महाराजा रणजीत सिंह- शिक्षा के अग्रदूत

महाराजा रणजीत सिंह- शिक्षा के अग्रदूत

महाराजा रणजीत सिंह भारत के सबसे शक्तिशाली राजाओं में से एक थे जिन्होंने पंजाब के परस्पर विरोधी सरदारों को एकजुट किया और एक ताकतवर सिख साम्राज्य की स्थापना की। महाराजा रणजीत सिंह अपने सैन्य और प्रशासनिक कौशल के लिये जाने जाते थे। कोहेनूर हीरा हासिल करने और श्री हरिमंदर साहिब पर सोने के पत्रे चढ़वाने के कारण भी उनकी एक अलग पहचान बनी।

लेकिन महाराजा रणजीत सिंह ने जो सामाजिक सुधार के काम किये थे उन पर लोगों का कम ही ध्यान गया है, ख़ासकर वो काम जो उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में किये थे। महाराजा भले ही बचपन से ही उन पर पड़ी परिवारिक जिम्मेदारियों के चलते खुद ज़्यादा पढ़-लिख नहीं सके, परंतु वे अपनी प्रजा के जीवन स्तर को सुधारने के लिये शिक्षा का साधन अपनाना चाहते थे। महाराजा को इसके लिये ज़मीनी स्तर से शिक्षा व्यवस्था शुरु करनी थी, इसलिए ये कार्य इतना आसान नहीं था।

महाराजा रणजीत सिंह | विकिमीडिया कॉमन्स

जो साम्राज्य महाराजा ने बनाया था उसमें अध्ययन की परंपरा का अभाव था और शिक्षा शाही परिवार तथा धनवान लोगों तक ही सीमित थी। “मियां वड्डे दा मदरसा” जो लाहौर में धार्मिक नेता मियां वड्डे मियां के मकबरा परिसर में मौजूद था, सिख शासन शुरु होने के सदियों पहले खुला था और उसमें शाही और अमीर परिवारों के बच्चे ही पढ़ते थे।

महाराजा के शैक्षिक सुधार के बारे में हमें ज्यादातर जानकारी अंग्रेज़ विद्वान और यात्री गोटलिएब विल्हेम लिटनर से मिलती है जिन्होंने इंडिजेनस एजुकेशन इन पंजाबः सिंस एनेक्सेशन एंड इन् 1882 पुस्तक लिखी थी। इस किताब में लिटनर लिखते हैं, “महाराजा रणजीत सिंह के शासन में पंजाब में स्कूल और शिक्षा के अन्य संस्थान खोलने में पैसों की कोई कमी नहीं दिखाई गई।” लिटनर आगे लिखते हैं कि उस समय पंजाब में अनैतिक चरित्र वाले सरदार, लालची महाजन और यहां तक कि लुटेरे तथा छोटे मोटे ज़मींदार भी पढ़ना लिखना जानते थे। उनके अनुसार उस दौर में ऐसी कोई मस्जिद, मंदिर या फिर धर्मशाला नहीं थी जिसमें स्कूल न हो।”

गोटलिएब विल्हेम लिटनर | विकिमीडिया कॉमन्स

शैक्षिक संस्थानों के लिए अनुदान शाही परिवारों और महाराजा के ख़जाने से आता था। इन पैसों को उन संस्थानों में बांटा जाता था जो साम्राज्य में विभिन्न आस्थाओं से संबंधित थे। सिख शासन से पहले पंजाब में मुगलों का शासन था और तब इस क्षेत्र में प्रसिद्ध मदरसे होते थे जहां सभी आस्थाओं के छात्र पढ़ते थे। सिख होने के बावजूद रणजीत सिंह ने इस लोकप्रिय परंपरा को नहीं तोड़ा और उनके द्वारा शुरु में स्थापित किए गए कई स्कूल दरअसल मदरसे ही थे। रणजीत सिंह ने न सिर्फ इन संस्थानों को दिल खोलकर दान दिया बल्कि लाहौर में भी इसी तरह के मदरसों की शुरूआत की।

सिर्फ महाराजा ने ही नहीं बल्कि उनकी पत्नी मोरां सरकार सहित उनके परिवार ने भी शिक्षा को संरक्षण दिया। रानी मोरां ने लाहौर में दो मदरसे खोले थे। पहला मदरसा उनकी हवेली के पास था जो उस मस्जिद से संबंधित था जो उन्होंने पुराने शहर के पापड़ मंडी क्षेत्र में बनवाई थी। हालांकि उनकी हवेली अब नहीं है लेकिन आज भी मस्जिद के परिसर में लड़कियों का एक छोटा-सा सिखलाई स्कूल सेवाएं दे रहा है। दूसरा मदरसा उन्होंने लाहौर में बागबानपुरा क्षेत्र में खुलवाया था जो 16वीं शताब्दी के सूफी संत माधो लाल हुसैन की दरगाह के परिसर के भीतर स्थित था।

मस्जिद माई मोरन जहां रानी ने एक मदरसे की स्थापना की | विकिमीडिया कॉमन्स

महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल में पारंपरिक गुरुकुल और गुरमुखी स्कूल भी खोले गए जहां संस्कृत और गुरमुखी (पंजाबी) भाषा सिखाई जाती थी। इसके अलावा व्यापारिक समुदाय की जरुरत को देखते हुए महाजनी स्कूल भी खोले गए थे जहां बाजार, व्यापार और अर्थ-विज्ञान के बारे में शिक्षा दी जाती थी। इस तरह के स्कूल व्यापारी वर्ग के लिए बहुत जरूरी थे।

कई गुरमुखी स्कूल श्री हरिमंदर साहिब (स्वर्ण मंदिर) की परिक्रमा में स्थित बुंगों में चलते थे। ये बंुगें श्री हरिमंदर साहिब की सुरक्षा के लिये बनाये गये थे लेकिन जब खतरा समाप्त हो गया तब वहां बदलते समय के साथ शिक्षा पर ध्यान दिया जाने लगा।

हरमंदिर साहिब परिसर में पूर्वस्कूली औपनिवेशिक काल में | विकिमीडिया कॉमन्स

महाराजा रणजीत सिंह ने अपने साम्राज्य में व्यवसायिक शिल्प स्कूल खुलवाए जहां लघु चित्रकला, रेखा चित्र, नक्शा-नवीसी, वास्तुकला और सुलेखन (खत्ताती) की शिक्षा दी जाती थी। 19वीं सदी के मध्य में कई जगहों पर लड़कियों के लिये भी स्कूल खोले गये जो एक बहुत बड़ा प्रगतिशील कदम था।

धर्मनिरपेक्ष शिक्षा का आरंभ

शुरु में शैक्षिक संस्थान अमूमन धार्मिक प्रवृति के होते थे लेकिन महाराजा ने महसूस किया कि पंजाब की जनता को धर्मनिरपेक्ष शिक्षा और शिक्षा के क्षेत्र में समकालीन विचारधारा पढ़ाने की जरुरत है। लिटनर ने अपनी किताब में लिखा है कि भाषाओं और धर्म के अलावा व्याकरण, साहित्य, दर्शन, खगोल शास्त्र (ज्योतिष), विधि, तर्क शास्त्र, गणित, रेखा गणित और वे तमाम विषय पढ़ाये जाने लगे, जो साम्राज्य में मौजूद धार्मिक स्कूलों में धर्मनिरपेक्ष विषय माने जाते थे। हालांकि उक्त किताब के लेखक ने यह नहीं लिखा है कि ये सब चीजें कब लागू की गईं।

पंजाब में स्वदेशी शिक्षा का इतिहास - 1882 | विकिमीडिया कॉमन्स

सन् 1830 के दशक में अपने शासन की समाप्ति से पहले रणजीत सिंह ने शाही मियां वड्डे दा मदरसा सहित लाहौर के अन्य स्कूलों में अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा देना शुरु किया और इसके लिए उन्होंने एक ईसाई शिक्षक भी नियुक्त किया। हिंदूओं और मुससमानों के स्कूलों में धार्मिक शिक्षा देने की स्वतंत्रता थी लेकिन ईसाई शिक्षक को किसी हाल में ईसाई धर्म के प्रचार की आज़ादी नहीं थी।

सिख साम्राज्य में शिक्षा को बढ़ावा दिये जाने के कारण लोगों में भी शिक्षा के लिए रुचि पैदा हो गई थी। ‘द लाहौर डिस्ट्रिक्ट रिपोर्ट (1860)’ के अनुसार पंजाब पर औपनिवेशिक नियंत्रण (1849-50) के मौके पर सिर्फ राजधानी लाहौर में 576 स्कूल थे जिनमें 4,225 छात्र पढ़ते थे। रिपोर्ट में आगे लिखा गया है कि पूरे पंजाब में कम से कम 3,03000 छात्र थे जो विभिन्न संस्थानों में फारसी, अरबी और संस्कृत में उच्च स्तरीय पूर्वी साहित्य, पूर्वी कानून, तर्क शास्त्र, दर्शन और आयुर्विज्ञान पढ़ते थे। लाहौर में हिंदू, मुस्लिम और सिख संस्थानों से संबंधित तकनीकी प्रशिक्षण, भाषा, गणित और तर्क शास्त्र के विशेष स्कूल थे। इसके अलावा लड़कियों के लिये भी 18 स्कूल स्थापित किए गए थे।

क़ायदा नूर- एक अनूठी प्रणाली

सिख साम्राज्य में हालंकि शिक्षा ने ज़ोर पकड़ लिया लेकिन रणजीत सिंह चाहते थे कि पंजाब के ग्रामीण इलाक़ों में भी शिक्षा का प्रसार हो। वह चाहते थे कि भले ही यहां के बच्चों को स्कूल जाने में दिलचस्पी उतनी न हो जितनी कि शहरी बच्चों में होती है, लेकिन कम से कम उन्हें पढ़ना-लिखना तो आना चाहिये। इस उद्देश्य को हासिल करने के लिये उन्होंने “क़ायदा” प्रणाली बनाई।

लिटनर के अनुसार रणजीत सिंह ने अपने विदेश मंत्री फ़कीर अज़ीज़उद्दीन के छोटे भाई पढ़े-लिखे जनरल फ़कीर सय्यद नूरउद्दीन को इस बाबत एक पाठ्यक्रम तैयार करने को कहा। फ़कीर सय्यद नूरउद्दीन ने नूर (रौशनी) नामक क़ायदा तैयार किया जिसे पढ़कर गुरमुखी, शाहमुखी, ऊर्दू और फ़ारसी जैसी प्रमुख भाषाओं में लोगों को बुनियादी शब्द समझने और थोड़ा बहुत लिखने में मदद मिली। इस क़ायदे में रोज़मर्रा ज़िंदगी के लिये ज़रुरी गणित संबंधी एक कोर्स भी था।

क़ायदे की क़रीब पांच हज़ार प्रतियां तैयार की गईं जिन्हें पंजाब में नंबरदारों (गांव के मुखिया) में बांटी गईं। प्रत्येक नंबरदार से कहा गया कि वह तीन महीने में क़ायदा नूर पढ़कर उसकी पांच प्रतियां गांव में पांच लोगों को बांटे। इसके अलावा नंबरदार को ये भी निर्देश दिया गया था कि वह महाराजा रणजीत सिंह को पत्र लिखकर बताए कि उसने पढ़ना-लिखना सीख लिया है और ये कि उसने क़ायदे की पांच प्रतियां पांच लोगों में बांट दी हैं।

नंबरदार द्वारा जिन पांच लोगों को प्रतियां बांटी जाती थीं वे भी आगे पांच लोगों को इसे बांटते थे और इस तरह से पंजाब के गांवों में लोगों के शिक्षित करने का क्रमबद्ध सिलसिला शुरु हो गया। शुरु में कई नंबरदारों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया और महाराजा को पत्र भी नहीं लिखा। नतीजतन महाराजा ने उन लोगों को गांव प्रमुख के पद से हटाकर बाक़ी नंबरदारों के सामने उदाहरण रख दिया।

पंजाब की शिक्षा व्यवस्था का पतन

अपने शासनकाल में महाराजा रणजीत सिंह ने पंजाब में शिक्षा की एक जबरदस्त व्यवस्था स्थापित कर दी थी; लेकिन सन् 1839 में उनके निधन के बाद पंजाब का भाग्य हमेशा के लिये बदल गया। महत्वाकांक्षी मंत्रियों की साजिशों और शाही परिवार के सदस्यों के बीच आंतरिक कलह की वजह से रणजीत सिंह के उत्तराधिकारियों को अपदस्थ कर दिया गया और उनकी हत्या कर दी गई। इसकी वजह से लंबे समय तक अस्थिरता का माहौल बन गया। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी इसी ताक में थी और उस ने मौके का फायदा उठाकर साम्राज्य के क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण कर लिया और सन् 1849 में दो निर्णायक एंग्लो-सिख युद्ध जीतने के बाद उन्हें औपनिवेशिक क्षेत्रों में शामिल कर लिया।

अंग्रेज़ो का ये कदम रणजीत सिंह द्वारा स्थापित शिक्षा प्रणाली पर कुठाराघात साबित हुआ। नई अंग्रेज़ सरकार धर्मनिरपेक्ष और आधुनिक शिक्षा प्रणाली पर ध्यान देना चाहती थी। उसने पंजाब के स्कूलों में फारसी और संस्कृत भाषा सीखने की व्यवस्था बंद कर दी। इनकी जगह शिक्षा के लिये उर्दू और अंग्रेजी भाषा को चुना गया। नए राजनीतिक विधान में पारंपरिक धार्मिक स्कूलों को अनुदान मिलना भी बंद हो गया। अंग्रेज़ इन स्कूलों की शिक्षा को अवैज्ञानिक मानते थे और उनका कहना था कि ये शिक्षा संस्थान पुरानी और पुरानी सोच को बढ़ावा देते हैं। इस तरह सिर्फ उन स्कूलों और कॉलेजों को ही अनुदान मिलने लगा जो यूरोपीय संस्थान चलाते थे।

अनूठी मगर कारगर कायदा शिक्षा प्रणाली भी खत्म कर दी गई। सरकारी अधिकारियों ने कायदा की कुछ प्रतियां जब्त कर लीं। ज्यादातर प्रतियां पंजाब के लोगों ने अपने महाराजा और उनके साम्राज्य की याद में अपने घरों में छुपाकर रखी हुईं थीं। सन् 1857 की बगावत के दौरान बाकी प्रतियां भी छीनकर जला दी गईं और इस तरह से पंजाब में शैक्षिक विकास के एक युग का अंत हो गया।

गवर्मेंट कॉलेज लाहौर | विकिमीडिया कॉमन्स

19वीं सदी के बाद के दशकों में पंजाब में अंग्रेज़ों ने शिक्षा की एक नयी प्रणाली लागू की। आलोचकों का कहना है कि इस प्रणाली की वजह से कई शिक्षित प्रतिभाशाली लोग पैदा हए लेकिन आम लोगों के बीच शिक्षा-प्रसार कम हो गया क्योंकि ये प्रणाली आम लोगों की पहुंच के बाहर थी। एक तरफ जहां बंगाल प्रैज़ीडेंसी जैसे राज्यों में शिक्षा बुलंदिया छू रही थी, वहीं पंजाब अपनी समृद्ध और भूला दी गई धरोहर पर आंसू बहा रहा था।

मार्च 1849 में सिख साम्राज्य पर अंग्रेज़ों के नियंत्रण के कुछ महीने बाद ही पंजाब में अंग्रेज़ी माध्यम का पहला स्कूल लाहौर में खुला। इसी साल दिसंबर में अंग्रेज़ों ने पादरी संघ शासित गिरजे के दो अमेरिकी मिशनरी जॉन न्यूटन और चार्ल्स फोरमैन को लाहौर में स्कूल खोलने की इजाज़त दी। सन् 1860 के शुरुआती वर्षों में अंग्रेज़ों ने गवर्मेंट कॉलेज लाहौर, ग्लैंसी मेडिकल कॉलेज अमृतसर और फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज, लॉरेंस कॉलेज, मरी और किंग एडवर्ड मेडिकल यूनिवर्सिटी सहित कई कॉलेज स्थापित किए। गवर्मेंट कॉलेज (अब यूनिवर्सिटी) की स्थापना के पीछे प्रेरणा स्रोत गोटलिएब विल्हेल लिटनर थे जो लंदन में किंग्स कॉलेज में अरबी और इस्लामिक लॉ पढ़ाते थे। इसके अलावा लाहौर में एक अन्य संस्थान पंजाब यूनिवर्सिटी खोलने में भी उनकी प्रमुख भूमिका रही।

लिटनर ने “इन्डिजेनस एजुकेशन इन पंजाब, सिंस एनेक्सेशन एंड इन 1882” नाम से एक विस्तृत रिपोर्ट लिखी जिसमें उन्होंने पंजाब में पारंपरिक और स्वदेशी शिक्षा के पतन पर खेद व्यक्त किया। लिटनर पारंपरिक, आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा के हिमायती थे। उन्होंने दावा किया कि महाराजा रणजीत सिंह के समय जितने छात्र स्कूल, कॉलेजों में दाखिला लेते थे, उनकी संख्या अंग्रेज हुकूमत में आधी हो गई थी। उन्होंने ये भी दावा किया कि अंग्रेजों द्वारा सत्ता हथियाने के पहले सिख साम्राज्य में कहीं ज्यादा विद्वान और बुद्धिजीवी हुआ करते थे।

हो सकता है कि लिटनर पूर्वाग्रह से ग्रस्त रहे हों; ये एक अलग बात है, लेकिन एक बात तो सच है कि शेर-ए-पंजाब नाम से मशहूर महाराजा रणजीत सिंह ने बहुत दूर दृष्टि के साथ अपनी प्रजा का नेतृत्व किया। उन्होंने अपनी प्रजा को तोहफों में सबसे बड़ा तोहफा दिया……शिक्षा। शिक्षा यानी एक अच्छी ज़िंदगी गुज़ारने का सबसे बढ़िया ज़रिया।

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