र्चा दिया । फ़व्वारे के ऊपर एक सुनहरा हाथी बना हुआ था। इसके ऊपर 23 फुट ऊंचा एक मचान भी बना हुआ है जो बुर्ज की तरह दिखती देता हैऔर उसके ऊपर एक चमकता-दमकता गुंबद भी बना हुआ है।

सुनहरा हाथी | विकीमीडिया कॉमंस

इस कुंए का उद्घाटन महारानी विक्टोरिया के जन्मदिन 24 मई सन 1864 को हुआ था। महाराजा ने अपने ख़र्चे से, कुंए का रखरखाव करनेवाले के लिए कुटिया और फलों का बगीचा भी तैयार करवाया था। ठीक वैसे ही जैसे तब भारतीय मंदिरों की देखभाल के लिए खेता-बाड़ी की ज़मीन दी जाती थी।

दिलचस्प बात ये है, कि ईश्वरी प्रसाद न तो कभी इस गांव गये और न ही इस कुंए को देखा जिसके साथ उनका गहरा नाता था। रिटायरमेंट के बाद रीड वापस अपने गांव चला गया और वहां वह कुंए के निर्माण और उसके देखरेख करने लगा। सन 1886 में रीड का निधन हो गया। सन 1927 में गांव के घरों तक पाइप से पानी आने लगा था। उसके बाद कुंआं उपेक्षा का शिकार होकर बर्बाद हो गया।

लेकिन जब सन 1961 में इंग्लैंड की महारानी एलिज़ाबैथ-द्वितीय बनारस आईं, तब उस समय के बनारस के महाराजा विभूति नारायणसिंह ने उनसे एक शताब्दी पहले बने उस कुंए का ज़िक्र किया। उसके बाद से न सिर्फ़ कुंए के रखरखाव में नए सिरे से दिलचस्पी ली गई, बल्कि सन 1964 में कुएं के लिए एक भव्य शताब्दी-समारोह भी आयोजित किया गया। इस समारोह में एडिनबर्ग के राजकुमार फ़िलिप यानी महारानी एलिज़ाबैथ-द्वितीय के पति ने भी हिस्सा लिया।

इस कुंए के साथ ब्रिटिश शाही परिवार की कई महत्वपूर्ण घटनाएं जुड़ी हुई है, जैसे 29 जुलाई सन 1981 में राजकुमार चार्ल्स और राजकुमारी डायना का विवाह हुआ था। इसी दिन कुएं की मरम्मत का काम भी शुरु हुआ था। तो इस तरह ऑक्सफ़ोर्डशायर के एक छोटे-से अंजान गांव में 19वीं सदी के एक महाराजा की विरासत आज भी ज़िंदा है।

एक तरफ़ जहां रेडीमनी फ़व्वारा और महाराजा का कुँआ आज बहुत अच्छी हालत में है, वहीं बाक़ी स्मारकों के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। इनमें से कई वक़्त के साथ खो चुके हैं या फिर ग़ायब हो चुके हैं। इनकी बस पुरानी तस्वीरें, रिकॉर्ड्स या फिर पट्ट या प्लाक बचे रह गए हैं। इनमें से दो हैं “महाराजास फ़ाउंटैन” और “महाराजा कूच बेहारस मेमोरियल ड्रिंकिंग वाटर फ़ाउंटैन”

महाराजास फ़ाउंटैन | www.londonremebers.com

3. महाराजास फ़ाउंटैन, हायड पार्क, लंदन

विजयनगरम जिसे विज़यानगरम के नाम से भी जाना जाता है, मौजूदा समय के आंध्र प्रदेश में एक छोटी-सी रियासत होती थी। इसके महाराजा ने सन 1867 में लंदन के हायड पार्क में पीने के पानी का एक फ़व्वारा बनवाया था। माना जाता है कि ये फ़व्वारा, जिसे किन्हीं अज्ञात कारणों सन 1964 में हटा दिया गया था, गोथिक वास्तुकला शैली में बना था। इस फ़व्वारे के बारे में कोई ख़ास जानकारी उपलब्ध नहीं है और अब बस इसके मूल स्थान में इसका पट्ट या प्लाक ही बचा है।

पट्ट पर लिखा है,“विजयनगरम के सम्मानीय महाराजा मिर्ज़ा विजयराम गजपति राज मान्य सुल्तान बहादुर ने ये फ़व्वारा दिया था। के.सी.एस.आई. इस स्थान पर सन 1867 से लेकर सन 1964 तक मौजूद था।” दिलचस्प बात ये है कि ऐसा माना जाता है इस फ़व्वारे की डिज़ाइन रॉबर्ट कीरले ने तैयार की थी जिन्होंने रीजेंट पार्क में रेडीमनी फ़व्वारा की भी डिज़ाइन बनाई थी।

जितेंद्र नारायण | विकीमीडिया कॉमन्स

4. महाराजा आफ़ कूच बेहारस ड्रिंकिंग वाटर फ़व्वारा, बेक्सहिल, ईस्ट ससेक्स

बंगाल की एक रियासत कूच बेहार के महाराजा नृपेंद्र नारायण, अपनी एक बेटी के असामयिक के निधन के सदमें से उबरने के लिए 21 सितंबर सन 1911 को ईस्ट ससेक्स के तटीय रेज़ॉर्ट आए थे। सन 1913 में बड़े भाई के निधन के बाद उनके दूसरे पुत्र जीतेंद्र नारायण सत्ता में आए। जीतेंद्र नारायण ने नृपेंद्र नारायण की याद में ईस्ट ससेक्स में शहर में एक फ़व्वारा बनाने का फ़ैसला किया था।

ये फ़व्वारा तट के तटरक्षक कुटियाओं के पास स्थित था और जनता के लिए इसका उद्घाटन 18 सितंबर सन 1913 को किया गया था। सन 1934 में यह फ़व्वारा जिस जगह स्थित था, उस जगह के आसपास के इलाक़े को दोबारा बनया जा रहा था, तब फ़व्वारे को इगर्टन पार्क में रखा गया। सन 1934 से लेकर सन 1963 तक ये फ़व्वारा बेक्सहिल संग्रहालय के पास एक पार्क में मौजूद था, तभी इसे मरम्म्त के लिए वहां से हटाया गया था। उसके बाद से अब तक इसका कुछ अता पता नहीं है।

पवित्र शहर बनारस को इंग्लैंड के बीचों-बीच एक छोटे से शहर से जोड़ने या फिर ग्रामीण बंगाल के एक शहर को इंग्लैंड के एक तटीय रिज़ॉरट से जोड़ने का विचार अटपटा लग सकता है, लेकिन ये फ़व्वारे और कुँएं इंग्लैंड और भारत के बीच अद्भुत और आश्चर्यजनक संबंधों के सबूत हैं। अंग्रेज़ इस उप-महाद्वीप में एक मज़बूत मगर विवादास्पद धरोहर छोड़कर गए हैं लेकिन है, भी भारतीयों से अछूता नहीं रहा और ये फ़व्वारे उसका सबूत हैं।

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