डबल डेकर की कहानी

डबल डेकर की कहानी

दो मंज़िला मकान तो आमतौर पर हम सभी ने देखें हैं लेकिन सड़कों पर, रेल की पटरियों पर, चलते-फिरते,दौड़ते-भागते दो मंज़िला वाहन बहुत कम देखने को मिलते हैं । यह डबल डेकर कहलाते हैं।

सत्तर के दशक में, मुम्बई में बिताया अपना बचपन मुझे आज भी याद है। तब घर के पास से गुज़रने वाली बस नम्बर 3 का बड़ी बेचैनी से इंतज़ार रहता था।और उसे देखकर बड़ी खुशी होती थी क्योंकि वह डबल डेकर बस हमें बाइकला के चिड़िया घर ले जाती थी। दादाजी साथ होते थे। बस के रुकते ही हम ऊपरी मंज़िल की तरफ़ दौड़कर अगली सीट को झपटने की कोशिश करते थे । खिड़की से आती हुई ठंडी हवा और ऊपर से चारों तरफ़ का नज़ारा, बस में बैठकर उतना ही आनंद आ जाता था जितना चिड़िया घर में जानवरों को देखकर आता था । ज़रा सोचिये, मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा होगा जब हम परिवार से मिलने सूरत जा रहे थे,जिस ट्रेन में हम बैठे वह फ़्लाइंग रानी थी यानी वह भी डबल डेकर ट्रेन थी ।

डेबल डेकर बसों का जितना महत्व मुम्बई में रहा है उतना ही लंदन में रहा है। दरअसल हमारी बसें लंदन की बसों की ही प्रतिछाया हैं।

डबल डेकर बसों की शुरुआत इंग्लैंड में नहीं हुई थी बल्कि एक फ़्रांसीसी ने 1829 में, पेरिस में इन बसों की शुरुआत की थी

पेरिस की पहली ओमनीबस, 1828  | विकिमीडिया कॉमन्स 

वह बस घोड़े से चलती थीं। लंदनवालों ने भी 1829 में इसी तरह की बस चला दी थी। उसमें 22 यात्री बैठते थे। वह भी घोड़े से चलती थी और किसी निजी कम्पनी ने चलाई थी। इंजिन से चलनेवाली पहली डबल डेकर बस पहले विश्व युध्द के बाद यानी 1923 में आई थी। उन्होंने कम ऊंचाईवाली छोटी डबल डेकर बसें चलाईं थीं जो लंदन की पतली और घुमावदार सड़कों के लिये उपयुक्त थीं।उनमें ज़्यादा यात्री भी बैठ सकते थे। जबकि सामान्य बसों के लिये लंदन की पतली और घुमावदार सड़कों पर चलना आसान नहीं होता था। कुछ ही दिनों बाद कई और कम्पनियां मैदान में आ गई थीं।

लंदन की पहली अमोनीबस ,1829  | विकिमीडिया कॉमन्स 

लेकिन मुम्बई में इन बसों की संख्या घटती जा रही है। जब देश आज़ाद हुआ था तब इनकी संख्या 242 थी जो आज घटकर 125 रह गई है। 2023 आते आते यह डबल डेकर बसें सड़कों से एकदम ग़ायब हो जायेंगी। इसका आधार पूरी तरह आर्थिक है। हर डबल डेकर बस में तीन कर्मचारी होते हैं। मुसाफ़िरों की तादाद बढ़ने के बवजूद मुनाफ़ा ज़्यादा नहीं बढ़ता । लेकिन यह सच है कि इन बसों के बिना मुम्बई की तस्वीर पहले जैसी नहीं रह पायेगी।

ट्रवल एंड ट्रांस्पोर्ट विशेषग्य क्रिस वूलमर 2016 में जब मुम्बई आये तो वह यह देखकर हैरान रह गये थे कि भारत में चलनेवाली डबल डेकर बसें और ट्रेनें बिना दरवाज़ों के चलती हैं।

| विकिमीडिया कॉमन्स 

डबल डेकर बसें तिरुआनंतपुरम,कोलकता, चैन्नई, हैदराबाद और वेंगलुरु में आज भी चल रही हैं।

अगर हम डब्बल डेकर बस को एक बहुत बड़ी ईजाद मानें तो डबल डेकर ट्रेन तो उससे भी बड़ी चीज़ है। लेकिन सच यह कि ऐसी ट्रेनें 1850 में, फ़्रांस में चलने लगी थीं। वह सामान्य ट्रेनें ही होती थीं जिनकी छतों पर कुर्सियां लगी होती थीं और ऊपर शामियाना बंधा होता था। पूरी तरह की डबल डेकर ट्रेन 1860 में बनी थी। फिर वह ट्रेनें पूरी दुनिया में फैल गईं । अमेरिका में एचीसन-टोपेका-सांता फ़े लाइन पर चलनेवाली ट्रेन बेहद चर्चित हुई थी।

परिवहन-पत्रकार और रेल्वे-इतिहासकार राजेंद्र अकलेकर बताते हैं कि भारत में पहली डबल डेकर ट्रेन 1862 में बन गई थी। बीबी एंड सीआई (अब पश्चिमी रेलवे) के लिये बनाई गई वह ट्रेन पूरी तरह लकड़ी की बनी हुई थी। निचले हिस्से में कुर्सियां लगी होती थीं और ऊपरी मंज़िल पर सादे तख़्ते लगे होते थे।एक ट्रेन में 190 से 210 तक यात्री बैठ सकते थे। उस तरह के डिब्बे भारी बहुत होते थे और उनसे ज़्यादा फ़ायदा भी नहीं था इसलिये उन्हें जल्द ही बंद कर देना पड़ा।

| विकिमीडिया कॉमन्स 

भारत में डबल डेकर ट्रेनों की दोबारा वापसी 1976 में नई डिज़ाइन के डिब्बों के साथ हुई । इनमें प्रवेश का लेवल, प्लेटफ़ार्म के लेवल के समान रखा गया था । जिससे उन पर चढ़ना आसान हो गया था। फिर अंदर जाकर किसी भी मंज़िल पर बैठा जा सकता था। इस तरह के डिब्बे सबसे पहले सिंहगढ़ एक्सप्रैस में लगाये गये जो मध्य रेलवे में, मुम्बई-पुणे के बीच चलती थी।

उसके बाद व्यस्त लाइनों पर ज़्यादा यात्रियों को लाने ले जाने के लिये कई अन्य ट्रेनों में भी ऐसे डिब्बे लगाये गये। कुछ समय बाद सिंहगढ़ एक्सप्रैस और अन्य ट्रेनों ने इस तरह के डिब्बे लगाने बंद कर दिये थे लेकिन मुम्बई और सूरत के बीच चलनेवाली फ़्लाइंग रानी एक ऐसी ट्रेन है जिसमें आज भी डबल डेकर डिब्बे लगाये जाते हैं। इसके अलावा मुम्बई-वलसाड़ एकमात्र एक्सप्रैस ट्रेन है जिसमें द्वतीय श्रेणी के डबल डेकर डिब्बे लगाये जाते हैं।इत्तिफ़ाक़ की बात है कि यह दोनों ट्रेनें बीबी एंड सीआई/पश्चिमी रेलवे यानी उसी क्षेत्र में चलती हैं जहां से डबल डेकर ट्रेन की शुरूआत हुई थी।

सब कुछ के बावजूद डबल डेकर ट्रेनों की विफलता का एक बड़ा कारण यह रहा कि उनकी ऊपरी मंज़िल बहुत जल्दी गर्म हो जाया करती थी।

सन 2011 से डबल डेकर ट्रेनों को एक नया जीवन मिल गया है। भारतीय रेलवे ने अब एयरकंडीशन डबल डेकर डिब्बे लगाने शुरू कर दिये हैं। इससे गर्मी और धूल-मिट्टी की समस्या हल हो गई। कपूरथला कोच फ़ेक्ट्री में बनाये गये इन डिब्बों का उपयोग छह अलग अलग लाईनों यानी मुम्बई-गोवा, मुम्बई-अहमदाबाद,चैन्नई-बेंगलूरु,लखनऊ-आणंद,जयपुर-दिल्ली और विशाखापटनण-तिरुपति पर हो रहा है। .

1970 के दशक में जब डबल डेकर आरंभ हुई थी तब कैटबरी कम्पनी ने अपनी एक चाकलेट बार का ‘डबल डेकर बार’ के रूप में प्रचार किया था।डबल डेकर मुम्बई के नाम से इतना जुड़ गया था कि ‘शान’ और ‘छोटी सी बात’ जैसी मुम्बईया फ़िल्मों में डबल डेकर बस को दिखाया गया था। मारियो मिरांडा जैसे कार्टूनिस्टों के कार्टूनों में डबल डेकर बस अक्सर दिखाई देती थी। बीईएसटी की लाल रंग की डबल डेकर बस मुम्बई की पहचान बन गई थी।

डबल डेकर बस को नए और पुराने मुम्बई के प्रतीक के रूप में देखा जाता था। वह पराम्परागत और आधुनिक मुम्बई के बीच एक पुल की तरह भी थी।उनकी बिदाई देखकर अफ़सोस हो रहा है। डबल डेकर बसों के जाने से मुम्बई के जीवन में निश्चित रूप से एक ख़ालीपन पैदा हो जायेगा।

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