राजस्थान का कठपुतली का खेल

राजस्थान का कठपुतली का खेल

दक्ष अंगुलियों से बंधी डोर के एक इशारे से डांसर्स नाचने लगती हैं और अगले इशारे से मंच युद्द के मैदान में बदल जाता है। ये कमाल करते हैं राजस्थान के कठपुतली कलाकार जिनकी उंगलियों से बंधी डोर मंच को तरह तरह के दृश्यों से जीवंत कर देती है। हम आपको कला की इस विधा के बारे में बताने जा रहे हैं जिसे राजस्थान का कठपुतली खेल कहते हैं।

राजस्थान रंगों, कला और पारंपरिक प्रदर्शन कला के लिए जाना जाता है जिसे बरसों से संजों कर रखा गया है। इन्हीं कलाओं में एक कला है कठपुतली का खेल जिसके ज़रिये लोक कथाएं सुनाई जाती हैं। कठपुतली का अर्थ लकड़ी का खिलौन होता है…काठ मतलब लकड़ी और पुतली का मतलब खिलौना। कठपुतली का खेल आज राजस्थान के लगभग हर हिस्से में देखा जा सकता है। माना जाता है कि इसकी शुरुआत थार रेगिस्तान के मुहाने पर जोघपुर के पास नागौर में हुई थी।

कठपुतली का खेल  | विकिमीडिया कॉमन्स

ये अनौखे कठपुतली कलाकार न सिर्फ़ कठपुतलियों को अपनी उंगुलियों पर नचाते हैं बल्कि ख़ुद कठपुतलियां बनाते भी हैं। कठपुतली के खेल का संबंध पारंपरिक रुप से भाट समुदाय से है। भाट समुदाय एक समय खेतीबाड़ी करता था और ख़ानाबदोश की तरह रहता था। इस कला में कठपुतली कलाकारों की निपुर्णता का अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उनकी उंगली की एक हरकत से कठपुतली जीवंत हो जाती है। इनका हुनर सिर्फ़ लोक कथा को सुनाने में ही नहीं बल्कि कठपुतली को नचाने में ज़रुरी ताल और नियंत्रण में भी नज़र आता है।

मध्ययुग में भाट समुदाय गांव गांव जाकर कठपुतली के खेल के द्वारा अपनी कथा सुनाते थे। इन कथाओं में ज़्यादातर स्थानीय नायकों की वीरता की कहानी होती थी। ज़्यादातर कथाएं धार्मिक न होकर मनोरंजन से भरपूर हुआ करती थीं उस समय कठपुतली का खेल देखना मनोरंजन के सीमित साधनों में से एक था। खेल के बदले भाट समुदाय को धन, पशु या फिर अनाज मिल जाता था।

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कठपुतली कलाकारों की कहानियां इतनी लोकप्रिय हो गईं कि उनको शाही घराने का समर्थन मिलने लगा। इसके बाद वे अलग अलग साम्राजों में जाकर बसने लगे। मध्यकालीन राजस्थान में लगभग हर प्रमुख शाही दरबार का अपना कठपुतली कलाकार होता था जिसे चारण कहा जाता था। चारण की दो भूमिकाएं होती थीं- कवि और कठपुतली कलाकार । वे कठपुतली बनाकर शासक, शाही ख़ानदान और दरबारियों की बहादुरी और शान में कहानियां गढ़कर कठपुतली का खेल दिखाते थे। इसके अलावा वे संरक्षकों की वंशावली के सूत्रधार की भी भूमिका निभाते थे।

पारंपरिक कथाओं में सबसे लोकप्रिय कथा है नागौर के अमर सिंह राठौड़ की जो शाहजहां ( सन1628-1658 ) के दरबारी थे। अमर सिंह राठौड़ की कहानी उनके शौर्य और मुग़ल शहंशाह के दरबार में उनके साथ हुए छल-कपट के बारे है। इसके अलावा अनारकली नाम की कठपुतली का नृत्य भी लोकप्रिय रहा है।

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कठपुतली का चेहरा और गर्दन एक ही लकड़ी की बनी होती है। जिसे रूई और कपड़े से बने हाथों और धड़ से जोड़ दिया जाता है। कठपुतली के लिबास लेहरिया और बंधेज के कपड़ों से बने होते हैं जिसे गोटे से सजाया जाता है।

स्त्री कठपुतलियों के अक्सर पांव नहीं होते हैं लेकिन कठपुतली कलाकार उन्हें इस क़दर सफ़ाई से दिखाते हैं कि देखने वालों को पता ही नहीं चलता है।

कठपुतलियों के चेहरे ख़बूसूरत रंगों से रंगे और सजाये जाते हैं। पुरुष कठपुतलियों की लम्बी और पतली आंखें और प्रभावशाली मूंछें बनाई जाती हैं। खठपुतली को सिर और सीने से बंधी एक ही डोर से नियंत्रित किया जाता है। कई बार हाथों के लिये एक अलग डोर का इस्तेमाल किया जाता है।

परम्परा के मुताबिक़ पुरुष कठपुतली को नचाते हैं और महिलायें ढ़ोलक, तबला और दूसरे साज़ बजाती हैं। गीत महिलायें गाती हैं और सीटियां पुरुष बजाते हैं। पुरुष, संगीत को और बेहतर बनाने के लिये बांस की बनी सीटियों से कई आवाज़ें भी निकालते हैं।

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ये कठपुतलियां एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के हाथों में जाती हैं और जब ये प्रयोग करने लायक़ नहीं रह जातीं तो इन्हें नदी में विसर्जित कर दिया जाता है। इस रिवाज की अनौखी बात ये है कि कठपुतली कलाकारों का मानना है कि कठपुतलियां जितनी देर तक पानी में तैरती रहती हैं, वह उनके लिये, उतनी ही भाग्यशाली रही होगीं।

आज पूरे देश में मनोरंजन के ढ़ेर सारे साधन हो गए हैं और इसकी वजह से कठपुतली कलाकारों को संरक्षण देनेवाले भी तेज़ी से घटे हैं। मौजूदा समय में वे सैलानियों के लिये होटल, रेस्तरां और पर्यटन स्थलों पर कठपुतली का खेल दिखाते हैं । उनकी कहानियों में अब किवदंतियों और मिथक के अलावा और भी कहानियां शामिल हो गईं हैं जो समसामायिक, लोकप्रिय और भारतीय फ़िल्मों से प्रभावित होती हैं। इसके बावजूद वे आर्थिक तंगी के दौर से गुज़र रहे हैं और वे खेल दिखाने की बजाय कठपुतियां बेचकर गुज़र बसर कर रहे हैं।

कठपुतली का खेल देश की एक अनूठी कला परंपरा है जो धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। सिर्फ़ पारंपरिक महत्व के लिए ही नहीं बल्कि इसमें शामिल कला, दक्षता और ज्ञान के लिए भी इसे ज़िंदा रखा जाना ज़रुरी है।

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