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गुजरात के कच्छ में इंडिया हाउस का एक प्रतिरुप रखा है जो सन 2010 में बनवाया गया था। लेकिन असली इंडियन हाउस सौ साल पुराना है जो उत्तर लंदन में है।

65, क्रोमवेल एवेन्यू आज लंदन के एक उपनगरीय क्षेत्र में एक अनजान सी जगह है लेकिन 20वीं शताब्दी के पहले दशक में विक्टोरिया शैली का, लाल ईंटों वाला ये बंगला जिसे इंडिया हाउस कहते हैं, कभी अंग्रेज़ सरकार के ख़िलाफ़ क्रांतिकारी गतिविधियों का अड्डा हुआ करता था। कहा जाता है कि यहीं पर गांधी जी और सावरकर की पहली मुलाक़ात हुई थी।

इंडिया हाउस की स्थापना स्वतंत्रता सैनानी श्यामजी कृष्ण वर्मा ने सन 1905 में की थी। ये वो समय था जब सन 1905 में बंगाल के विभाजन के बाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उग्र राष्ट्रवाद एक प्रबल राजनीतिक ताक़त के रुप में उभर रहा था। बंगाल के विभाजन से लोग इतना नाराज़ हो गए थे कि बंगाल, पंजाब और महाराष्ट्र में उग्र युवाओं के भूमिगत संगठन बन गए थे। एक तरफ़ जहां नैशनल कांग्रेस ने स्वाधीनता प्राप्ति के लिये निवेदन और प्रार्थना की नीति अपना रखी थी वहीं ये युवा इस तरह की नीति में बिल्कुल विश्वास नहीं करते थे। वे स्वराज चाहते थे और अंग्रेज़ों को देश से खदेड़ना चाहते थे भले ही इसके लिये हिंसा और बल का प्रयोग क्यों न करना पड़े।

इंग्लैंड में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ इस तरह की गतिविधियों के पीछे जो मार्गदर्शक ताक़तें थीं उनमे एक थे श्यामजी कृष्ण वर्मा (1857-1930)।

जिनका जन्म गुजरात के कच्छ में हुआ था। उन्होंने इंग्लैंड के बैलिओल कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई की थी। वह उन पहले भारतीयों में से थे जिन्हें सन 1884 में ब्रिटिश बार में आमंत्रित किया गया था। उन्होंने भारत में कुछ समय के लिये वकालत की थी और जूनागढ़ रियासत के दीवान भी रहे थे। लेकिन कुछ स्थानीय अंग्रेज़ अफ़सरों की कथित साज़िश की वजह से उन्हें दीवान के पद से हटा दिया गया। इस घटना के बाद उनका अंग्रेज़ शासन से विश्वास उठ गया।

श्यामजी कृष्ण वर्मा सन 1897 में वापस इंग्लैंड वापस चले गए। तब तक वह काफ़ी धनवान बन चुके थे। उनकी उत्तर-पश्चिमी भारत में कुछ कपड़ा मिलों में साझेदारी थी और वह पेरिस, लंदन और जेनेवा के शैयर बाज़ारों में शैयरों की ख़रीद-फ़रोख़्त भी करते थे। उन्होंने यहां अपने शुरुआती साल दार्शनिक हरबर्ट स्पेंसर को पढ़ने में बिताये। स्पेंसर राष्ट्रवाद के सिद्धांत के हिमायती थे और किसी भी प्रकार के उत्पीड़न के विरोधी थे भले ही ये उत्पीड़न परिजनों द्वारा बच्चों का हो, मालिकों द्वारा मज़दूरों का हो या फिर शासकों द्वारा जनता का हो। वर्मा ने भारत में विदेशी शासकों के उत्पीड़न को ख़त्म करने के लिये इस सिद्धांत का इस्तेमाल किया। उन्होंने इंग्लैंड में भारतीय छात्रों को स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के लिये कई स्कॉलरशिप शुरु की। लेकिन स्कॉलरशिप की एक शर्त ये थी कि स्कॉलरशिप से पढ़ाई ख़त्म करने वाले छात्र भारत वापसी पर अंग्रेज़ सरकार का कोई पद, कोई नौकरी या फिर किसी तरह का कोई मेहनताना नहीं लेंगे।

इसके साथ ही एक नये मत की शुरुआत हुई जिसमें अंग्रेज़ हुक़ुमत के ख़िलाफ़ असहयोग की भावना निहित थी। जनवरी सन 1905 में वर्मा ने एक पत्रिका निकाली जिसका नाम था ‘द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट’। ये आज़ादी और राजनीतिक, सामाजिक तथा धार्मिक सुधारों की पत्रिका थी। इसी के साथ वर्मा का भारतीय राजनीति में पदार्पण हुआ । पत्रिका के पहले अंक में ये बयान छपा- “इंग्लैंड और भारत के बीच राजनीतिक संबंधों को ब्रिटैन में तुरंत एक ऐसे भारतीय दुभाषिये की ज़रुरत है जो भारत की तरफ़ से ये बता सके कि ब्रिटिश शासन में भारतीय वास्तव में कैसा मेहसूस करते हैं...वक़्त वक़्त पर अंग्रेज़ों को याद दिलाया जाएगा कि आज़ादी के प्रेमी और एक आज़ाद देश के रुप में वे तब तक सफल नहीं हो सकते जब तक कि वे ब्रिटैन के सैन्य साम्राज्य का हिस्सा बन चुकी कई नस्लों पर ब्रिटैन के नाम पर अत्याचार करने के लिये प्रबुद्ध वर्गों के सदस्यों को भेजना जारी रखेंगे।” ये मासिक पत्रिका न सिर्फ़ ब्रिटैन बल्कि भारत तथा उन तमाम देशों में वितरित की गई जहां ऐसे लोग थे जो राष्ट्रवाद के सिद्धांत पर विश्वास करते थे।

एक महीने बाद फ़रवरी सन 1905 में वर्मा ने लंदन में इंडियन होम रुल्स सोसाइटी (IHRS) की स्थापना की जिसमें भीकाजी कामा, दादाभाई नैरोजी और एस.आर. राणा सहित उस समय ब्रिटेन में रह रहे कई प्रमुख भारतीय राष्ट्रवादियों ने मदद की। ये सोसाइटी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ब्रिटिश कमेटी के समानांतर एक संगठन के रुप में बनाई गई थी। ब्रिटिश कमेटी उस समय अंग्रेज़ शासन के वफ़ादारों का संगठन था।

लेकिन वह यहीं नहीं रुके। कुछ महीनों बाद जुलाई सन 1905 में वर्मा ने छात्रों के लिये एक हॉस्टल बनाया जिसका नाम रखा गया इंडिया हाउस। इस हॉस्टल में एक सभागार, एक पुस्तकालय और एक वाचनालय था। बहुत जल्द इस हॉस्टल में विनायक सावरकर, हर दयाल, मदन लाल धींगरा, पांडुरंग बापट, एम.पी.टी आचार्य, वी.वी.एस. अय्यर जैसे छात्र रहने लगे। वर्मा ने ब्रिटेन के बीचों बीच उग्र भारतीय राष्ट्रवादियों को एक ठिकाना मुहैया करवा दिया था। उन्होंने देश की आज़ादी के लिये युवाओं को आकर्षित करने के उद्देश्य से जान बूझकर ये क़दम उठाया था।

इंडिया हाउस में इंडियन होम रुल्स सोसाइटी की हर रविवार को साप्ताहिक बैठक होती थी जिसमें प्रस्ताव पारित किये जाते थे, भारत में गिरफ़्तारियों की निंदा की जाती थी और भारत की आज़ादी की वकालत की जाती थी। सोसाइटी सन 1857 के बग़ावत की याद में वार्षिक शहीद दिवस भी मनाती थी। सोसाइटी ने रुस की बोल्शविक क्रांति की वकालत करते हुए पर्चे भी बांटे। पर्चों में हत्या और बम बनाने की नीति की भी वकालत की गई थी। चर्चाओं में छात्र सक्रिय रुप से हिस्सा लेने लगे थे। बीस छात्रों के अलावा कई महत्वपूर्ण नेता भी कुछ समय के लिये इंडिया हाउस में आकर रहे थे। इनमें लाला लाजपत राय और असफ़ अली भी शामिल थे। भारत में इंडिया हाउस को बाल गंगाधर तिलक और बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड जैसे लोगों का समर्थन प्राप्त था।

सावरकर क़ानून की पढ़ाई के लिये सन 1906 में इंग्लैंड आए और इंडिया हाउस में रुके। अपने उग्र दृष्टिकोण की वजह से वह यहां एक प्रमुख व्यक्ति बन गए। उन्होंने इंडिया हाउस को अपनी अभिनव भारत सोसाइटी का मुख्यालय भी बना लिया। अभिनव भारत एक गुप्त उग्र संगठन था जिसकी शुरुआत सन 1904 में हुई थी। इंडिया हाउस में क्रांतिकारी पर्चे बनाए जाते थे जिन्हें भारत में बांटा जाता था। इंडियन सोशियोलॉजिस्ट के अलावा सावरकर ने वंदे मातरम और ओ शहीदों (Oh Martyrs!) जैसे पर्चे निकाले जिसमें क्रांति के लिये हिंसा का बख़ान किया जाता था। भारतीय डाक अधिकारियों की नज़रों से बचाने के लिये क्रांतिकारी पर्चे अलग अलग पतों से झूठे कवर में जहाज़ से भेजे जाते थे। यहां तक कि पर्चों के साथ हथियार भी भेजे जाते थे। इनमें ब्राउनिंग पिस्तौले भी शामिल थीं जिन्हें चतुरभुज अमीन, चंजेरी राव और वीवीएस अय्यर गुपचुप तरीक़े से भारत लाए थे।

सन 1906 में जब सावरकर लंदन आए थे तभी महात्मा गांधी भी अक्टूबर में दक्षिण अफ़्रीक़ा से लंदन प्रतिनियुक्ति पर आए थे और इंडिया हाउस में रुके थे। कहा जाता है कि यहां गांधी जी और सावरकर की बहुत दिलचस्प मुलाक़ात हुई। रात के खाने के समय सावरकर ने गांधी जी के सामने प्रॉन्स (झींगा मछली) रख दिये। चूंकि गांधी जी शाकाहारी थे, उन्होंने खाने से मना कर दिया। इस पर सावरकर ने उनका मज़ाक उड़ाते हुए कहा-“अगर तुम हमारे साथ खा नहीं सकते तो फिर हमारे साथ काम कैसे करोगे? ये तो बस उबली हुई मछली है, हमें तो ऐसे लोग चाहिये जो अंग्रेज़ों को ज़िंदा खा जाएं।”

जल्द ही इंडिया हाउस की गतिविधियां ध्यान आकृष्ट करने लगीं और ब्रिटिश संसद में इसकी चर्चा होने लगी। द टाइम्स जैसे लंदन के प्रमुख अख़बार भारतीय छात्रों में ‘ बेवफ़ाई की भावना’ फ़ैलाने के लिये श्यामजी कृष्ण वर्मा पर मुक़दमा चलाने की मांग करने लगे। उत्पीड़न के डर से वर्मा सन 1907 में पेरिस चले गए जहां उनका संघर्ष जारी रहा। पेरिस से उन्होंने पूरे यूरोप में भारत के लिये समर्थन जुटाने की कोशिश की। पेरिस में उनकी मौजूदगी फ़्रांस सरकार के लिये शर्मिंदगी का सबब बन गई और वह जेनेवा (स्विट्ज़रलैंड में) चले गए जहां उन्होंने अपने जीवन के बाक़ी साल गुज़ारे।

इस बीच भारत में कई क्रांतिकारी हिंसक घटनाएं हुईं जिनको प्रत्यक्ष रुप से या तो इंडिया हाउस या फिर इसके सदस्यों से जोड़कर देखा जाने लगा। उदाहरण के लिये सन 1909 के अलीपुर बम कांड के मामले में छात्रों में से एक पांडुरंग बापट को भगोड़ा घोषित कर दिया गया। अलीपुर बम कांड बंगाल में खुदीराम बोस द्वारा ज़िला मजिस्ट्रेट के कारवां को बम से उड़ाने की कोशिश के बाद हुआ था। बापट बम बनाने की तकनीक सीखकर और तकनीक से संबंधित किताबें लेकर भारत वापस आए थे। ये किताबें उन्होंने बंगाल के क्रांतिकारियों में बांटी थीं। गिरफ़्तारी की संभावना को देखते हुए बापट भूमिगत हो गए थे।

श्यामजी कृष्ण वर्मा के जाने के बाद सावरकर ने इंडिया हाउस की ज़िम्मेदारी संभाल ली। वह राष्ट्रवादी भावना से संबंधित लेख लिखने लगे और जन सभाएं तथा प्रदर्शनों का आयोजन करने लगे। उनके दिशा निर्देश में इंडिया हाउस में रहने वाले छात्र और अभिनव भारत के सदस्य मध्य लंदन में टोटेनहम कोर्ट रोड पर एक शूटिंग रैंज में बंदूक चलाना सीखने लगे और हत्या की रिहर्सल भी करने लगे। सावरकर की किताब इंडियन वॉर ऑफ़ इंडीपेंडेंस का इंडिया हाउस में मराठी और अंग्रेज़ी भाषा में अनुवाद हुआ जो मई सन 1909 में लंदन में प्रकाशित हुईं।

सन 1909 तक आते आते स्कॉटलैंड यार्ड (ब्रिटिश पुलिस) इंडिया हाउस पर नज़र रखने लगा था। उसने एक समय कार्तिकर नाम के एक छात्र को जासूस के रुप में संगठन में घुसा दिया था जो कुछ समय तक उसे संगठन की गतिविधियों की सूचनाएं देता रहा। लेकिन फिर उसका पर्दाफ़ाश हो गया और सावरकर ने बंदूक़ की नोक पर उससे सब कुछ उगलवा लिया।

लेकिन इंडिया हाउस का अंत तब हुआ जब एक जुलाई सन 1909 को लंदन में इम्पीरियल इंस्टीट्यूट पर मदन लाल धींगरा ने भारत के मामलों के अंग्रेज़ मंत्री के राजनीतिक संदेश वाहक कर्ज़न वैली की गोली मारकर हत्या कर दी। धींगरा अक्सर इंडिया हाउस आया-जाया करते थे। हत्या के बाद इंडियन सोशियोलॉजिस्ट पत्रिका ने एक संपादकीय लिखा लेकिन इसमें हत्या की निंदा नहीं की गई थी।

कर्ज़न वैली की हत्या के बाद इंडिया हाउस के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाईयां होने लगीं। इसके कई नेता इंग्लैंड छोड़कर फ़्रांस, जर्मनी और अमेरिका चले गए। जब बात करिअर पर आ गई तो इंडिया हाउस का छात्र समर्थन भी जाता रहा। जल्द ही इंडिया हाउस बंद होकर बिक गया लेकिन अपने पीछे एक बड़े नेटवर्क की विरासत छोड़ गया।

इंडिया हाउस की तर्ज़ पर अमेरिका और जापान में भी इंडिया हाउस खुल गए हालंकि इनका आधिकारिक रुप से लंदन के इंडिया हाउस से कोई संबंध नहीं था। 19वीं शताब्दी के अंत तक तोक्यो में भारतीय छात्रों की संख्या बढ़ने लगी थी और वर्मा इनके संपर्क में रहते थे। द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट यहां मशहूर हो गई और सन 1907 में यहां एक इंडिया हाउस खोला गया। वर्मा ने आयरिश रिपब्लिकन मूवमेंट के साथ निकट संबंध बना लिये थे। इसकी वजह से द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट के लेख अमेरिका में आयरिश अख़बार गेलिक अमेरिकन में छपने लगे। लेखों से प्रभावित होकर आयरिश मूल के अमीर वकील मैरॉन फ़ेल्प्स ने सन 1908 में न्यूयॉर्क में इंडिया हाउस खोलने में पैसा लगाया। न्यूयॉर्क में भारतीय छात्रों और लंदन इंडिया हाउस के पूर्व निवासियों ने मीडिया से संबंधित उदार क़ानूनों का फ़ायदा उठाते हुए द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट और अन्य राष्ट्रवादी पत्र-पत्रिकाओं का वितरण शुरु कर दिया। इसी बीच लंदन के इंडिया हाउस के छात्र हर दयाल जो अमेरिका में थे, ने बौद्धिक हलचल पैदा करने वालों और मज़दूरों जिनमें अधिकतर पंजाबी थे, तथा प्रवासियों के बीच दूरियों को कम किया। इस तरह ग़दर मूवमेंट की बुनियाद पड़ी।

आज लंदन में इंडिया हाउस एक ख़ामोश जगह है जहां एक छोटी सी तख़्ती लगी हुई है जो बताती है कि यहां विनायक सावरकर रहते थे। लेकिन हैरानी की बात ये है कि तख़्ती में इस बात का कोई ज़िक्र नही है कि ये भवन इंडिया हाउस कहलाता था। सन 2010 में गुजरात के मांडवी में श्यामजी कृष्ण वर्मा की स्मृति में उनकी जन्मभूमि पर बिल्कुल इंडिया हाउस की तरह का क्रांति तीर्थ नामक हाउस का उद्घाटन किया गया।

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लिव हिस्ट्री इंडिया इस देश की अनमोल धरोहर की यादों को ताज़ा करने का एक प्रयत्न हैं। हम आपके विचारों और सुझावों का स्वागत करते हैं। हमारे साथ किसी भी तरह से जुड़े रहने के लिए यहाँ संपर्क कीजिये: contactus@livehistoryindia.com

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भव्य और सुसज्जित रथ के रुप में किसी मंदिर का निर्माण कोई साधारण बात नहीं है लेकिन ओडिशा के कोणार्क सूर्य मंदिर को तो साधारण श्रेणी में माना ही नहीं जा सकता । यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची में शामिल सूर्य मंदिर 13वीं शताब्दी का है लेकिन क्या आपको पता है कि कोणार्क में इस तरह के सूर्य मंदिर पहले भी रहे हैं ? कहा जाता है कि यहां ऐसा ही एक मंदिर ढ़ाई हज़ार साल पहले हुआ करता था।

ओडिशा में उत्तर-पूर्वी तटीय शहर पुरी की तरफ़ कोणार्क में स्थित सूर्य मंदिर अपने नाम के अनुरुप सूर्य देवता को समर्पित है। ये मंदिर रथ के आकार में है जिसमें चौबीस पहिये हैं और रथ को सात घोड़े खींच रहे हैं। इसे भारत का ब्लैक पगोडा (काला देवालय) भी कहा जाता है। ये भारत में मंदिर वास्तुकला का एक बेहतरीन नमूना है।

इतिहास और किवदंतियां

5वीं और छठी शताब्दी के दौरान ऐतिहासिक कलिंगा प्रांत, आज के पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों पर मध्यकालीन भारत के पूर्वी गंग राजवंश का शासन हुआ करता था। सन1244 में राजवंश के नरसिम्हा देव प्रथम (1236-1287) ने कोणार्क में सूर्य मंदिर बनाने का आदेश दिया था। लेकिन कोणार्क कोई मामूली जगह नहीं थी क्योंकि प्राचीनकाल से ही इसे सूर्य देवता का निवास माना जाता रहा था। विभिन्न शास्त्रों में कोणार्क को सूर्य देवता की अराधना का केंद्र बताया गया है। शिव पुराण और स्कंद पुराण में इसका उल्लेख सूर्य क्षेत्र जैसे नामों से मिलता है। इसके अलावा कपिल संहिता जैसे कुछ प्राचीन ग्रंथों में मैत्रेय वन नाम से भी उल्लेख मिलता है। माना जाता है कि मैत्रेय बोधिसत्व ने यहां रहकर साधना की थी।

ऐसा माना जाता है कि कोणार्क दो शब्दों को मिलाकर बना है, कोण और आर्क (सूर्य)। कोणार्क की भौगोलिक स्थिति, यानी यहां सूर्य उदय एक ख़ास कोण से होता होगा और तभी शब्द कोर्ण यहां से लिया गया होगा। एक अन्य लोककथा के अनुसार इस शहर को और पवित्र इसलिये भी माना जाता है क्योंकि यहां भगवान शिव ने अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिये ख़ुद सूर्य देवता की पूजा की थी। एक तरफ़ जहां कई अन्य ग्रंथों में कोणार्क का, सूर्य देवता की अराधना के केंद्र के रुप में ज़िक्र है, वहीं एक ग्रंथ में यहां पहले सूर्य मंदिर की स्थापना के बारे में बताया गया है।

सूर्य देवता को समर्पित प्राचीन ग्रंथ साम्ब पुराण में कृष्ण के पुत्र साम्ब का उल्लेख है। कथा के अनुसार साम्ब को कुष्ठ रोग का श्राप मिला था। इस श्राप से बचने के लिये उसने मौत्रेय वन (कोणार्क) में बारह साल तक सूर्य की पूजा की थी और फिर 19वीं ई.पू. में यहां सूर्य मंदिर बनवाया था। कहा जाता है कि तभी से कोणार्क में सूर्य की पूजा करने की परंपरा शुरु हुई जो आज भी जारी है।

माना जाता है कि कोणार्क में मौजूदा समय के सूर्य मंदिर के पहले सोमजवंशी शासकों ने 9वीं शताब्दी में यहां सूर्य मंदिर बनवाया था। सोमजवंशियों को केशरी राजवंश भी कहा जाता है जिनका शासन पूर्वी भारत पर होता था। केशरी राजवंश ने 9वीं से 12वीं शताब्दी के दौरान आधुनिक ओडीशा के कुछ हिस्सों पर शासन किया था। इन क्षेत्रों को कौशल कहा जाता था। पूर्वी गंग राजवंश ओडीशा के भिन्न हिस्सों और पड़ोसी क्षेत्रों पर शासन करता था। पूर्वी गंग राजा अनंतवर्मन चोडगंग ने केशरी राजा को हराकर क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया था और इस तरह केशरी राजवंश के शासन का अंत हो गया। 12वीं शताब्दी के शास्त्र मदल पणजी के अनुसार केशरी राजवंश के राजा पुरंदर केशरी ने सन 870 में कोणार्क में सूर्य मंदिर बनवाया था, जिसका उल्लेख मदल पणजी में भी किया गया है। मदल पणजी एक प्राचीन लेख है जिसमें ओडीशा के जगन्नाथ मंदिर का इतिहास मिलता है। कहा जाता है कि इस मंदिर के अवशेष सूर्य मंदिर के परिसर में देखे जा सकते हैं। इन्हें छाया देवी या मायादेवी मंदिर के रुप में जाना जाता है।

ओडीशा में 7वीं और 13वीं शताब्दी के बीच मंदिर निर्माण की गतिविधियां अपने चरम पर थीं। पूर्वी गंग राजवंश के शासन के दौरान सूर्य-पूजा का चलन एक बार फिर शुरु हो गया, ख़ासकर कोणार्क में। राजा नरसिम्हा देव प्रथम द्वारा सूर्य मंदिर बनवाने के कारण के पीछे कई कहानियां हैं। एक कथा के अनुसार नरसिम्हा देव के पिता अनंगभीम देव ने कोणार्क में सूर्य देवता की उपासना की थी और तभी पुत्र के रुप में उन्हें नरसिम्हा देव की प्राप्ति हुई थी। अपने माता-पिता की इच्छा को पूरी करने के लिये नरसिम्हा देव ने विशाल सूर्य मंदिर बनवाया। नरसिम्हा देव द्वतीय के समय सन 1295 के तांबे के शिला-लेख के अनुसार नरसिम्हा देव के पिता पुरी के जगन्नाथ मंदिर का विस्तार करना चाहते थे और उनकी यही इच्छा पूरी करने के लिये नरसिम्हा देव प्रथम ने कोणार्क में सूर्य मंदिर बनवाया था। जगन्नाथ का मंदिर अनंगभीम देव के पूर्वज चोडगंग (1077-1150) ने बनवाया था।

मंदिर की अनोखी वास्तुकला

सूर्य मंदिर में कलिंगा वास्तुकला की विशेषताएं साफ़ झलकती हैं। यहां जगमोहन (जन सभागार), शिखर, विमन और नट मंदिर जैसी कलिंगा वास्तुकला की विशेषताएं देखी जा सकती हैं। ये मंदिर परंपरा के अनुसार बनाया गया है। ऐसा कहा जाता है कि इसका डिज़ाइन इस प्रकार है कि सूर्य की पहली किरण मुख्य मंदिर के गर्भगृह में स्थापित सूर्य की प्रतिमा पर पड़ती थी।

ये मंदिर भगवान सूर्य के वाहक रथ के रुप में बनाया गया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार सूर्य देवता अपने रथ पर सवार होकर आकाश की परिक्रमा करते हैं। इस रथ को सात घोड़े खींचते हैं। मंदिर के चबूतरे पर सुंदर तरीक़े से उकेरे गए 24 चक्र हैं। ये चक्र या पहिये 24 पखवाड़े, बारह महीने या फिर दिन के 24 घंटे को दर्शाते हैं। माना जाता है कि सात घोड़े सप्ताह के सात दिनों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जबकि कुछ का मानना है कि सात घोड़े सूर्य की किरण के सात रंगों को दर्शाते हैं। प्रत्येक पहिये में आठ छड़े लगी हुई हैं जो दिन के आठ पहरों की प्रतीक हैं। एक अन्य विवेचना के अनुसार चूंकि सूर्य पृथ्वी पर जीवन का स्रोत है इसलिये पहिये जीवन-चक्र के प्रतीक हैं।

रथ के पहियों के बीच में मंदिर की चौकी पर पशुओं, संगीतकारों और नृतकों के चित्रों की सुंदर नक़्क़ाशी है। इनके अलावा इस पर उत्तेजक चित्र भी बने हुए हैं। मंदिर की बाहरी दीवारों पर ऊपर से लेकर नीचे तक देवी-देवताओं, इंसानों आदि के चित्र बने हुए हैं। नट मंदिर की दीवारों पर अंकित कलाकृतियों में रोज़मर्रा के जीवन को दर्शाया गया है।

पहले क्या था

आज जो मंदिर आप देखते हैं वह एक बड़े परिसर का हिस्सा हुआ करता था और एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल भी था। 8वीं शताब्दी में चीनी बौद्ध भिक्षु ह्वेन त्सांग वर्तमान समय के ओडीशा आया था। उसने लिखा है कि कोणार्क बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। अबुल फ़ज़ल (1556-1605) ने आईन-ए-अकबरी में लिखा है कि सूर्य मंदिर के अलावा परिसर के अंदर छह और सूर्य मंदिर के आसपास 22 और मंदिर थे।

किसी अज्ञात कारणवश मंदिर का ढांचा ढ़ह गया और आज हम जो देखते हैं वो एक विशाल मंदिर का एक हिस्सा मात्र है। अब सिर्फ़ जगमोहन ही बचा हुआ है। अन्य बचे हुए मंदिर के हिस्सों में रेखा देउल की चौकियां और निचली दीवारें और नट मंदिर के कुछ स्तंभ हैं। मंदिर परिसर में रेखा देउल सबसे बड़ा ढांचा है। इसके तीन तरफ़ मंदिर हैं जहां क्लोराइट में सूर्य की आदम क़द प्रतिमाएं लगी हैं। जगमोहन के तीन तरफ़ के दरवाज़े और सीढ़ियां नक़्क़ाशीदार हैं। इन पर घोड़ों और हाथियों के चित्र अंकित हैं। यहां संगीतकारों की भी मूर्तियां हैं।

19वीं शताब्दी के दौरान अलग अलग समय में कोणार्क आए डब्ल्यू. डब्ल्यू हंटर, एंड्रू स्टर्लिंग और जैम्स फ़र्गुसन जैसे इतिहासकारों और विद्वानों ने सूर्य मंदिर के बारे में लिखा और रेखा-चित्र बनाये। उनके रिकॉर्ड से हमें मुख्य मंदिर के अवशेषों के बारे में पता चलता है। उनके रिकार्ड्स से ये भी पता चलता है कि कैसे मंदिर धीरे धीरे इस दौरान तक क्षय होता रहा। इतिहासकार राजेंद्र लाला मित्रा भी यहां सन 1868 में आए थे। वह लिखते हैं “मंदिर पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है, इसके आस पास पत्थरों का ढ़ेर और पीपल के पेड़ हैं। यहां सापों का भी बसेरा हो गया है जिसकी वजह से लोग इससे दूर ही रहते हैं।”

20 शताब्दी में अलग अलग समय पर यहां खुदाई का काम हुआ। खुदाई में मायादेवी मंदिर और वैष्णव मंदिर जैसे अन्य मंदिरों का पता चला जिन्हें आज भी देखा जा सकता है। इसी तरह भोगमंडप (रसोई) भी मौजूद है हालंकि जर्जर अवस्था में है। मंदिर के ज़्यादातर अवशेष और पैनल्स कोणार्क संग्रहालय में रख दिये गए हैं जो इसी परिसर में है और जो भारतीय पुरातत्व विभाग की देखरेख में आता है।

भारत के कोणार्क सूर्य मंदिर को देखने आज सबसे ज़्यादा लोग जाते हैं। इससे पता चलता है कि एक समय सूर्य की उपासना कितनी चलन में थी। कोणार्क के अलावा कश्मीर, गुजरात में मोढेड़ा, महाराष्ट्र में लोनर और तमिलनाडु में भी सूर्य मंदिर हैं। कणार्क सूर्य मंदिर कलिंगा वास्तुकला और परंपरा का एक शानदार उदाहरण है जिसे ज़रुर देखना चाहिये।

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गुजरात के कच्छ में इंडिया हाउस का एक प्रतिरुप रखा है जो सन 2010 में बनवाया गया था। लेकिन असली इंडियन हाउस सौ साल पुराना है जो उत्तर लंदन में है।

65, क्रोमवेल एवेन्यू आज लंदन के एक उपनगरीय क्षेत्र में एक अनजान सी जगह है लेकिन 20वीं शताब्दी के पहले दशक में विक्टोरिया शैली का, लाल ईंटों वाला ये बंगला जिसे इंडिया हाउस कहते हैं, कभी अंग्रेज़ सरकार के ख़िलाफ़ क्रांतिकारी गतिविधियों का अड्डा हुआ करता था। कहा जाता है कि यहीं पर गांधी जी और सावरकर की पहली मुलाक़ात हुई थी।

इंडिया हाउस की स्थापना स्वतंत्रता सैनानी श्यामजी कृष्ण वर्मा ने सन 1905 में की थी। ये वो समय था जब सन 1905 में बंगाल के विभाजन के बाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उग्र राष्ट्रवाद एक प्रबल राजनीतिक ताक़त के रुप में उभर रहा था। बंगाल के विभाजन से लोग इतना नाराज़ हो गए थे कि बंगाल, पंजाब और महाराष्ट्र में उग्र युवाओं के भूमिगत संगठन बन गए थे। एक तरफ़ जहां नैशनल कांग्रेस ने स्वाधीनता प्राप्ति के लिये निवेदन और प्रार्थना की नीति अपना रखी थी वहीं ये युवा इस तरह की नीति में बिल्कुल विश्वास नहीं करते थे। वे स्वराज चाहते थे और अंग्रेज़ों को देश से खदेड़ना चाहते थे भले ही इसके लिये हिंसा और बल का प्रयोग क्यों न करना पड़े।

इंग्लैंड में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ इस तरह की गतिविधियों के पीछे जो मार्गदर्शक ताक़तें थीं उनमे एक थे श्यामजी कृष्ण वर्मा (1857-1930)।

जिनका जन्म गुजरात के कच्छ में हुआ था। उन्होंने इंग्लैंड के बैलिओल कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई की थी। वह उन पहले भारतीयों में से थे जिन्हें सन 1884 में ब्रिटिश बार में आमंत्रित किया गया था। उन्होंने भारत में कुछ समय के लिये वकालत की थी और जूनागढ़ रियासत के दीवान भी रहे थे। लेकिन कुछ स्थानीय अंग्रेज़ अफ़सरों की कथित साज़िश की वजह से उन्हें दीवान के पद से हटा दिया गया। इस घटना के बाद उनका अंग्रेज़ शासन से विश्वास उठ गया।

श्यामजी कृष्ण वर्मा सन 1897 में वापस इंग्लैंड वापस चले गए। तब तक वह काफ़ी धनवान बन चुके थे। उनकी उत्तर-पश्चिमी भारत में कुछ कपड़ा मिलों में साझेदारी थी और वह पेरिस, लंदन और जेनेवा के शैयर बाज़ारों में शैयरों की ख़रीद-फ़रोख़्त भी करते थे। उन्होंने यहां अपने शुरुआती साल दार्शनिक हरबर्ट स्पेंसर को पढ़ने में बिताये। स्पेंसर राष्ट्रवाद के सिद्धांत के हिमायती थे और किसी भी प्रकार के उत्पीड़न के विरोधी थे भले ही ये उत्पीड़न परिजनों द्वारा बच्चों का हो, मालिकों द्वारा मज़दूरों का हो या फिर शासकों द्वारा जनता का हो। वर्मा ने भारत में विदेशी शासकों के उत्पीड़न को ख़त्म करने के लिये इस सिद्धांत का इस्तेमाल किया। उन्होंने इंग्लैंड में भारतीय छात्रों को स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के लिये कई स्कॉलरशिप शुरु की। लेकिन स्कॉलरशिप की एक शर्त ये थी कि स्कॉलरशिप से पढ़ाई ख़त्म करने वाले छात्र भारत वापसी पर अंग्रेज़ सरकार का कोई पद, कोई नौकरी या फिर किसी तरह का कोई मेहनताना नहीं लेंगे।

इसके साथ ही एक नये मत की शुरुआत हुई जिसमें अंग्रेज़ हुक़ुमत के ख़िलाफ़ असहयोग की भावना निहित थी। जनवरी सन 1905 में वर्मा ने एक पत्रिका निकाली जिसका नाम था ‘द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट’। ये आज़ादी और राजनीतिक, सामाजिक तथा धार्मिक सुधारों की पत्रिका थी। इसी के साथ वर्मा का भारतीय राजनीति में पदार्पण हुआ । पत्रिका के पहले अंक में ये बयान छपा- “इंग्लैंड और भारत के बीच राजनीतिक संबंधों को ब्रिटैन में तुरंत एक ऐसे भारतीय दुभाषिये की ज़रुरत है जो भारत की तरफ़ से ये बता सके कि ब्रिटिश शासन में भारतीय वास्तव में कैसा मेहसूस करते हैं...वक़्त वक़्त पर अंग्रेज़ों को याद दिलाया जाएगा कि आज़ादी के प्रेमी और एक आज़ाद देश के रुप में वे तब तक सफल नहीं हो सकते जब तक कि वे ब्रिटैन के सैन्य साम्राज्य का हिस्सा बन चुकी कई नस्लों पर ब्रिटैन के नाम पर अत्याचार करने के लिये प्रबुद्ध वर्गों के सदस्यों को भेजना जारी रखेंगे।” ये मासिक पत्रिका न सिर्फ़ ब्रिटैन बल्कि भारत तथा उन तमाम देशों में वितरित की गई जहां ऐसे लोग थे जो राष्ट्रवाद के सिद्धांत पर विश्वास करते थे।

एक महीने बाद फ़रवरी सन 1905 में वर्मा ने लंदन में इंडियन होम रुल्स सोसाइटी (IHRS) की स्थापना की जिसमें भीकाजी कामा, दादाभाई नैरोजी और एस.आर. राणा सहित उस समय ब्रिटेन में रह रहे कई प्रमुख भारतीय राष्ट्रवादियों ने मदद की। ये सोसाइटी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ब्रिटिश कमेटी के समानांतर एक संगठन के रुप में बनाई गई थी। ब्रिटिश कमेटी उस समय अंग्रेज़ शासन के वफ़ादारों का संगठन था।

लेकिन वह यहीं नहीं रुके। कुछ महीनों बाद जुलाई सन 1905 में वर्मा ने छात्रों के लिये एक हॉस्टल बनाया जिसका नाम रखा गया इंडिया हाउस। इस हॉस्टल में एक सभागार, एक पुस्तकालय और एक वाचनालय था। बहुत जल्द इस हॉस्टल में विनायक सावरकर, हर दयाल, मदन लाल धींगरा, पांडुरंग बापट, एम.पी.टी आचार्य, वी.वी.एस. अय्यर जैसे छात्र रहने लगे। वर्मा ने ब्रिटेन के बीचों बीच उग्र भारतीय राष्ट्रवादियों को एक ठिकाना मुहैया करवा दिया था। उन्होंने देश की आज़ादी के लिये युवाओं को आकर्षित करने के उद्देश्य से जान बूझकर ये क़दम उठाया था।

इंडिया हाउस में इंडियन होम रुल्स सोसाइटी की हर रविवार को साप्ताहिक बैठक होती थी जिसमें प्रस्ताव पारित किये जाते थे, भारत में गिरफ़्तारियों की निंदा की जाती थी और भारत की आज़ादी की वकालत की जाती थी। सोसाइटी सन 1857 के बग़ावत की याद में वार्षिक शहीद दिवस भी मनाती थी। सोसाइटी ने रुस की बोल्शविक क्रांति की वकालत करते हुए पर्चे भी बांटे। पर्चों में हत्या और बम बनाने की नीति की भी वकालत की गई थी। चर्चाओं में छात्र सक्रिय रुप से हिस्सा लेने लगे थे। बीस छात्रों के अलावा कई महत्वपूर्ण नेता भी कुछ समय के लिये इंडिया हाउस में आकर रहे थे। इनमें लाला लाजपत राय और असफ़ अली भी शामिल थे। भारत में इंडिया हाउस को बाल गंगाधर तिलक और बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड जैसे लोगों का समर्थन प्राप्त था।

सावरकर क़ानून की पढ़ाई के लिये सन 1906 में इंग्लैंड आए और इंडिया हाउस में रुके। अपने उग्र दृष्टिकोण की वजह से वह यहां एक प्रमुख व्यक्ति बन गए। उन्होंने इंडिया हाउस को अपनी अभिनव भारत सोसाइटी का मुख्यालय भी बना लिया। अभिनव भारत एक गुप्त उग्र संगठन था जिसकी शुरुआत सन 1904 में हुई थी। इंडिया हाउस में क्रांतिकारी पर्चे बनाए जाते थे जिन्हें भारत में बांटा जाता था। इंडियन सोशियोलॉजिस्ट के अलावा सावरकर ने वंदे मातरम और ओ शहीदों (Oh Martyrs!) जैसे पर्चे निकाले जिसमें क्रांति के लिये हिंसा का बख़ान किया जाता था। भारतीय डाक अधिकारियों की नज़रों से बचाने के लिये क्रांतिकारी पर्चे अलग अलग पतों से झूठे कवर में जहाज़ से भेजे जाते थे। यहां तक कि पर्चों के साथ हथियार भी भेजे जाते थे। इनमें ब्राउनिंग पिस्तौले भी शामिल थीं जिन्हें चतुरभुज अमीन, चंजेरी राव और वीवीएस अय्यर गुपचुप तरीक़े से भारत लाए थे।

सन 1906 में जब सावरकर लंदन आए थे तभी महात्मा गांधी भी अक्टूबर में दक्षिण अफ़्रीक़ा से लंदन प्रतिनियुक्ति पर आए थे और इंडिया हाउस में रुके थे। कहा जाता है कि यहां गांधी जी और सावरकर की बहुत दिलचस्प मुलाक़ात हुई। रात के खाने के समय सावरकर ने गांधी जी के सामने प्रॉन्स (झींगा मछली) रख दिये। चूंकि गांधी जी शाकाहारी थे, उन्होंने खाने से मना कर दिया। इस पर सावरकर ने उनका मज़ाक उड़ाते हुए कहा-“अगर तुम हमारे साथ खा नहीं सकते तो फिर हमारे साथ काम कैसे करोगे? ये तो बस उबली हुई मछली है, हमें तो ऐसे लोग चाहिये जो अंग्रेज़ों को ज़िंदा खा जाएं।”

जल्द ही इंडिया हाउस की गतिविधियां ध्यान आकृष्ट करने लगीं और ब्रिटिश संसद में इसकी चर्चा होने लगी। द टाइम्स जैसे लंदन के प्रमुख अख़बार भारतीय छात्रों में ‘ बेवफ़ाई की भावना’ फ़ैलाने के लिये श्यामजी कृष्ण वर्मा पर मुक़दमा चलाने की मांग करने लगे। उत्पीड़न के डर से वर्मा सन 1907 में पेरिस चले गए जहां उनका संघर्ष जारी रहा। पेरिस से उन्होंने पूरे यूरोप में भारत के लिये समर्थन जुटाने की कोशिश की। पेरिस में उनकी मौजूदगी फ़्रांस सरकार के लिये शर्मिंदगी का सबब बन गई और वह जेनेवा (स्विट्ज़रलैंड में) चले गए जहां उन्होंने अपने जीवन के बाक़ी साल गुज़ारे।

इस बीच भारत में कई क्रांतिकारी हिंसक घटनाएं हुईं जिनको प्रत्यक्ष रुप से या तो इंडिया हाउस या फिर इसके सदस्यों से जोड़कर देखा जाने लगा। उदाहरण के लिये सन 1909 के अलीपुर बम कांड के मामले में छात्रों में से एक पांडुरंग बापट को भगोड़ा घोषित कर दिया गया। अलीपुर बम कांड बंगाल में खुदीराम बोस द्वारा ज़िला मजिस्ट्रेट के कारवां को बम से उड़ाने की कोशिश के बाद हुआ था। बापट बम बनाने की तकनीक सीखकर और तकनीक से संबंधित किताबें लेकर भारत वापस आए थे। ये किताबें उन्होंने बंगाल के क्रांतिकारियों में बांटी थीं। गिरफ़्तारी की संभावना को देखते हुए बापट भूमिगत हो गए थे।

श्यामजी कृष्ण वर्मा के जाने के बाद सावरकर ने इंडिया हाउस की ज़िम्मेदारी संभाल ली। वह राष्ट्रवादी भावना से संबंधित लेख लिखने लगे और जन सभाएं तथा प्रदर्शनों का आयोजन करने लगे। उनके दिशा निर्देश में इंडिया हाउस में रहने वाले छात्र और अभिनव भारत के सदस्य मध्य लंदन में टोटेनहम कोर्ट रोड पर एक शूटिंग रैंज में बंदूक चलाना सीखने लगे और हत्या की रिहर्सल भी करने लगे। सावरकर की किताब इंडियन वॉर ऑफ़ इंडीपेंडेंस का इंडिया हाउस में मराठी और अंग्रेज़ी भाषा में अनुवाद हुआ जो मई सन 1909 में लंदन में प्रकाशित हुईं।

सन 1909 तक आते आते स्कॉटलैंड यार्ड (ब्रिटिश पुलिस) इंडिया हाउस पर नज़र रखने लगा था। उसने एक समय कार्तिकर नाम के एक छात्र को जासूस के रुप में संगठन में घुसा दिया था जो कुछ समय तक उसे संगठन की गतिविधियों की सूचनाएं देता रहा। लेकिन फिर उसका पर्दाफ़ाश हो गया और सावरकर ने बंदूक़ की नोक पर उससे सब कुछ उगलवा लिया।

लेकिन इंडिया हाउस का अंत तब हुआ जब एक जुलाई सन 1909 को लंदन में इम्पीरियल इंस्टीट्यूट पर मदन लाल धींगरा ने भारत के मामलों के अंग्रेज़ मंत्री के राजनीतिक संदेश वाहक कर्ज़न वैली की गोली मारकर हत्या कर दी। धींगरा अक्सर इंडिया हाउस आया-जाया करते थे। हत्या के बाद इंडियन सोशियोलॉजिस्ट पत्रिका ने एक संपादकीय लिखा लेकिन इसमें हत्या की निंदा नहीं की गई थी।

कर्ज़न वैली की हत्या के बाद इंडिया हाउस के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाईयां होने लगीं। इसके कई नेता इंग्लैंड छोड़कर फ़्रांस, जर्मनी और अमेरिका चले गए। जब बात करिअर पर आ गई तो इंडिया हाउस का छात्र समर्थन भी जाता रहा। जल्द ही इंडिया हाउस बंद होकर बिक गया लेकिन अपने पीछे एक बड़े नेटवर्क की विरासत छोड़ गया।

इंडिया हाउस की तर्ज़ पर अमेरिका और जापान में भी इंडिया हाउस खुल गए हालंकि इनका आधिकारिक रुप से लंदन के इंडिया हाउस से कोई संबंध नहीं था। 19वीं शताब्दी के अंत तक तोक्यो में भारतीय छात्रों की संख्या बढ़ने लगी थी और वर्मा इनके संपर्क में रहते थे। द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट यहां मशहूर हो गई और सन 1907 में यहां एक इंडिया हाउस खोला गया। वर्मा ने आयरिश रिपब्लिकन मूवमेंट के साथ निकट संबंध बना लिये थे। इसकी वजह से द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट के लेख अमेरिका में आयरिश अख़बार गेलिक अमेरिकन में छपने लगे। लेखों से प्रभावित होकर आयरिश मूल के अमीर वकील मैरॉन फ़ेल्प्स ने सन 1908 में न्यूयॉर्क में इंडिया हाउस खोलने में पैसा लगाया। न्यूयॉर्क में भारतीय छात्रों और लंदन इंडिया हाउस के पूर्व निवासियों ने मीडिया से संबंधित उदार क़ानूनों का फ़ायदा उठाते हुए द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट और अन्य राष्ट्रवादी पत्र-पत्रिकाओं का वितरण शुरु कर दिया। इसी बीच लंदन के इंडिया हाउस के छात्र हर दयाल जो अमेरिका में थे, ने बौद्धिक हलचल पैदा करने वालों और मज़दूरों जिनमें अधिकतर पंजाबी थे, तथा प्रवासियों के बीच दूरियों को कम किया। इस तरह ग़दर मूवमेंट की बुनियाद पड़ी।

आज लंदन में इंडिया हाउस एक ख़ामोश जगह है जहां एक छोटी सी तख़्ती लगी हुई है जो बताती है कि यहां विनायक सावरकर रहते थे। लेकिन हैरानी की बात ये है कि तख़्ती में इस बात का कोई ज़िक्र नही है कि ये भवन इंडिया हाउस कहलाता था। सन 2010 में गुजरात के मांडवी में श्यामजी कृष्ण वर्मा की स्मृति में उनकी जन्मभूमि पर बिल्कुल इंडिया हाउस की तरह का क्रांति तीर्थ नामक हाउस का उद्घाटन किया गया।

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