कलमकारी – आंध्र प्रदेश की प्राचीन कला

कलमकारी – आंध्र प्रदेश की प्राचीन कला

भारत में कपड़े पर चित्रकारी की परंपरा सदियों से विकसित हुई है। प्राचीन ग्रंथ और भित्ति चित्र रंगे, कढ़े और छपे हुए कपड़े तथा स्वदेशी रंगों या कपड़ों पर हाथ से की गई चित्रकारी को दर्शाते हैं। लेकिन सिर्फ़ सज्जा के लिये ही इनकी तारीफ़ नहीं की जाती थी, इनका उद्देश्य और भी कुछ होता था। चित्रकार के नाम से जाने जाने वाले घुमंतू गवैये गांव गांव जाकर कपड़े पर अपनी चित्रकारी के ज़रिये हिंदू पौराणिक कथायें सुनाया करते थे।

भारत के हर हिस्से में चित्रकारी के ज़रिये कहानी सुनाने की अपनी ही परंपरा है जैसे गुजरात की माता नी पछेड़ी, राजस्थान की फड पैंटिंग, केरल के भित्ति चित्र और आंध्र प्रदेश तथा तेलंगाना की कलमकारी।

आंध्र प्रदेश में इसे कलमकारी कहते हैं और एक समय पूरे विश्व में इसकी धूम थी। कपड़ों पर चित्रकारी की इस कला के यहां दो केंद्र हैं- पुराना मछलीपटनम बंदरगाह शहर और मंदिर का शहर कलाहस्ती। इन दोनों शहरों की कला की अपनी ही शैली है जो इतिहास से प्रभावित है।

कपड़े पर चित्रकारी करने को इस कला को प्राचीन काल में तेलुगु भाषा में वृथापानी कहते थे। इसके तार 12वीं और 13वीं शताब्दी में श्री कलाहस्ती के मंदिर से जुड़े हुए हैं जो आज आंध्र प्रदेश के चित्तूर ज़िले में शामील होता हैं। कहा जाता है कि बहुत पहले कलाकार भगवान शिव को समर्पित मंदिर की सेवा के लिये श्री कलाहस्ती में बस गए थे। ये मंदिर 5वीं  शताब्दी का है। ये मंदिर कितना महत्वपूर्ण था इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि चोल राजाओं और विजयनगर राया ने 12वीं और 15वीं शताब्दी में इसे बढ़ाया और दोबारा बनवाया। कहा जाता है कि कपड़ों पर चित्रकारी यानी कलमकारी यहीं विकसित हुई थी।कलमकार लंबे कपड़ों पर चित्रकारी करते थे जो मंदिर की दीवारों और छतरियों पर लटकाईं जाती थी। इनमें पौराणिक कथाओं, रामायण और महाभारत की घटनाओं का वर्णन होता था। वे भित्ति चित्र भी बनाते थे। इस चित्रकारी में ज़्यादातर नीले, लाल और काले रंग का प्रयोग होता है।

छवि-वीरभद्रस्वामी मंदिर में शिव-पार्वती का भित्ति चित्र, 16वीं सदी

छवि-वीरभद्रस्वामी मंदिर में शिव-पार्वती का भित्ति चित्र, 16वीं सदी विद्वानों के अनुसार यहां कि कलमकारी कला आंध्र प्रदेश में विजयनगर युग के लपाक्षी मंदिर की दीवारों और छत पर बने भित्ति चित्रों से मिलती जुलती है। लपाक्षी का शिव को समर्पित वीरभद्र मंदिर 16वीं शताब्दी का है। यहां के भित्ति चित्रों में पौराणिक कथाओं का वर्णन है और चित्रों के बाहरी घेरे गहरे काले रंग के हैं। इसी तरह की शैली और रुपांकन

आज कलमकारी कला या श्री कलाहस्ती में देखने को मिलती है। भित्ति चित्रकला में पौराणिक पात्र जिस तरह के कपड़े पहने हुए हैं उसी से मिलते जुलती रचनाये आपको कलमकारी में नज़र आएंगे।

गोलकुंडा के कुतुब शाही सुल्तानों के इतिहास की प्रबुद्ध पांडुलिपि | विकिमीडिआ कॉमन्स 

कलमकारी कला प्राचीन समय से चली आ रही है। 16वीं शताब्दी में गोलकुंडा के क़ुतुब शाही सुल्तनत ने इस कला को प्रश्रय दिया। इसी दौरान ये कला कलमकारी के नाम से प्रसिद्ध हो गई। कलमकारी शब्द फ़ारसी शब्द कलम और कारी को जोडकर बना गया है।

इस कला के फलने फूलने में व्यापार की बड़ी भूमिका थी। इस अवधि के दौरान  फ़ारस की सफ़वाबी सल्तनत और क़ुतुब शाही गोलकुंडा के बीच गहरे व्यापारिक संबंध बन गए थे। फ़ारस में भारत के हीरे और मोतियों के अलावा ऐसे कपड़ों की भी बहुत मांग थी जिन पर छवियों बनी हों।

गोलकुंडा के सुल्तान ने कोरोमंडल तट पर मछलीपटनम में पेंडाना कलाकारों को संरक्षण दिया। उस समय कोरोमंडल तट सल्तनत की वाणिज्यिक राजधानी बनगया था। कलमकार विदेशी ख़रीदारों की ज़रुरत के मुताबिक वनस्पति से तैयार रंगों से कपड़ों पर चित्र बनाते थे। ये चित्र फ़ारसी पात्रों के हुआ करते थे। इसे बनाते समय वे सांचे का इस्तेमाल करते थे। कलमकारी कपड़ों का इस्तेमाल मुग़ल शिविरों के लिये कनात बनाने में भी प्रयोग होता था।

लमकारी रुमाल, 16वीं सदी | विकिमीडिआ कॉमन्स 

समय के साथ मछलीपटनम बंदरगाह इंग्लैंड, फ़्रांस और नीदरलैंड के व्यापारियों का केंद्र बन गया और मलमल के साथ साथ चित्रांकित और धपाई वाले भारतीय कपड़े ख़ूब बिकने लगे। इसे पुर्तगाली पिंटाडो, नीदरलैंड के व्यापारी सिट्ज़, और अंग्रेज़ व्यापारी शिंट्ज़ कहते थे। इन कपड़ों से कढ़ाई वाली जैकेट, पेटीकोट और स्कार्फ़ बनाये जाते थे। इसके अलावा इन कपड़ों से यूरोप के लिये बिस्तर की चादरें भी बनाईं जाती थीं। भारत में यूरोपियों के आने के बाद इन कपड़ों पर बेलबूटे, फूल और जानवरों की भी चित्रकारी होने लगी थी।

कलमकारी का कपड़ा जापान भी भेजा जाने लगा जिस पर बौद्ध धर्म से संबंधित चित्रकारी होती थी। मछलीपटनम में कलमकारी कपड़ों की मांग इतनी बढ़ गई कि कलमकार सांचें बनाकर चित्रकारी करने लगे ताकि मांग के अनुरुप उत्पादन भी बढ़ सके। जल्द ही यहां के कलमकार सांचों पर आधारित चित्रकारी करने लगे जिसे शिंट्ज़ कहा जाता था। शिंट्ज़ पश्चिमी देशों में बहुत लोकप्रिय हो गए थे। 17वीं शताब्दी के आते आते शिंट्ज़ ने यूरोपीय फ़ैशन दुनिया में धूम मचा दी। लोग इसका उपयोग घरों को सजाने में भी करने लगे थे।

लेकिन 18वीं शताब्दी के अंत में ब्रिटेन के कपड़ा उद्योग के औद्योगीकरण की वजह से भारत के हाथ से बने कपड़ों का पश्चिमी देशों को निर्यात बंद कर दिया गया। यूरोप में प्रिंटर और बुनकर नयी उत्पादन तकनीक और सिंथेटिक रंगों से भारतीय कपड़ों की नक़ल करने लगे। इससे भारत के कलमकारी शिल्पकारों को बहुत नुकसान हुआ।

कलमकारी की तकनीक

कलमकारी की श्री कलाहस्ती शैली में जहां हाथ से चित्रकारी होती थी वहीं मछलीपटनम की कलमकारी शैली में ब्लॉक प्रिटिंग का प्रयोग होता था। श्री कलाहस्ती शैली की चित्रकारी में बहुत मेहनत और समय लगता है।एक विशिष्ट कलम बनाकर चित्र बनाये जाते है, फिर वनस्पति से तैयार रंगों से इन्हे भरा जाता हैं।

कलम बनाने के लिये बांस के छोटे टुकडे या फिर खजूर के पत्ते के तिनकों का प्रयोग किया जाता है। इसे एक सिरे से नुकीला बनाया जाता है जिससे पात्र के बाहरी किनारों और कपड़े के बॉर्डर को पैंट किया जाता है। लकड़ी पर एक कपड़ा बांधा जाता है और एक दूसरे सिरे पर घागा बांधा जाता है। इस तरह से ये कलम स्पंज की तरह काम करता है और काले रंग को सोख जाता है। ये काला रंग लोहे के चूरे, पानी और गुड के घोल से तैयार करते है जिसे कासिमी कहा जाता है।

इस घोल को इस्तमाल करने के पहले, इक्कीस दिन तक रखा जाता है ताकि इसमें ख़मीर पैदा हो सके। इस कलम से पेंटिंग के किनारों को काले रंग से रंगा जाता है।

पेंटिंग के लिये कैन्वस के रुप में कपड़े का प्रयोग किया जाता है। कपड़े से माड़ निकालने के लिये पहले  इसे पानी में भिगोया जाता है। इसे हरिताल के महीन चूरे को भैंस के दूध में मिलाकर इसमें कपड़े को कई बार डुबोया जाता है और फिर सूखने के लिये छोड़ दिया जाता है। कपड़े के हर दो मीटर के हिस्से के लिये क़रीब एक लीटर दूध का इस्तेमाल किया जाता है। कपड़ा चूंकि दूध सोख लेता है, इस पर चित्रकारी करना आसान हो जाता है।

इमली के पेड़ की टहनियों को जलाने से उससे जो कोयला बनता है उससे कपड़े पर ड्रॉइंग बनाई जाती है। इसके बाद कलम, धागे और कपड़े से काले रंग से बाहरी रेखा खींची जाती है। चित्रकारी के लिये प्रयोग किये जाने वाले रंग बीज, गोबर, कुचले हुए फूल और पत्तियों तथा खनिज नमक से बनाये जाते हैं। इन रंगो को बांस से बनी लकड़ी से चित्रों में भरा जाता है लेकिन बांस की इस लकड़ी का किनारा सपाट होता है। पीला रंग पके हरिताल और फिटकरी को मिलाकर बनाया जाता है जबकि नारंगी रंग हरिताल और फिटकरी के घोल में मजीठ तथा केसर को मिलाकर तैयार किया जाता है। नील के पौधे से नीला रंग बनाया जाता है। अनार के बीज, फिटकरी और आम के पेड़ की छाल से लाल रंग बनाया जाता है।

कपड़े का वह हिस्सा जिस पर लाल रंग होना होता है, उसे पहले फिटकरी के घोल से रंग दिया जाता है। फिटकरी दरअसल प्राकृतिक रंगों को चिपकाने का काम करती है। इसी तरह हरिताल भैंस के दूध की महक को ख़त्म कर देता है। बहरहाल, इन रंगों को मिलाकर अन्य रंग बनाये जाते हैं।

पेंटिंग में पात्रों के चित्रण में रंगों का बहुत महत्व होता है। तमाम देवी-देवताओं को नीले या कभी कभी काले रंग से बनाया जाता है। महिला पात्र के लिये पीला गेरुआ रंग इस्तेमाल किया जाता है जबकि दैत्यों को लाल रंग से पेंट किया जाता है। सात्विक वो व्यक्ति होता है जो शांतिप्रिय हो। तामसु का अर्थ क्रोध है और रजसु व्यक्ति आत्म केंद्रित होता है। ये सभी भाव मानव स्वभाव को दर्शाते हैं। इन्हें कलमकारी कला की पेंटिंग में देखा जा सकता है और इन्हें रंगों से पारिभाषित किया जाता है

श्री कलाहस्ती में पेंटिंग बनाने के बाद कपड़े को स्वर्णमुखी नदी के बहते पानी में धोया जाता है।स्वर्णमुखी नदी के बहाव की वजह से ये कला ख़ूब फूली फली। पानी के तेज़ बहाव की वजह से फिटकरी जैसे ज़्यादा मात्रा वाले पदार्थ निकल जाते हैं। पानी में धोने के बाद रंगों के सही गहराईयाॅं हासिल करने के लिये कपड़े को गर्म पानी में उबाला जाता है और फिर धूप में सूखने के लिये डाल दिया जाता है।

श्री कलाहस्ती में काफ़ी लंबे समय तक कलमकारी कला की दुर्दशा होती रही थी। शहर में सिर्फ़ चार परिवार ही इस कला से जुड़े हुए थे लेकिन आज ये कला फिर जीवित हो उठीहै और अब कई केंद्रों पर कलमकारी का काम हो रहा है। ।

कलमकारी पेंटिंग बनाने की प्रक्रिया, श्री कलाहस्ती

कलमकारी का पुनर्जन्म

आज़ादी के बाद प्रमुख सामाज सुधारक कमलादेवी चट्टोपध्याय ने हस्तकरधा, हस्तशिल्प और रंगकर्म को पुन:जीवित करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने आज़ाद भारत में कला का पुनरुत्थान किया और इसिलिये उन्हें भारतीय कला की माता कहा जाता है। कमलादेवी ने 1952 में ऑल इंडिया हेंडीक्रॉफ़्ट बोर्ड बनाया जिसने भारतीय हस्तकला के पुनर्जागरण और उसके विकास के उपाय सुझाए। इसी की वजह से सरकार का ध्यान कलमकारी कला की तरफ़ गया और ये पुन: जीवित हो गई। कमलादेवी के प्रयासों के बाद से कलमकारी को फिर जिंदा करने की ठोस कोशिशें की गईं।

आज कलमकारी की साड़ियां और दुपट्टे बहुत लोकप्रिय हो रहे हैं। घरों की दीवारों को कलमकारी पेंटिंग्स से सजाया जा रहा है और ये पांच सितारा होटलों की लॉंज की भी शोभा बढ़ा रही हैं। भारतीय ग्रंथों और पौराणिक कथाओं का संबंध जितना साहित्य से है उतना ही धर्म से भी है। इन पौराणिक कथाओं के ज़रिये कलमकारी कला ने हमारी भारतीय संस्कृति और घोरहर को ज़िदा रखा हुआ है। ये कला आगे भी ज़िदा रहे, इसके लिये इसे संरक्षण की बहुत ज़रुरत है।

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