कनगनहल्ली: कर्नाटक की बौद्ध विरासत 

कनगनहल्ली: कर्नाटक की बौद्ध विरासत 

अगर यह पूछा जाए कि क्या कर्नाटक का बौद्ध धर्म से कोई रिश्ता रहा है ? ज़ाहिर है जवाब होगा नहीं।

क्योंकि भारत में जब भी बौद्ध विरासत पर चर्चा होती है, उसमें कर्नाटक का कोई ज़िक्र नहीं होता।

यह जानकर आपको आश्चर्य होगा कि कर्नाटक राज्य के गुलबर्गा ज़िले में भारत के सबसे महत्वपूर्ण बौद्ध स्थलों में से एक स्थल है।1993 के उत्तरार्द्ध में, कर्नाटक में भीम नदी पर एक बांध बनना था। पर्यावरण संबंधी मंज़ूरी के लिए पुरातत्वविदों की एक टीम को क्षेत्र के सर्वे के लिए भेजा गया। हैरानी की बात है कि सर्वे के दौरान टीम को कई ऐसे स्थान मिले जहां प्राचीन स्मारकों और कलाकृतियों के अवशेष थे। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण स्थान था कनगनहल्ली।

आर्किओलॉजिकल साइट से मिली टूटी हुई स्लैब  | विकिमीडिया कॉमन्स 

कनगनहल्ली नदी के बाएं तरफ़ स्थित था और खेतों में वृत्ताकार में बेतरतीब से रखे पत्थरों ने पुरातत्वविदों का ध्यान आकृष्ट किया। इस खोज के बाद 1994-95 में के.पी. पूनाचा की अगवाई में प्रयोग के रुप में खुदाई का आदेश दिया गया।

खुदाई में ईंटों का एक बड़ा स्तूप मिला जो नक़्क़ाशीदार पटियों से ढ़का हुआ था

ये पटिये सफ़ेद चूना-पत्थर के बने थे और संभवत: पहली और तीसरी शताब्दी के थे। खुदाई में लोहे की छड़ों की रैलिंग, खंबे और मूर्तियां मिलीं। इसके अलावा जस्त के 60 सिक्के मिले जिन पर सातवाहन राजवंश के राजाओं के नाम लिखे हुए थे। ऐसा लगता है कि ये स्तूप सातवाहन राजवंश ने ही बनवाया होगा । सिक्कों के अलावा 200 शिला-लेख भी मिले हैं जिन पर व्यापारियों, बैंकर, बौद्ध भिक्षुओं तथा अन्य दान दाताओं के नाम लिखे हुए थे।

खुदाई के दौरान अचानक एक टीले के नीचे दो हज़ार साल पुराना बौद्ध केंद्र मिला। इसका ये मतलब हुआ कि कनगनहल्ली में शताब्दियों पहले लोग रहते थे। ये मठ संभवत: प्रमुख कारवां मार्ग पर स्थित होगा। ये मठ केंद्र मध्यप्रदेश के सांची और भारहट बौद्ध-स्थलों की ही तरह है। बौद्ध-स्थल की खोज से ज़्यादा राजा और (संभवत:) रानी की टूटी मूर्ति ने विश्व का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा जिसमें वे महिला सहायिकाओं से घिरे नज़र आ रहे हैं। इस पर अंकित शिला-लेख पर ‘रानयो अशोक’ लिखा हुआ था। इसमें कोई शक़ नहीं कि ये मूर्ति मौर्य शासक अशोक (304 -232 ई.पू.) की थी।

सम्राट अशोक का चित्र | विकिमीडिया कॉमन्स 

सम्राट अशोक की ये अब तक की एकमात्र प्रमाणिक मूर्ति मानी जाती है।

(कई सालों बाद सांची में एक पट्टिका मिली थी जिस पर अशोक का चित्र था लेकिन पहचान या प्रमाणिकता सिद्ध करने के लिए कोई शिला-लेख नहीं था।)

ये भी इत्तिफ़ाक़ है कि कर्नाटक के शहर मास्की में भी 1915 में पत्थर की अशोक-लाट मिली थी जिस परअशोक का नाम लिखा हुआ था। इसके पहले सभी शिला-लेखों में अशोक को देवानामपिये पियादासी नाम से संबोधित किया गया है।

कनगनहल्ली स्तूप में अशोक के अलावा शाही परिवार के सदस्यों की कई आकृतियां मिली थीं। उदाहरण के लिए एक पैनल में सातवाहन राजा पुलुमावी को दूसरे राजवंश के राजा को उज्जैन शहर भेंट करते हुये दिखाया गया है। पुलुमावी को विजेता के हाथ पर पानी डालते दिखाया गया है। ये विजेता को उपहार देने का एक पारंपरिक तरीक़ा होता था। अन्य पैनलों पर बुद्ध के जीवन की घटनाओं और जातक कथाओं का वर्णन अंकित है।

कनगनहल्ली में प्रयोगात्मक खुदाई के बाद 1996-97 में और व्यवस्थित ढंग से खुदाई की गई। खुदाई में कई महत्वपूर्ण चीज़े मिली हैं जिससे हमें दक्षिण भारत में बौद्ध धर्म के बारे में काफ़ी जानकारी मिलती है।

अगर रिकॉर्ड को देखा जाए तो बौद्ध धर्म सबसे पहले मौर्यकाल में, कर्नाटक पहुंच गया था

मौजूदा समय के कर्नाटक के कुछ हिस्से मौर्या साम्राज के अधीन थे। यहां मिले अशोक के फ़रमानों से पता चलता है कि साम्राज दक्षिण तक फैला हुआ था। कर्नाटक में बौद्ध धर्म के प्रचार का उल्लेख महावामसा और दीपावामसा ग्रंथों में मिलता है जो तीसरी और चौथी शताब्दी में लिखे गए थे। माना जाता है कि तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक के समय भिक्षु महादेव को महीशामंडल और दूसरे भिक्षु रुक्षिता को बनवासी भेजा गया था। मौजूदा समय में महीशामंडल और बनवासी कर्नाटक के हिस्से हैं।

कनगनहल्ली स्तूप दरअसल सन्नटी गांव में एक बड़े पुरातात्विक परिसर का हिस्सा हुआ करता था।ये स्थान 1986 में उस समय सुर्ख़ियों में आया जब चंद्रलंबा मंदिर परिसर में काली मंदिर की छत गिर गई थी, जो कनगनहल्ली से क़रीब 3 कि.मी. दूर है। इस दुर्घटना में मूर्ति तो नष्ट हो गई लेकिन ऐतिहासिक रुप से ये घटना बहुत लाभदायक साबित हुई। इस घटना के बाद पता चला कि मंदिर निर्माण में चार अशोक-लाट का इस्तेमाल किया गया था एक लाट का इस्तेमाल तो काली की मूर्ति की पीठिका की बुनियाद में किया गया था। इन लाटों पर पाली भाषा में ब्रह्मी लिपि में अशोक के निर्देश लिखे हुए हैं। इसे देखने विश्व भर से इतिहासकार जमा हो गए थे।

भारतीय पुरातत्व विभाग और राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा और खुदाई करने पर महा स्तूप के अवशेषों के साथ नक़्क़ाशीदार 60 छोटे गुंबद मिले

कुछ ऐसी भी वस्तुएं मिली हैं जो पुरापाषाणयुग, मध्यपाषाण और नवपाषाण युग की हैं। इनमें मिट्टी के झुमके, काली पॉलिश वाले बर्तन, कांसे, हाथी दांत और लोहे के आभूषण, पक्के मार्ग वाला नगर, घर,तख़्तियां, मूर्तियां और टेराकोटा के सामान मिले हैं।

अगली बार अगर आप कर्नाटक जाने का प्रोग्राम बनाएं तो कनगनहल्ली को इसमें शामिल करना न भूले।

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