मलिका-ए-हिन्दुस्तान नूरजहां- जो अपने ज़माने की  फ़ैशन क्वीन थी

मलिका-ए-हिन्दुस्तान नूरजहां- जो अपने ज़माने की फ़ैशन क्वीन थी

बादशाह जहांगीर की बेगम नूरज़हां एक शिक्षित, संभ्रांत और पक्के इरादों वाली महिला थी जिसे अपने पति का पूरा विश्वास प्राप्त था। जब मुग़लिया सल्तनत अपनी शक्ति और शोहरत की बुंलदियों पर थी, उस दौर में उसका नाम दरबार की सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली महिला के रुप में जाना जाता था जिसने अपने दबदबे से कई महत्त्वपूर्ण सियासी घटनाओं को अंजाम दिया। दूसरी ओर प्रगतिशील विचारों व गहरे सौंदर्यबोध के कारण उसने न सिर्फ़ अपने नाम के अनुरूप अपनी ख़ूबसूरती के नूर से दुनिया को रौशन किया, बल्कि सुंदरता का एक ऐसा संसार भी रच डाला कि इसके दूरगामी सामाजिक-सांस्कृतिक‌ प्रभाव पड़े।

इस कारण कई इतिहासकारों ने उसे अपने दौर की ‘फ़ैशन क्वीन’ तक कह डाला जिसकी चर्चा तुज़ुक-ए-जहांगीरी से लेकर विलियम हेरी के ‘अर्ली ट्रेवल्स आफ़ इंडिया’ तक में की गई है। नूरजहां के ईजाद किये गये डिज़ाइनों के अक्स आज के दौर में भी देखे जा सकते हैं। आज कई नामचीन गारमेंट्स कंपनियां ‘नूरजहां क्लैक्शन’ के नाम से अपने प्रोडक्ट्स लांच करती रहती हैं जिनकी महिलाओं, ख़ास तौर पर युवतियों के बीच, ख़ास मांग रहती है।

नूरजहां ने अपनी कल्पनाशीलता से मुग़लिया पहनावे और परिधानों में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिये। ‘द हरम ऑफ़ द ग्रेट मुग़ल्स’ में मोहम्मद अज़र अंसारी बताते हैं कि मुग़ल सल्तनत के प्रारंभिक दिनों में पर्दा-प्रथा के कारण हरम की महिलाएं ख़ुरासान और फ़ारस(ईरान) के पारम्परिक परिधानों का अनुसरण करती थीं। अकबर और हुमायूं के दौर में भी वे ढ़ीले-ढ़ाले रंगीन या धारीदार पायजामा और गले तक ढ़ंकी अंगिया पहनती थीं। किंतु मुग़ल साम्राज्य के विस्तार के साथ बढ़ते सामाजिक-सांस्कृतिक दायरे, विशेष रूप से राजपुताना के साथ बढ़ते अंतर्संबंधों के कारण नूरजहां का समय आते-आते मुग़ल महिलाओं के परिधान में घाघरा, चुनरी, अंगिया, लहंगे से लेकर दुदानी, पंचतोलिया, बदला सरीखे रंग-बिऱगे वस्त्र शामिल हो गये।

नूरज़हां और जहांगीर

नूरजहां की फ़ैशनपरस्ती के कारण मानों मुग़लिया रहन-सहन के अंदाज़ ही बदल गये। ख़फ़ी खान लिखते हैं कि नूरजहां के शुरू किए गए फ़ैशनों का उस समय के समाज में बोलबाला हो गया था और पुराने क़िस्म के फ़ैशन पिछड़े हुए नगरों में केवल अफ़ग़ानों के बीच बीच ही प्रचलित रह गये थे। नूरजहां ने ब्रोकेड, लेस तथा गाउन की अनेक प्रकार की नई-नई डिज़ाइनें तैयार कीं जिसे ‘नूरमहल’ कहा जाता था। उसके तैयार किए गए डिज़ाइनों में दुदानी, पंचतोलिया, बदला किनारी तथा फ़र्श- चांदनी आदि भी शामिल थे।

इतिहासकार बेनी प्रसाद का भी मानना है कि एक विशेष प्रकार का परिधान जिसका आविष्कार नूरजहां ने किया था, उसको उसके नाम पर ‘नूरमहल’ ही कहा जाता था ।उसका पूरा सेट उस समय ₹25 में तैयार हो जाता था और यह दूल्हा-दुल्हन का एक प्रिय परिधान था। ‘तुज़ुक-ए-ज़हांगीरी’ में बताया गया है कि मुग़ल काल में 78 प्रकार के शाही कारख़ाने थे जिसमें वस्त्र उद्योग की प्रमुखता थी। नूरजहां ने वस्त्रों में ज़री क़लम का उद्योग शुरू करवाया गया। क़ालीन उद्योग के लिए भी नूरजहां ने प्रसिद्धि पाई। उसके व्यापारिक कारवां और व जहाज़ चलते थे जिनके संबंध सेंट्रल एशिया के देशों के साथ थे।नूरजहां की रुचि वस्त्रों के साथ क़ालीन के व्यापार में भी थी ।उसके बनाए गए परदों को सोने और चांदी के तारों से सजाया जाता था। मुग़ल कालीन भारत में नूरजहां की जीवन-शैली ने सांस्कृतिक एवं सामाजिक जीवन को इस तरह से प्रभावित किया कि तत्कालीन समय में वस्त्र, आभूषण तथा सौंदर्य प्रसाधन आधुनिकता या फ़ैशन के दौर में शामिल हो गये जिसके कारण मुग़ल कालीन भारत में नूरजहां का नाम फ़ैशन क्रांति की जनक के तौर पर उभर कर सामने आया और उसे ‘फ़ैशन की रानी’ की संज्ञा से संबोधित किया जाने लगा।

इतना ही नहीं फ़ैशन क्रांति की अग्रदूत बनकर नूरजहां ने महिलाओं के व्यक्तिगत-पारिवारिक जीवन में ऐसा परिवर्तन लाया जिसका गहरा सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव आम जनजीवन पर पड़ा।

इसके अलावे नूरजहांकालीन वस्त्रों का अवलोकन करने पर ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान समय में भी जो प्रचलित वस्त्र एवं पहनावे हैं वे निश्चित रूप से नूरजहां से प्रभावित हैं। जैसे आज की युवतियों और महिलाओं की पसंदीदा घाघरा, चुनरी,लहंगा, अंगिया, चोली, दुपट्टा, अंतःवस्त्र आदि पर पर नूरजहां कालीन फ़ैशन की स्पष्ट झलक देखी जा सकती है।

आज के दौर में भी प्रचलित है नूरज़हां के फैशनेबल क्रिएशंस

नूरजहां के समय में हरम के पहनावे के प्रचलन से तत्कालीन फ़ैशन में कुछ ऐसी तब्दिली हुई कि लोगों के कपड़ों के पहनावे के ढ़ंग ही बदल गये। इसके मद्देनज़र नूरजहां ने कई तरह के सुनहले कपड़ों की डिज़ाइन निकाले।

ज़मीदार बुरक़े का प्रचलन भी इसी दौर में प्रारंभ हुआ। उन दिनों के सबसे मशहूर पोशाकों में ‘नूर मछली’ का नाम आता है जो दुल्हन और दूल्हे को पहनाये जाते थे। इसे बनाने के लिये ख़ास सामग्रियां प्रयोग में लाई जाती थीं, जिनमें दो दमी पेशवाज़ (गाउन के लिए), पंच तोलिया (औढ़नी के लिए), बंदलह (सुनहरे तारों से रेशमी कपड़ों पर बुना गया कपड़ा), किनारी लेस लगा हुआ और फ़ारसी चांदनी चंदन रंग के गलीचे के नाम शामिल हैं।

फैशन की मल्लिका नूरजहां के समय में महिलाओं की पोशाक के तौर पर ‘जम्मू ज़नानी’ खास रूप से विख्यात हुई। इस पहनावे में ऐसी कुर्ती होती थी जो घुटनों से लेकर छाती तक शरीर से चिपकी रहती थी और छाती के पास से वह खुलती एवं बंद होती थी । उसके सामने वाले हिस्सों को झालरों से सजाया जाता था और इसके नीचे अंगिया पहनी जाती थी। निचले भाग में पायजामा पहना जाता था जो रेशमी कपड़ों के बने होते थे और उनपर फूल- पत्तियां बनी होती थीं। हल्के रंग और पतले कपड़ों को घुंघट अथवा ओढ़नी के काम में लाया जाता था। नाचने वाली लड़कियों की कुर्तियां लंबी और बढ़िया सिराजी मलमल की बनी होती थीं।

अपने ज़माने की फ़ैशन क्वीन नूरज़हां

नूरजहां को फूल-पत्तियों वाले कढ़ाई किए गये कपड़े पहनना बहुत पसंद था। वह न केवल नये- नये फ़ैशन के कपड़े काट-छांट कर स्वयं तैयार करती थी, बल्कि उन कपड़ों पर धागों से फूल- पत्तियां की कढ़ाई भी करती थी। इन नये नये प्रकार की कढ़ाईयों को बेल-बूटे तथा सोने-चांदी के तारों से ज़रदोंजी और कारचोबी के कामों से सुंदर बनाया जाता था। इन कपड़ों में मोटे पट्टे, किनारी, संजाफ़, पाइपिंग लगाकर आकर्षक बनाया जाता था। नूरजहां के समय प्रचलित वस्त्रों पर तैमूरी, ईरानी तथा कहीं-कहीं भारतीय प्रभाव झलकते थे।

नूरजहां के समय में प्रचलित ज़ब्बा, एक लंबा-सा सुसज्जित वस्त्र होता था, जिसमें आस्तीन नहीं होती थी तथा जिसके गले तंग बनाये जाते थे। इसे आधुनिक काल की अंगिया कहा जा सकता है। इसका दामन इतना लंबा होता था कि चलने पर पैर फंसने की संभावना होती थी।अतः कनीज़ें पीछे से लटकते हुए भाग को उठाए रहती थीं ।

पुरुषों में प्रचलित  ‘चारकब’ का उल्लेख जहांगीर ने ‘तुज़ुक-ए-जहांगिरी’ में किया है। ‘चारकब’ क़बा के समान लंबे कुर्ते की तरह होता था, जैसे कि ओवरकोट होते हैं। यह वस्त्र पुरुषों और महिला, दोनों में प्रचलित था।

बादशाह जहांगीर

पर महिलाओं के चारकब पुरुषों से भिन्न न बनाये जाते थे। महिलाओं के चारकब के गले और दामन पर जरी के सुनहरे काम होते थे जिससे ये बहुत भड़कीले दीखते थे। अब्दुल हमीद लाहौरी ने भी ‘बादशाहनामा’ में इस वस्त्र का ज़िक्र किया है।

इसी तरह नूरजहां के दौर का ‘पालक’ एक ऐसा परिधान है जो आज के जंपर के समान घुटने से नीचे तक लंबा होता था। इसकी सुंदरता को बढ़ाने के लिये इसमें तुकमा अर्थात एक प्रकार का बटन लगाया जाता था, जो कपड़ों से ही बनाया जाता था और उसपर हीरे-जवाहरात टांके जाते थे।

विलियम टेरी ने ‘अर्ली ट्रैवल्स इन इंडिया’ में लिखा है कि नूरजहां ने क़बा के समान ही एक नई डिज़ाइन का परिधान तैयार किया था, जिसमें दो दामन होते थे।दूसरा दामन पहले के थोड़ा नीचे रहता था। यह वस्त्र ‘दुदामनी’ के नाम से फ़ैशन में आया।

अकबर के समय से ही हिंदू महीलाओं में अंगिया का प्रचलन हो गया था। नूरजहां के समय के ‘महरम’ और ‘चोली’ भी अंगिया के ही प्रकार थे। इस संबंध में यह बताना प्रासांगिक होगा कि भीतर पहने जानेवाले सभी अंत:वस्त्र (ब्रा) ढ़ीले-ढाले ना बनाकर तंग और चुस्त बनाए जाते थे।समृद्ध वर्ग की महिलाओं में महीन और बढ़िया सूती सिल्की चोली पहनने का फ़ैशन था जो काफ़ी बारीक और पारदर्शी होते थे । तुर्की महिलाओं में भी ब्रा का प्रचलन था।

बादशाह अकबर 

इतिहासकार बेनी प्रसाद ‘ जहांगीर्स इंडिया’ में बताते हैं कि मल्लिका नूरजहां ने ओढ़नी के स्थान पर एक नये प्रकार के दुपट्टे का आविष्कार किया था, जो ‘पंचतौलिया’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ और मुग़ल शहज़ादी और बेगमातों के बीच ख़ूब फ़ैशन में आया। बादशाह जहांगीर की मल्लिका नूरजहां अपने सिर पर ताजनुमा

‘कुलाह’ रखती थी जो तैमूर ख़ानदान में ‘शोकली’ के नाम से जाना जाता था। नूरजहां के जो भी चित्र प्राप्त हुए हैं, उनमें ताज के समान उनकी टोपी उनकी शान में वृद्धि करती है। नूरजहां की तस्वीरें आज भी ब्रिटिश म्यूज़ियम, लंदन की शोभा बढ़ा रही है। नूरजहां के समय में औरतों के वस्त्र बहुमूल्य कपड़ों की थानों से तैयार किए जाते थे जो नरम और चटकीले रंगों के होते थे। इन कपड़ों में ताश,कमख़्वाब, दीवा, अतलश, गज़, तफ़शील बा, नीम जरी, मौजे-दरिया, जामवार ख़ारा, कतान, ताता, अंबरी साज़ ,कपूर, नूर ,मसरु, गुलबदन, गुलशन, आईपा, दराई, टाट बंद, कबा बंद, कतनी तथा संगी साटन आदि बहुत पसंद किए जाते थे।

जहांगीर के काल में वस्त्र-उत्पादन का काम अत्यंत उन्नत अवस्था में था जिसके कारण उनकी बेगम नूरजहां को अपने पसंद के इतने विविधतापूर्ण और आकर्षक डिज़ाइन बनाने में सहूलियत मिली। उन दिनों इतने बारीक मलमल के कपड़े तैयार किए जाते थे कि माचिस की एक डिब्बी में एक थान मलमल आ जाता था, जिसके कारण मुग़ल काल में ढ़ाका की प्रसिद्धि पूरी दुनिया में हो गई थी।

नाना फड़नवीस, सांगली संग्रहालय

मलमल के अतिरिक्त नयनसुख, श्रीसाफ, गंगाजल, ताता, पंचोलिया, डोरिया गरबा, सूती खासा, चौताल महमूदी, बहादुरशाही, शहर गुल, आंखें ख़ान, तंज़ीब, जामदानी, समूम, झुका, दो ज़ार, नमूने, किंमतार, सीनाबाफ़, दोदमी, शीरीन बाफ़ इत्यादि सूती कपड़े के लिए बंगाल के साथ-साथ लाहौर, अवध, गोलकुंडा, बुरहानपुर, मालवा, गुजरात, अहमदाबाद, खंभात आदि नगर भी बहुत प्रसिद्ध थे ।

जहांगीर जाड़े के मौसम में वस्त्रों के रूप में कश्मीर के ‘परम नरम’ और ‘नहरमा’ शॉलों के विशेष रूप से उल्लेख करता है। ‘तुज़ुक-ए-जहांगिरी’ में इन सारे वस्त्रों के बारे में बख़ूबी वर्णन किये गये हैं।

ज़ाहिर है कि जहांगीर के काल में, जब वस्त्र-उत्पादन का उद्योग परवान पर था,  उनके दिल पर राज करने वाली बेगम नूरजहां ने अपनी कल्पनाशीलता व सुरूचि से इस प्रकार से तरह-तरह की पोशाकों के आविष्कार किये कि उसने तत्कालीन समाज के लोगों, ख़ासकर महिलाओं के परिधानों में ऐसी क्रांति लाई कि उसके अक्स आज भी दिखाई पड़ते हैं। यही कारण है कि इतिहासकारों ने मल्लिका-ए-हिंदुस्तान नूरजहां बेगम को ‘फ़ैशन क्वीन’ की पदवी से भी नवाज़ा है।

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