मिर्च बिना सूना है जीवन

मिर्च बिना सूना है जीवन

भारत में विभिन्न धर्मों और जातियों का अपना ज़ायक़ा है यानी इन सबका खाना अलग अलग तरह का होता है लेकिन मिर्च एक चीज़ है जो सबको एक धागे से बांध देती है। सुबह का नाश्ता हो, दोपहर या रात का खाना हो, मिर्च इसमें बहुत बेतकल्लुफ़ी से शामिल हो जाती है।

इसके कई रुप होते हैं जैसे बारीक कटी हुई, सूखी या फिर पिसी हुई मिर्च। आंध्र प्रदेश का कोडीकुडा, राजस्थान का लाल मांस, कश्मीर का वाज़वान, बंगाल का काछा लौंका मांगशो, हैदराबाद का मिर्च का सालन या फिर महाराष्ट्र का मालवानी और आग्रि करी हो, मिर्च के बिना इनकी कल्पना असंभव है

तो मिर्च आई कहां से…?

 

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जी हां…भारत से इसका कोई संबंध नहीं है….हो गए न हैरान…? दरअसल मिर्च एक फल है जिसे आप बेर भी कह सकते हैं। ये मूलत: कैप्सिकम एनम और चार अन्य नस्ल कैप्सिकम चिनेन्ज़, कैप्सिकम फ़्रुटसेंस, कैप्सिकम प्यूबसेंस और कैप्सिकम बैकाटम की होती है। ये चारों नस्लें सोलानेसी फैमिली की हैं।

मिर्च का सीधा संबंध दक्षिण और मध्य अमेरिका से है।

पुरातत्वविदों के अनुसार मैक्सिको में मिली गुफाओं से पता चलता है कि साढ़े सात हज़ार साल पहले भी लोग मिर्च खाते थे। इस बात के भी सबूत मिले हैं कि ओल्मेक, टॉलटेक, माया और एज़्टेक सहित दक्षिण अमेरिका की सभी सभ्याताओं के दौरान मिर्च खाई जाती थी।

क्रिस्टोफ़र कोलम्बस | विकिमीडिया कॉमन्स 

प्रसिद्ध यायावर क्रिस्टोफ़र कोलम्बस यूरोप के उन पहले व्यक्तियों में से था जिसने सन 1492 में कैरिबियन यात्रा के दौरान मिर्च चखी थी। इसके पहले वह काली मिर्च ही जानते थे। काली मिर्च को अंग्रेजी में ‘पेप्पर्स’ कहा जाता है। कोलम्बस ने मिर्च को ‘पेप्पर्स’ नाम दिया जो आज पश्चिमी देशों में ‘चिली पेप्पर्स’ के नाम से जाना जाता है।

सन 1493 में कोलम्बस जब दूसरी बार वेस्ट इंडीज़ गया तब उसके साथ डॉ दिएगो अल्वारेज़ चांसा भी था। कहा जाता है कि वापसी में चांसा मिर्च लेकर स्पेन गया था। अब ये पता करना मुश्किल है कि यूरोप को मिर्च किसने खिलाई कोलम्बस ने या फिर चांसा ने। यूरोप को मिर्च का चस्का जल्दी नहीं लग पाया था लेकिन सारे विश्व में स्पेनिश और पुर्तगाली औपनिवेशिक देशों में मिर्च ने आग लगा दी।

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भारत में मिर्च सन 1498 में आई जिसे पुर्तगाली सबसे पहले गोवा लेकर आए थे। जल्द ही भारत के लोगों को ये तीखी फली भा गई और वे इसकी खेती करने लगे। मिर्च उगाना आसान था क्योंकि ये हर मौसम में पैदा हो सकती थी और इसकी पैदावार में कोई ख़ास ख़र्च भी नहीं होता था। मिर्च में कैप्सैसिन होता है जो इसे तीखा बनाता है। इसके अलावा ये अंश मिर्च के पौधे को कीड़ों से भी बचाता है।

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मिर्च की लोकप्रियता ने काली मिर्च का एकाधिकार ख़त्म कर दिया। काली मिर्च को काला सोना कहा जाता था और यूरोप की अर्थव्यवस्था में इसका बड़ा योगदान होता था। मिर्च ने जल्द ही पाइपर लोंगम यानी पीपली और गोल काली मिर्च का बाज़ार ठंडा कर दिया। पीपली को स्थानीय भाषा में पीपरी भी कहते हैं जबकि गोल काली मिर्च को स्थानीय भाषा में मिरी/काली मिरी/गोल मोरिच भी कहते हैं। इस तरह मिर्च ने भारतीय भोजन के ज़ायक़ो को बदल कर रख दिया।

मिर्च ने त्रिफल का भी रसोई में दबदबा कम कर दिया। इसे चीनी खाने में काफ़ी इस्तेमाल किया जाता था लेकिन इसमें वो तीखापन नहीं था जो मिर्च में होता है और यही वजह है कि आज लोग इसे लगभग भूल चुके हैं।

पीपरी, मिरी और त्रिफल एक समय भारतीय महाद्वीप में गरम मसाले के अभिन्न हिस्सा हुआ करते थे। त्रिफल और मिरी की पैदावार जहां पश्चिम और पूर्व के आद्र क्षेत्रों में होती थी वहीं पीपरी सारे देश में उगाई जाती थी लेकिन काली मिर्च महंगी होती थी इसलिए इसका प्रयोग कम ही होता था।

बहरहाल तीखेपन की जंग में काली मिर्च, मिर्च से परास्त हो गई।

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मिर्च का…. भारत का सफ़र

मिर्च हालंकि सबसे पहले गोवा में आई थी लेकिन बड़े पैमाने पर इसकी पैदावार शायद कर्नाटक में हुई। इसकी वजह शायद विजयनगर साम्राज्य था जिसकी पुर्तगालियों से निकटता थी। मिर्च का आरंभिक उल्लेख महान संत और कवि पुरंदरदास के साहित्य में मिलता है। पुरंदरदास विजय नगर के सम्राट कृष्णदेव राय के समय थे। पुरंदरदास ने अपनी एक कविता में मिर्च की हरे से लाल होने की क्षमता की तुलना भगवान विष्णु से की है। उन्होंने मिर्च को ग़रीबों के लिए वरदान बताया था।

दिलचस्प बात ये है कि मिर्च 16वीं शताब्दी के पहले तक उत्तर भारत में नहीं आई थी। आईन-ए-अकबरी में इसका कोई ज़िक्र नहीं मिलता। सन 1650 में रघुनाथ ने अपनी किताब भोजन कुतुहल में मिर्च का ज़िक्र किया है जिससे पहली बार पता लगता है कि मिर्च महाराष्ट्र पहुंच चुकी थी।

उत्तर भारत में मिर्च महाराष्ट्र और गुजरात के रास्ते पहुंची। इसके बाद वह दक्षिण भारत में केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में भी उसने दस्तक दे डाली जो विजयनगर साम्राज्य से सटे हुए थे। एक और दिलचस्प बात ये है कि मिर्च राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश कैसे पहुंची, इसका कोई उल्लेख नहीं मिलता है।

कहा जाता है कि जहांगीर-शाहजहां ( 1605 t-1627) के शासन काल में पहली बार पिसी मिर्च (मिर्च पाउडर) ने मुग़ल बावर्चीख़ाने में क़दम रखा था। आर.वी. स्मिथ के अनुसार 19वीं शताब्दी में मिर्च बहादुर शाह ज़फ़र के समय में ही शाही दरबार की शान बनी थी। लेकिन सबसे बड़ी पहेली ये है कि मिर्च पूर्वोत्तर भारत में कैसे आई? कृषि-विशेषज्ञों के अनुसार मिर्च ने चीन से यहां आकर अपने पांव जमाए थे।

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मिर्च के कई रुप

मिर्च ने भले ही काली मिर्च के वर्चस्व को ख़त्म कर दिया हो लेकिन इसे नाम तो इसी से लेना पड़ा। हम इसे मिर्च/मोरिच/मिरी कहते हैं लेकिन क्या इन नामों में समानता नहीं दिखती? हिंदी में इसे लाल मिर्च, बांग्ला में लाल मोरिच, गुजराती में मरचा या मरचू , मराठी में मिरची, कश्मीरी में मर्स्तु और तमिल में मिलगई कहते हैं।

मिर्च के कई रुप, आकार, रंग और स्वाद हैं। शायद आपको पता न हो कि खाने के साथ, सिर्फ़ चबाने के लिए ख़ासतौर से मिर्च उगाई जाती है और इस तरह की मिर्च पाउडर या सूखाने वाली मिर्च से अलग होती है। इसका उदाहरण है कश्मीरी मिर्च जहां अपने रंग और महक के लिए मशहूर है वहीं आंध्र प्रदेश के गुंटूर और तेलंगाना में पैदा होने वाली मिर्च लोगों को सबसे ज़्यादा पसंद है।

गुजरात की मोटी मिर्च कम तीखी होती है जिसके अंदर मसाला भरकर नाश्ते में खाया जाता है। इसे उत्तर भारत में शिमला मिर्च कहा जाता है। शिमला मिर्च नाम इसलिये पड़ा क्योंकि ये शिमला में अंग्रेज़ों के लिये उगाई जाती थी जिन्हें तीखा खाना पसंद नहीं था।

महाराष्ट्र में बड़ी मिर्च को ‘धोबली मिर्ची’ कहते हैं जिसका मतलब है ‘मोटी मिर्च’।अन्य मिर्चियों में पूर्वोत्तर की बर्ड्स आई मिर्ची है जो बहुत छोटी और बहुत तीखी होती है। इसी तरह दक्षिण भारत में ब्याडगी नाम की गोल बेर की तरह मिर्ची होती है जिसका इस्तेमाल सांभर में किया जाता है। इसी तरह राजस्थान की मथानिया मिर्च का इस्तेमाल सभी तरह के स्थानीय अचारों में किया जाता है और इसकी चटनी भी बनाई जाती है। कश्मीर, हिमाचल और पंजाब में तीखी देगी मिर्च होती है। पंजाब में पूसा और ज्वाला मिर्च भी उगाई जाती है जिसका प्रयोग लगभग हर पंजाबी खाने में होता है। उड़ीसा में उत्कल रश्मि मिर्च होती है तो सिक्किम में दलय मिर्च पाई जाती है। लेकिन असम और नागालैंड की भूत जोलोकिया का कोई जवाब नही है। ये दुनिया की सबसे तीखी मिर्च मानी जाती है।

मिर्च का तीखापन एसएचयू (स्कोविल हीट यूनिट ) से आंका जाता है। कश्मीरी मिर्च में 28,000 एसएचयू , गुंटूर में 80,000, भूत जोलोकिया में 12,00,000 और 15,00,000 के बीच तीखापन होता है। इससे तीखी मिर्च की लगभग हर नस्ल भूत जोलोकिया से तैयार की गई है।

मिर्च के सेहत संबंधी लाभ

मिर्च खाने का अपना मज़ा तो होता ही है लेकिन इसके कई फ़ायदे भी हैं। कहा जाता है कि दिन में एक मिर्च खाने से भूख बढ़ती है। कैप्सैसिन से फेफड़े साफ़ होते हैं और रक्त प्रवाह अच्छा रहता है। जोड़ों की बीमारी में मिर्च खाने से दर्द से आराम मिलता है। मिर्च में विटामिन सी और एंटीऑक्सिडेंट होता है।

मिर्च खाने से घाव जल्दी भरने में मदद मिलती क्योंकि रक्त में मिलने के बाद मिर्च का द्रव्य घावकी जगह पहुंचकर उसे जल्दी ठीक कर देता है। मिर्च दिल के लिए भी अच्छी मानी गई है क्योंकि इसमें विटामिन बी6 और फ़ॉलिक एसिड होता है। बी6 विटामिन से होमोसिस्टीन कम होता जिससे दिल का दौरा पड़ने की संभावना कम हो जाती है।

मिर्च आज हमारे जीवन, दिल और पेट में घर चुकी है। मिर्च ने कई मुहावरे भी गढ़ दिये है जैसे ग़ुस्सैल महिला को तीखी मिर्च कहते हैं। इसके अलावा ‘मिर्ची लगना’ या किसी बात को बढ़ा चढ़ाकर बताने के लिए मिर्च मसाला लगाना जैसे रुपक का भी प्रयोग होता है।

मिर्च हमारे खानपान, हमारी भाषा और यहां तक कि फिल्मों का भी हिस्सा बन चुकी है। मध्य अमेरिका से लाई गई मिर्च आज इतनी भारतीय हो चुकी है…जितना कोई भारतीय हो सकता है।

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