जलेबी की टेढ़ी-मेढ़ी कहानी

जलेबी की टेढ़ी-मेढ़ी कहानी

जलेबी भारत के हर कोने में खाई जाती है। नारंगी, लाल रंग की चाशनी में डूबी जलेबी देख कर हर किसी का मन ललचा जाता है। यह मीठा व्यंजन खाने में जितना स्वादिष्ट है उतना ही दिलचस्प है इससे जुड़ा इतिहास। माना जाता है कि जलेबी या ‘जौलबिया’ की उत्त्पति पश्चिम एशिया में हुई जहाँ छोटी इलायची और सूखी चीनी के साथ इसे बनाया जाता था। बताया ये भी जाता है कि ईरान में रमजान के दिन गरीबों या जरूरतमंदों को यही जलेबियां बांटी जाती थी।

इरान में रमज़ान के दौरान जलेबी और भी ख़ास हो जाती हैं

पारसी शब्द में ये जौलबिया जब हिंदुस्तान आई तो जलेबी बन गई। 13 वीं शताब्दी के तुर्की मोहम्मद बिन हसन की किताब में जलाबियां और उसे बनाने की कई विधियों का उल्लेख मिलता है। नादिर शाह को जुलाबिया बहुत पसंद थी, वह इस पकवान को ईरान से भारत लेकर आया और फिर इसे यहां का लोकप्रिय मिष्ठान्न बनने में अधिक समय नहीं लगा।

1450 में जैन धर्म पर संबंधित पुस्तक ‘कर्णप कथा’ में जलेबी का ज़िक्र है। सन 1600 में लिखी गयी संस्कृत भाषा की कृति ‘गुण्यगुणाबोधिनी’ में भी जलेबी के बारे में लिखा गया है। सत्रहवीं शताब्दी में रघुनाथ ने ‘भोजन कौतुहल’ नामक पाक कला से संबंधित पुस्तक लिखी थी जिसमें जलेबी का ज़िक्र मिलता है। इस प्रकार से देखा जाए तो हम सब की प्यारी जलेबी भारत में करीब 500 वर्ष पुरानी है।

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